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झटका

पूरे पचास साल होने वाले हैं इस लघुकथा को। वह रोज़गार की तलाश में दिल्ली में सड़कें नाप रहा था। क्रिसमस के आसपास एक दिन वह राजा गार्डन से किदवई नगर जाने के लिए बस में सवार हुआ। दरवाज़े से अंदर दाख़िल होते ही उसे यह देख ख़ुशी हुई कि सबसे पीछे वाली बेंच पर अभी कुल चार जने बैठे थे यानी दो स्थान ख़ाली थे। जैसे ही वह बैठा, उसके तुरंत बाद बस में एक षोडशी चढ़ी और वह उसके बगल में बैठ गई। उस ख़ूबसूरत युवती के बाद जो दर्जन भर लोग चढ़े, उनके पास अब खड़े होकर यात्रा करने के अलावा कोई चारा न था।

वह ख़ुश था कि उसे अब कुछ समय तक उस युवती के बाजू में बैठकर सफ़र करना है। बस चली तो वह हलके-हलके हिचकोले खाने लगा। कुछ देर बाद उसे यह देख बुरा लगा कि बस के हिचकोले खाते ही उस षोडशी के मुँह के आसपास उस अधेड़ व्यक्ति के कोट का दाहिनी तरफ़ वाला निचला हिस्सा झूलने लगता था जो उनके पास खड़ा था। उसके अंदर का नायक जागा और वह उस अधेड़ व्यक्ति से बोला, "आप अपने कोट के बटन लगाइए। आपका कोट इनको परेशान कर रहा है।"

"ठीक है बेटे," कहकर उस व्यक्ति ने अपने कोट के बटन लगा लिए।

यह देख उसे अपनी हीरोपंती पर बेहद ख़ुशी हुई। उसके मशवरे को सुनकर वह लड़की भी हौले से मुस्कुराई। वह उन पलों का आनंद लेने लगा। वह सोचने लगा कि क्यों न लड़की से कुछ बात की जाए। क्या बात की जाए? वह इस पर विचार करने लगा। ख़ैर, तभी बस झटके से रुकी। बहरहाल, उसे तो तब बड़ा झटका लगा जब इधर कंडक्टर ने "धौला कुआँ" की आवाज़ लगाई और उधर वह अधेड़ व्यक्ति उस षोडशी से बोला, "बेटे, तुम्हारी मौसी का घर आने वाला है।" 

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