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जितेन्द्र मिश्र ’भरत जी’ – 001 दोहे

हम सोचें वो ना मिले, वो सोचे सो होय।
कर्मों से जो बो दिया, वैसा ही फल होय॥
 
जीवन रूपी राह पर, चलता है इंसान।
कर्म करे आगे बढ़े, चाहे वह सम्मान॥
 
मातु-पिता का सदा ही, सर्वोच्च है स्थान।
गणपति ने सम्मान दे, दिया सभी को ज्ञान॥
 
क़िस्मत की रेखा चली, ना जाने किस ओर।
सुख-दुख की बरसात में, चले न कोई ज़ोर॥
 
सूर्य के आलोक से, चेतन मन हो जाय।
प्रकृति में नवरस घुले, तन आनंद समाय॥
 
दाल-भात रोटी दही, अपनों के संग खाव।
पिज्ज़ा-बर्गर छोड़कर, नीरोगी हो जाव। 

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