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जितेन्द्र मिश्र ‘भास्वर’ – 002 दोहे

हंसवाहिनी शारदे, दें हम सबको ज्ञान।
सत्य राह पर हम चलें, कभी न हो अभिमान॥१॥
 
मनोयोग से कर्म को, जो करते हैं लोग।
ख़ुशियों की दूकान से, खाते रहते भोग॥२॥
 
धन घमण्ड किस काम का, साथ न कुछ भी जाय।
परहित यदि कुछ भी किया, फल अवश्य मिल जाय॥३॥
 
बदल गई तारीख़ है, समय न रुकता जाय।
कर्मों की पतवार ही, जीवन पार कराय॥४॥
 
नव बसंत का आगमन, सुंदर है एहसास।
प्रणय भाव है ऋतु लिए, मन में भरो प्रकाश॥५॥
 
भाव बिना ना प्रीत है, प्रीत बिना ना मीत।
मीत बिना ना राग है, यह जीवन का गीत॥६॥
 
बातें जब कड़वी लगें, चिंतन से लें काम।
नीम-करेला भी कटुक, आते कितने काम॥७॥

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