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जुझारू लेखिका रमणिका गुप्ता

रमणिका जी भी चली गईं। बीमार तो रहती ही थीं, बीच-बीच में अस्पताल में भर्ती भी होती रहती थीं। कुछ लोग तो यह भी कहा करते थे कि जब उनको आराम करने का मन होता है, जाकर ‘अपोलो’ में भर्ती हो जाती हैं। इस बार वह मूलचंद में भर्ती हुई थीं, ‘आराम’ कर घर नहीं आ सकीं। सदा के लिए आराम में चली गईं। 

मैंने उनका नाम पहली बार 1992-93 में सुना था। हजारीबाग से निकलने वाली पत्रिका ‘आम आदमी’ का पता कहीं से मिल गया था। संपादक की जगह रमणिका गुप्ता का नाम था। मैंने साधारण डाक से उन्हें एक कहानी भेज दी थी। वह वहाँ पहुँची या नहीं, नहीं मालूम। छपी या नहीं, नहीं मालूम। उन दिनों तो साधारण डाक से ही चीज़ें भेजता था। कभी पहुँचती थीं, कभी नहीं। कभी कुछ छपा तो पत्रिका नहीं पहुँचती थी। एक बार एक कहानी मुंबई से निकलने वाले ‘जनसत्ता’ के साप्ताहिक परिशिष्ठ ‘सबरंग’ में छपी थी। इसकी जानकारी वहीं से आए एक पाठक के पत्र से मिली थी। बाद में पारिश्रमिक भी आया था लेकिन ‘सबरंग’ की प्रति नहीं ही मिली थी। इसी तरह एक बार ‘वीणा’ से आए ‘पत्रम-पुष्पम’ से पता चला था कि वहाँ कहानी छप गई है। दो-तीन साल बाद मित्र विनोद अनुपम ने स्वयं ही छपी हुई कहानी भेज दी थी। 

रमणिका जी से दूसरा परिचय उनकी कहानी ‘बहू-जुठाई’ के माध्यम से हुई थी। ‘संचेतना’ में छपी वह कहानी मुझे अच्छी लगी थी। दलित-स्त्री के शोषण की वह तस्वीर भयावह लगी थी। इसके बाद मुझे उनके दो उपन्यासों - ‘सीता’ और ‘मौसी’ को पढ़ने का मौक़ा मिला था। ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ से ये दोनों उपन्यास मुझे समीक्षा के लिए मिले थे। समीक्षा संभवतः 1999 में वहाँ छपी थी। मुझे जैसा याद है, समीक्षा कोई ख़ास पॉज़िटिव नहीं थी। अभी दो-तीन साल पहले रमणिका जी ने मुझे फोन करके वह समीक्षा मँगवाई थी। उनकी किताबों पर आई समीक्षाएँ एक किताब की शक्ल में आ रही थीं। उन्हें वह समीक्षा नहीं मिल रही थी। मुझे फोन कर भेजने को कहा था। मैंने ढूँढ़ कर उन्हें समीक्षा भेज दी थी। वह किताब तो अभी तक नहीं आ पाई है, पता नहीं अब आ पाएगी भी या नहीं?

मैं भागलपुर में ही था कि पता चला था, रमणिका जी अब दिल्ली में रहने लगी हैं। मैं धीरे-धीरे उनकी गतिविधियों से परिचित होने लगा था। पत्रिका के अलावा दलित, आदिवासी और स्त्रियों के पक्ष में वह लगातार काम करती रहती थीं। दलित, आदिवासी लेखन को उन्होंने बहुत बढ़ावा दिया था। ‘युद्धरत आम आदमी’ में वैसे भी ज़्यादातर सामग्री दलित, आदिवासी और स्त्री-विमर्श पर रहा करती थी लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने इन मुद्दों पर विशेषांक भी निकाले थे। उन विशेषांकों को किताब की शक्ल में प्रस्तुत भी किया था। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से उनकी ये किताबें मिलती रहती थीं और मैं उन पर लिखा भी करता था। कभी-कभी ख़ुद रमणिका जी किताबें भिजवा देती थीं। कुछ को छोड़कर बाक़ी पर मैं समीक्षा लिख ही देता था। रमणिका जी में दूसरे कई लोगों की तरह धूर्तत्व नहीं था इसलिए मैं भी जब अपनी किताबें ‘आम आदमी’ में समीक्षा के लिए भेजता, वह देर-सवेर किसी से समीक्षा करवा ही देती थीं। मुझे याद है कि 2007 में ‘झौआ बैहार’ का पेपर बैक संस्करण जब आया था मैंने उन्हें दो प्रतियाँ भेजी थीं। उन्होंने किताब पढ़कर मुझे फोन किया था, तारीफ़ की थी। किसी से उसकी समीक्षा भी करवाई थी। ‘आम आदमी’ में मैं जो कुछ भी छपने को भेजता, वह ज़रूर छापती थीं। कविता, कहानी, समीक्षा, संस्मरण...मेरी काफी चीज़ें वहाँ छपी थीं।

रमणिका जी से कभी-कभार फोन पर भी बात हो जाती थी। वो बार-बार आने का आग्रह करती थीं। मैं दो ही बार उनके यहाँ जा पाया था। एक बार ऐसे ही मिलने, दूसरी बार जब उन्होंने ‘रमणिका फाउंडेशन’ की मासिक गोष्ठी में कहानी-पाठ के लिए बुलाया था। 2017 की मई में मैंने वहाँ अपनी कहानी ‘वह तिल’ पढ़ी थी। पंखुरी सिन्हा और संदीप मील भी कहानी-पाठ के लिए बुलाए गए थे। वहीं उन दोनों से पहली बार मुलाक़ात हुई थी। पहले से ही तय होगा तभी संचालक ने मुझे गोष्ठी की अध्यक्षता करने को कहा था। मैंने विनम्रता से कहा था – “एक तो मैं ख़ुद कहानी पढ़ रहा हूँ, दूसरे रमणिका जी यहाँ उपस्थित हैं। मैं अध्यक्षता कैसे कर सकता हूँ? मैं रमणिका जी से अध्यक्षता करने का आग्रह करता  हूँ।” बीमार होने के बावजूद रमणिका जी आकर हमारे साथ बैठ गई थीं। उन्होंने कहानियों पर टिप्पणी भी की थी। 

कार्यक्रम और उसके बाद फोटो भी लिए गए थे। एक बार रमणिका जी ने मुझे अपने पास बैठने को कहा था। फोटो खिंचवाने में हमेशा पीछे रहने वाला मैं – मैंने पंखुरी जी को वहाँ बैठा दिया था। मुझे भी उनकी बगल में बैठना ही पड़ा था। वही फोटो पंखुरी जी ने उस समय फेसबुक पर डाला था, रमणिका जी के गुज़रने के बाद भी डाल दिया!

रमणिका जी एक साथ कई काम किया करती थीं। सहायता के लिए उन्हें किसी न किसी की ज़रूरत महसूस होती थी। उन्होंने मुझे भी दो-तीन बार कहा था कि उनकी कुछ किताबें तैयार करने में मदद कर दूँ। लेकिन एक तो दूरी, दूसरे बेटी को अकेले छोड़कर जाने की समस्या और तीसरे उनके बारे में सुनी हुई कुछ बातें – मुझे वहाँ जाने से रोक देती थीं। रमणिका जी के यहाँ आने-जाने और काम करने वाले कई लोगों ने मुझसे कहा था कि वह काम करवा लेती हैं, क्रेडिट नहीं देतीं। क़ायदे से तो काम करने वाले व्यक्ति का नाम भी किताब में जाना चाहिए लेकिन वह अपना ही नाम ही देती थीं। उनकी सामंती सोच और शोषक चरित्र के बारे में जब कोई मुझसे कुछ कहता, मैं सोच में पड़ जाता। जिस स्त्री ने हजारीबाग में सामंतवाद के ख़िलाफ़ लड़ाइयाँ लड़ीं, शोषित आदिवासियों के लिए लड़ते हुए लठियाँ खाईं, पुरुषों के शोषण को सहा, वह सामंत और शोषक की भूमिका कैसे अपना सकती हैं ? मेरे पास उनके इस व्यक्तित्व का कोई व्यक्तिगत अनुभव तो नहीं है लेकिन कहने वाले व्यक्तियों पर अविश्वास करने का कोई कारण भी तो नहीं है? आज से क़रीब दस वर्ष पहले एक व्यक्ति ने तो उनके ख़िलाफ़ काफ़ी-कुछ लिख भी दिया था!

नकारात्मकता से दूर हटकर देखें तो निश्चय ही रमणिका जी ने कई ज़रूरतमंदों को सहारा दिया था। नौकरी दी थी। हिन्दी का कोई प्रकाशक जहाँ किसी संपादक को आठ-दस हज़ार से ज़्यादा नहीं देता था, रमणिका जी बीस-पच्चीस हज़ार देती थीं! दलित, आदिवासी एवं स्त्री-साहित्य के संकलन-संपादन तक ही उन्होंने ख़ुद को सीमित नहीं रखा था, इनके लिए संघर्ष भी किया था, इनकी सहायता भी की थी। पैसे की कोई कमी उन्हें नहीं थी इसलिए भी यह सब करना उनके लिए आसान रहा था। 

अभी 23 फरवरी को अर्चना वर्मा जी की शोक-सभा में मैंने उन्हें दूर से ही देखा था। कार्यक्रम के बीच में ही वह जा रही थीं। मैं पीछे बैठा था, उस समय मिलना संभव नहीं था। मैंने उनको बस जाते हुए देखा। बगल में बैठे मित्र आशुतोष से मैंने कहा – “रमणिका जी काफ़ी कमज़ोर हो गई हैं। बीमार भी रहती हैं।”

“हाँ ! उम्र तो हो ही गई है। इन्होंने काम काफ़ी किए हैं।”

“इसमें कोई दो मत नहीं!” मैंने कहा था। 

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