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काँटा

कोई नहीं जानता था, वह कौन था? कहाँ से आया था? मगर जब से वह आया था इसी बस्ती में रह कर कुछ न कुछ काम कर अपना गुजर-बसर कर रहा था। फटेहाल कपड़े, बिगड़ी दशा और दुर्बल शरीर के साथ चुपचाप दीन-दुखियों की सेवा कर रहा था। यही उस की पहचान थी। नाम था दयालचन्द्र।

वह बोलता बहुत कम था, मगर आज वह अपने स्वभाव के विपरीत बोल पड़ा, "दीनानाथ! आप अपना मकान मत बेचिएगा। बच्चों को मकान बनाना हो तो अपने पैसे से बना लें। बाड़े में बहुत जगह है।”

"मगर आप को क्या एतराज़ है?" बड़े बेटे को ग़ुस्सा आ गया। एक अनजान व्यक्ति उस के घरेलू मामले में दख़ल दे; वह कैसे बर्दाश्त कर सकता था!

"मुझे भला क्या एतराज़ हो सकता है? मैं तो एक नेक सलाह दे रहा था," दयालचंद्र ने अपना हाथ दिल पर रख कर दो-एक बार उसे थपथपाया।

"फिर आप, हमारे मामले में टाँग क्यों अड़ा रहे हैं। पहले भी पिताजी को सीखा कर पेंशन का पैसा बैंक में डलवा चुके हो। जिस का ब्याज का पैसा लेने हर माह बैंक जाना पड़ता है?" छोटे पुत्र में आँखें तरेर कर दयालचंद्र की ओर देखा।

वे चुपचाप उठ कर जाने लगा। उन की इच्छा हुई कि कह दे, "बेटा! मैं विश्व-प्रसिद्ध कंपनी का मालिक था। मैं ने भी वही ग़लती कि जो तेरे पिता तुम्हारे कहने पर करने जा रहे हैं, जिस की सज़ा मैं आज तक भुगत रहा हूँ" मगर वह प्रत्यक्ष रूप से इतना ही कह पाया, "बेटा! जिस के पैर में काँटा चुभता है दर्द उसी को होता है।"

यह सुन कर दीनानाथ के बेटों ने कंधे उचका दिए, "सिरफिरा और पागल है शायद।"

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