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काश!आदर्श यथार्थ बन पाता

काश!आदर्श यथार्थ बन पाता।
सारा ज्ञान भरा पड़ा है किताबों में
लेकिन सुकून किताबों से 
बाहर निकल कर ही मिलता है।
 
एक हद तक ही ज्ञान का भूसा भर सकते हैं
अपने दिमाग़ में;
उसके बाद ऊब होने लगती है।
 
फिर ज़रूरत पड़ती है
किताबों से बाहर निकल खुले परिवेश में आने की।
सारी आदर्श की बात जो सीखते हैं
किताबों से;
कुछ भी तो काम नहीं आता यथार्थ में।
 
कोरा आदर्श फुर्र हो जाता है
एक पल में ही;
जब आसमान से लुढ़ककर ज़मीन पर
गिरते हैं धड़ाम से।
 
एक गाँधी न जाने –
कितनी किताबों में समाया है
क्योंकि उसने आदर्श को 
यथार्थ बना कर दिखाया है।

किताबें न ही यथार्थ से सराबोर हों
न ही हो आदर्श की उनमें भरमार।
किताबें सरल सुगम सुपाच्य हों
जिन्हें पढ़ पाठक ऊबे नहीं
बल्कि अपना जीवन जीवन्त होता
देख मुस्कुराये
अपना हूबहू अक्स देख चौंक जाए
उन किताबों में।

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टिप्पणियाँ

राजनन्दन सिंह 2021/05/07 01:55 PM

अपना हूबहू अक्स देख चौंक जाए उन किताबों में। प्रवीण जी, आपके कविता की यह पंक्ति और इसका भाव बहुत अच्छा लगा।

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