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कबीर के जन्मोत्सव पर

चिह्नित कर गए कबीर
जिस डगर पैरों की छाप
मैं पथगामी उसी मार्ग की
शीघ्र पूर्ण हो भटकाव

 

कबीर तुम मेरे उन्मुक्त जज़्बात
वेगित नदी के प्रचंड उन्माद
तुम्हारी झीनी चदरिया तले
रचती मैं विद्याओं का महारास

 

रात से चुराकर मैं श्याम रंग
लांछित करती लौकिक ज्ञान
चेतना इंद्रधनुष में करके स्नान
एक हो जाती तुमसे रंगकार

 

अस्तित्व में तुम हो प्रतिमूर्त
तुम में गुंजित परम का नाद
सुशोभित हो अनहद के पार
समग्र गुप्त अनुभूतियों के सार

 

नीरव चित्त की शून्य कंदरा में
आत्मा होती तुमसे अंकमाल
तुम्हारी वाणी मेरा अंगत्राण
शीघ्र पाऊँगी तुम्हारा विस्तार

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