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कहाँ गया बचपन...

लाडलों का कहाँ गया बचपन
वो रूठना और मचलना, 
बात-बात अनबन 
छत पर सोना छूटा, 
छूटा आसमान का ज्ञान,
सप्त ॠषि व ध्रुव तारे की, 
कठिन हुई पहचान,
मिट्टी के घरौंदे छूटे,
 छूट गया आँगन॥
लाडलों का कहाँ........

 

जोड़-बाकी का ज्ञान कंचों, 
सहज सीख जाता था,
और निशाना संतोलिया से, 
उसको आ जाता था,
आज सुविधा बेहतर उसको, 
फिर उदास क्यूँ मन॥
लाडलों का कहाँ........

 

नाव बना कागज की,

और पानी में तैराना,
कहाँ मिला इनको बारिश में, 
छपक-छपक के नहाना,
मात-पिता की इच्छाओं ने, 
छीना तन और मन॥
लाडलों का कहाँ........ 

 

नानी-दादी के किस्से ना, 
जिन्हें मिली हो गोद,
क्या चिकने कागज की पुस्तक, 
दे पायेगी मोद,
तीन साल का बालक भेजा, 
विद्यालय बनठन॥
लाडलों का कहाँ........

 

गुड्डे-गुड़ियों का खेल सिखाता, 
उसे सामाजिक ज्ञान,
कागज के हवाई जहाज से,
मिले सहज विज्ञान,
मत छीनो बालक से खुशियाँ, 
ऐसे करो जतन॥
लाडलों का कहाँ गया बचपन॥

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