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कौन समझा है कौन जाना है

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कौन समझा है कौन जाना है
उम्र भर ये चला चली क्या है
 
है चलन ये गए ज़माने का
अब उसूलों पे कौन चलता है
 
देखकर तो पता नहीं चलता
कौन मीठा है कौन खारा है
 
दर्द फैला हुआ तो है हरसू
बस कहीं कम कहीं ज़ियादा है
 
मैंने महबूब की नज़ारत में
एक खिलता गुलाब देखा है 
 
जाल जिसमें बना लिया तुमने
मकड़ियों ये मकान किसका है
 
है डगर तो वही पुरानी सी
प्यार में सब नया नया सा है
 
चाहिए जाम आजकल सबको
सब्र के घूँट कौन पीता है

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