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ख़ामोश है अंतर्मन 'मैं मुक्ता हूँ' उपन्यास के परिप्रेक्ष्य में

समीक्षित पुस्तक: मैं मुक्ता हूँ
लेखक: डॉ. शशिप्रभा
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, १/२०, मेहरौली, न्यू दिल्ली-110030
पृष्ठ संख्या: 188
मूल्य: रु 400/-

भारतीय संस्कृति अपनी विशिष्ट पहचान के कारण सदैव विश्व के लिए आदरणीय और वंदनीय रही है। प्राचीन भारत की लोक कल्याणकारी भाईचारे और समन्वय की भावना ने विश्व को शान्ति, समता और अहिंसा का मार्ग दिखाया। कुटुम्बकम की भावना जनमानस के लिए प्रेरणा की आदर्श रही है। इसके प्रमुख कारण यह है कि समाज समाजिक संबंधों का जटिल जाल होता है और इन संबंधों का निर्माता स्वयं मनुष्य होता है। स्त्रियों की समस्या और स्थान को लेकर बातें तो बहुत सी हैं जो की जा सकें। स्त्री जिस परंपरा का शिकार है वह सदियों से हज़ारों शाखाओं प्रशाखाओं में कटती, बँटती, संकुचित, परिवर्तित, संवर्धन होती इस मुक़ाम पर पहुँची हैं। उसे गुरु, पिता, पति, भाई, बेटों ने ही नहीं माँ, दादी, परदादी ने भी बनाया है। एक पूरी की पूरी सामूहिकता जिसने स्त्री के वर्तमान को गढ़ा है।

"मैं कामायनी की श्रद्धा नहीं इड़ा हूँ, भावना नहीं प्रज्ञा हूँ, मात्र स्पन्दनमयी नहीं, तर्कमयी भी, मात्र समर्पिता नहीं अधिकारमयी भी।" नारी का यह कथन उसकी नूतन मानसिकता का आलेख है। उसके सबल व्यक्तित्व का दस्तावेज़ है, उसकी सजगता– समर्थता और शक्ति का प्रतिबिंब है। उसकी अस्मिता का आईना है। 

लेखिका के शब्दों में, "यह उपन्यास आत्मकथात्मक, कल्पनापरक है और काफ़ी कुछ यथार्थ को अपने में समेटे हुए है। इसमे मैं हूँ, मुक्ता है और इनके दायरे में बहुत से लोग हैं।" मुक्ता लेखिका की मानस पुत्री है। शशिप्रभा जी ने भारतीय समाज के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में घटित हलचल व परिवर्तन की परिस्थितयों को भिन्न-भिन्न रूप में प्रस्तुत किया है। यद्यपि उनके लेखन में आदर्श, संवेदनशीलता व भावुकता का अधिक सम्मिश्रण रहा है। मानव-मूल्यों, नैतिक-मान्यताओं के प्रति वह सचेत दिखाई देती हैं। इस युग में आर्थिक वैषम्य, सभी पुरानी मान्यताओं का संघर्ष, अंधविश्वास, परंपराओं का विघटन, समाज और संस्कृति के बदलते रूप समाज पर अपना प्रभाव डाल रहे थे। नारी पुराने बंधन तोड़कर स्वतंत्रता की आकांक्षा करने लगी थी, परंतु अपनी रूढ़ियों की ज़ंजीरों को देख लाचार हो उठी थी।फिर भी अपने अस्तित्व पर उसे विश्वास होने लगा था। नवीन चेतना के भाव ने उसमें उर्जा भर दी थी। मुक्ता का जन्म। 

भूत, वर्तमान और भविष्य को लेकर एक स्वरूप गढ़ने की कोशिश मे शशिप्रभा जी ने नारी के संघर्षात्मक कथा के अनेक उदाहरण दिए हैं जिससे नारी को गुज़रना पड़ा– बस में कंडक्टर पद के लिए महिलाओं के आवेदन पत्र का रद्द होना, बलात्कार के आरोप का बदनामी के डर से दबा देना, भ्रूण हत्या के कारण लड़के लड़कियों के अनुपात मे असमानता, रुचिका का न्याय के लिए गुहार लगाते हुए आत्महत्या करना आदि ऐसे और अनेकानेक घटनाओं को दिखाकर हमारी संवेदनशीलता को झकझोर दिया है। 

परिवार में तीसरी बेटी और चौथी संतान होने पर भी पढ़ाई-लिखाई में दक्ष होने के कारण उस ज़माने में कुछ क्षेत्रों में, जहाँ लड़कियों को जन्म लेने पर मार डालने की प्रथा थी, उनकी पढ़ाई-लिखाई को नज़रअंदाज़ नहीं किया गया। लगातार जीवन में संघर्षों का सामना करती हुई स्वयं को सशक्त बनाती गई। प्रबल मानसिक शक्ति की अधिकारिणी की मानसपुत्री "मुक्ता" का जन्म भी आज़ादी की मांग लिए हुआ। "मुक्ता की इच्छा शक्ति की प्रबलता या उसका सौभाग्य कि उसकी हत्या होते होते रह गई थी, उसे जन्म लेने और ज़िंदा रहने का अवसर उपलब्ध हो गया था लेकिन सबके साथ ऐसा नहीं होता!" (पृष्ठ 39) 

"मेरा प्रतिरूप मेरी तरह ही थी मुक्ता, सच्चाई और ईमानदारी पर विश्वास करनेवाली, सबसे खुलकर बात कर लेती, मन की पर्तें खोल देती, इसमें उसे कुछ ऐसा वैसा नहीं लगता। वह जो देखती महसूस करती कह देती है।" (पृष्ठ 40) अपने विचारों को एक पुख़्त धरा पर लाने के लिए – संबंधों से लागत लपेट से, मोह माया से असंपृक्त मुक्त हृदयनारी को लेखिका ने ढूँढ़ लिया था जिसकी मोती सी चमक और उसका उजलापन ही उसका आदर्श था।

कभी विकट परिस्थितयों में फँसी शोषण की चक्की में पिसते पात्र झकझोर देते हैं। बीच-बीच में विद्रोह की चिंगारियाँ भी भटकती हैं। कभी ये चिंगारियाँ चरित्रों के अस्फुट स्वर के रूप में उभरती हैं तो कभी लेखक का स्वर ही मुखर हो उठता है। अपने परिवेश, सहकर्मियों का बर्ताव उनके द्वारा किया गया छल कपट, उनकी लालसा, लोलुपता को दर्शाती अनेक घटनाएँ इस उपन्यास में बिखरी पड़ी हैं जो उपन्यास को रोचकता देने के साथ-साथ पाठक को समाज में, अपने आसपास रहनेवाले, होनेवाली घटनाओं से परिचित भी कराती हैं। शशीप्रभा जी ने अनेक पुरानी घटनाओं से हमारा परिचय कराया जो उन दिनों अक़्सर हर घर में देखी जाती थी। 

"आम दिनों मे वह रेडियो पर गाने सुन रही होती तो पति नम्बर बदल शास्त्रीय संगीत लगा देते, वह फिर गाने लगा लेती और पति फिर बदल देते, रेडियो तो उन दिनों घर में एक ही होता था, आज की तरह हर कमरे में अलग ए.सी. और अलग टीवी जैसी मान्यताओं का प्रचलन नहीं हुआ था।" (पृष्ठ 81)

संस्कृति, संस्कार और पंरपरा के आसपास घूमता ये उपन्यास अपनी नियति को तलाशता इसे वहाँ तक पहुँचाता है जहाँ स्त्री विमर्श के क्षेत्रफल फैले हैं। अपनी ईमानदार और सशक्त इच्छा में ये उपन्यास स्त्री पक्षधरता की नेक नियत आसक्ति में स्त्री स्वतंत्रता के लिए अनेक चुनौतीपूर्ण सवाल खड़े करता है। इस उपन्यास में लेखन चातुर्य नहीं बल्कि ईमानदार मन की मासूम अभिव्यक्ति है। इन सब के लिए इसमे एक आत्म संघर्ष भी दिखाई देता है। यह बड़ी बात है कि आत्मबोधता के लिए गहरी आसक्ति और मानवीय संघर्ष के बीच निराला संतुलन है। यही कारण है कि इस उपन्यास में यथार्थ को संभव करते हुए भी आन्तरिक संवेदनाओं के प्रति अपनी आसक्ति की ध्वनि को भी मुखर रहने दिया है।

"पता नहीं जो होगा भविष्य के गर्भ में है। मै किसी भी परंपरा के माध्यम से बँधने या बाँधने में विश्वास नहीं करती। मेरा मानना है कि विवाह और परिवार जैसी संस्थाएँ सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने की दिशा मे किए गए प्रयोग थे, जिसका तानाबाना उलझते-उलझते इतना उलझ गया कि सुलझाना मुश्किल हो गया। इन प्रयोगों ने और इनके साथ जोड़कर दी जानेवाली पवित्रता और अपवित्रता की विचारधारा ने व्यक्ति को क्रूर और निर्दयी बनाया है। परंपरा व्यक्ति पर भारी पड़ने लगी है।" (पृष्ठ 94) 

नारीवाद शब्द चाहे पश्चिम से आया हो, किन्तु इसकी अवधारणा एक रूपांतकारी प्रक्रिया से गुज़री है। भारत में नारीवादी संघर्ष स्री के जनतांत्रिक अधिकारों के साथ जुड़ा हुआ है। स्री ने देखा उसे क़ानूनी अधिकार तो मिले हैं, परंतु भारत का पारंपरिक समाज क़ानून में दिए गए इन अधिकारों के पालन से कतराता है। फलस्वरूप स्री को बहुतेरे आरंभिक जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है। इसके प्रतिरोध में स्री का विरोध स्वाभाविक ही था। सच बात तो यह है कि स्री के पक्षधर अधिकतर पुरुष ही रहे। राजा राममोहन राय से लेकर महात्मा गाँधी और अम्बेडकर तक ने स्री की पक्षधरता की है। 

जहाँ तक परिवार के भीतर–बाहर स्री पुरुष के संबंधों का प्रश्न है, पुरुष के अस्तित्व और व्यक्तित्व का प्रश्न है,भारतीय नारी क़तई इसे इनकार नहीं करती है। वह इनकार करती है पुरुष के वर्चस्व से, उसकी अधिकारवादी सत्ता और उपभोक्तावादी मानसिकता से। इसलिए मुक्ता डंके की चोट पर कहती है, "ऐसा नहीं है कि मैं संस्थाओं के महत्व को पूरी तरह नकारती हूँ, जानती हूँ कि सारे परिवारों में तल्ख़ियाँ नहीं होतीं और होतीं भी हैं तो तल्ख़ियों के बावजूद, आपसी समझदारी के बिना भी लोग उम्र भर निभाते हैं, शायद उनकी दृष्टि में इसके बिना कोई चारा ही नहीं होता। दूसरी बात यह भी है कि समाज में अधिकांश लोगों की यह अवधारणा होती है कि उन्हें परिवार तथा घरेलू काम-धंधे ही जीवन का उद्देश्य लगते हैं। झगड़ा-झंझट भी उनके जीवन की एक दिनचर्या बन जाती है।" (पृष्ठ 95) मुक्ता ने निर्णय लिया था प्रभात के साथ संबंध में रहने का, सदा उसके साथ रहने का नहीं, प्रभात के घर जाकर रहने का भी नहीं। उसे अपना घर तो चाहिए था जहाँ वो अपनी मर्ज़ी की ज़िन्दगी जी पाती। अपने परिवार के लोगों के विचार, इष्ट मित्रों की शंकाएँ, माता-पिता के असहयोग के बावजूद मुक्ता का प्रभात के प्रति प्रेम अपनी जगह अडिग रहा। पर विवाह के बिना दोनों का एक दूसरे के प्रति आकर्षण को समझ पचा नहीं पा रहा था।

पर "जाबाला का पूत" वाली अवधारणा ने मुक्ता को सशक्त बनाया और वो दो बच्चों की माँ बनी। ग्रंथियों से मुक्ति का एक मात्र रास्ता ही है सच्चाई को, प्रकृति को स्वीकार करना। इसके साथ और अनेक पात्र ऐसे आते हैं इस उपन्यास में जो मुक्ता के चरित्र की सकारात्मकता को, आन्तरिक शक्ति को अपने और परिवेश की नकारात्मकता से उबरने की, जूझने शक्ति बनते हैं। और मुक्ता उनसे लड़ते,अपनी प्रबल इच्छाशक्ति से उनका विरोध करते हुए अपने उद्देश्य पर डटी रहती है।

यह कहानी मुक्ता की है। कामकाजी होकर स्वतंत्र होकर रहने की तीव्र इच्छा के कारण उसने समाज मे एक मिसाल क़ायम की है। दायित्वपूर्ति के लिए भूमिका बदली है घर और बाहर दोनों स्थानों पर संतुलन बैठाने की कोशिश की है। आत्मनिर्भर, अकेली, पितृसत्ता से बाहर जाती स्री की संभावनाएँ बढ़ी हैं। मुक्ता ने बेशक अनेक क्षेत्रों में अपनी साख जमाकर पारंपरिक परिधियों को तोड़ा है। उसकी उठान उसकी आगे बढ़ने की रफ़्तार भले ही प्रभावशाली नहीं रही पर वह निरंतर अपने ध्येय पर आगे बढ़ती रही।

यथार्थ को रेखांकित करती हुई अनेक कहानियाँ इस उपन्यास में बिखरी पड़ी हैं। टूटन, अधकचरी मानसिकता, आधे-अधूरे व्यक्तित्व, भावनात्मक आवेश में लिए गए फ़ैसले, अहं का टकराव, पति या पत्नी में से किसी एक का हावी हो जाना, परिवार में माता-पिता का घटता महत्व, बच्चों की बढ़ती निरंकुशता, बढ़ती संवेदनहीनता जैसे और अनेक विषयों को बड़ी सार्थकता से शशिप्रभा जी ने इस उपन्यास मे उभारकर समाज का स्री के संघर्ष का एक चित्र प्रस्तुत किया है। आज की परिस्थितियों में, क़ानून की आड़ में, क़ानून के संरक्षण में नारी शोषण बंद तो नहीं हुआ बल्कि एक संवेदनहीन वातावरण उभरकर आया है। लेखिका के शब्दों में, "हम आधुनिक और सभ्य होने की प्रक्रिया में शायद ज़्यादा हिंसक होने लगे हैं।" (पृष्ठ 171)

आज की नारी की गोद में आनेवाले कल की सभ्यता पल रही है। इसी सभ्यता का मूल – स्री पुरुष का समानाधिकार है। उस समानाधिकार के द्वारा ही सभ्यता क पालन, सजना और सँवरना भी है। उसी का उत्तरदायित्व दोनों पर निर्भर है। नारी की सबसे अधिक दयनीय स्थिति तब पैदा होती है जब नारी अस्मिता को देह की परिधि और यौन-शुचिता में आबद्ध कर दिया जाता है। 

मॄदुला गर्ग ने जो उपन्यास लिखे उनमें "वंशज", " चित्त कोबरा", "अनित्य" तथा " मैं और मैं " के अंतर्गत स्री के व्यक्तित्व का बदलता रूप सामने आया है। इसके बाद भी कुछ अन्य लेखिकाएँ भी समकालीन उपन्यासों में एक ऐसी नई रचना दृष्टि को प्रस्तुत करने में सफल हुई हैं, जिसे हम आत्म निर्भर नारीवादी दृष्टिकोण कह सकते हैं। प्रभा खेतान, चित्रा मुदगल, मैत्रेयी पुष्पा आदि का नामोल्लेख किया जा सकता है।

वर्तमान समाज में स्री अपनी चिरपोषित अबला छवि को तोड़कर संर्षशील स्वचेतना से भरपूर नारी की छवि को बनाने मे संघर्षरत है। शशिप्रभा जी ने मुक्ता के दिल की हर धड़कन को सुना है और बेहद बारीक़ी, गहराई और ईमानदारी के साथ अपने उपन्यास के केनवास पर चित्रित कर दिया है। यहाँ सिमोन द बोउआ का कथन कितना सटीक बैठता है, "स्री जन्म नही लेती, वरन् जन्म के उपरांत स्री बनाई जाती है"।

"मैं मुक्ता हूँ " उपन्यास में मुक्ता ने लीक से हटकर अपनी ज़मीन तैयार की; उन्होंने अपनी पीड़ा और वेदना को कारुणिक नहीं, तल्ख़ और पैनी अभिव्यक्ति दी है जहाँ साहस, संघर्ष और विद्रोह और आज़ादी की परिकल्पना है। मुक्ता ने अपने जीवन के लिए स्वतंत्रता चुनी लेकिन कर्तव्यों से कभी मुखनही मोड़ा। अपनी माँ, प्रभात की माँ की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी निभाई। उसके संपर्क में जो भी बुज़ुर्ग महिला आती उनसे मुक्ता का जुड़ाव हो जाता। अंत तक बिना वैवाहिक बंधन मे बँधे लगभग बीस वर्ष तक समानान्तर चलते हुए उन्होंने अहसास किया कि वे एक दूसरे के साहचर्य और सहयोग के लिए बने हैं जैसे अमृता और इमरोज बने थे (पृष्ठ 182)। दोनों ने मिलकर एक वृद्धाश्रम बनाया जहाँ दिन-ब-दिन मुक्ता का परिवार समृद्ध हो रहा था जबकि लोगों के परिवार छोटे और मकान बड़े। दोनों आज भी मुक्त हैं और साथ भी हैं। आत्मीय संतोषजनक उपन्यास ने जीवन में सच्चाई, ईमानदारी और निष्ठा से जीने का सबक़ सिखाया अकेले और अपने बलबूते पर। मुक्ता के विचारों और मानसिक शक्ति को नमन। 

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