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ख़त

बरसों पहले 
बिछुड़ते वक़्त 
तुमने जो ख़त 
मुझे दिया था 
उसमे अब 
झुरीयाँ सी 
पड़ने लगी हैं, 
सियाही फीकी 
पड़ने लगी है।


अश्कों में 
डूबते-तैरते अल्फ़ाज़ 
अब बेजान से 
लगने लगे हैं , 
अपनी कशिश 
खोने लगे हैं ।
ख़त का रंग 
पीला पड़ने लगा है  
कहीं-कहीं से 
छितरने लगा है, 
सच कहुँ तो 
मुझ जैसा 
लगने लगा है।


बंद अलमारी मे रखी 
कमीज़ों की तह मे 
क़ैद हो कर 
बची हुई ज़िन्दगी 
जी रहा है ।
मेरी तरह ।

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