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खट्टे–मीठे अनुभव: सुभाष चन्द्र लखेड़ा – 001

जीवन में हम जिन लोगों के संपर्क में आते हैं, उनमें से कुछ को समझना कठिन होता है। वे कहते कुछ और हैं और करते कुछ और। ऐसे ही एक व्यक्ति की आज याद आई तो सोचा इसे आप सबसे साझा करना चाहिए।

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में केंद्रीय हिंदी निदेशालय, राम कृष्ण पुरम, नई दिल्ली के सेवानिवृत एक अधिकारी से मुझ जैसे अनेक हिंदी विज्ञान लेखकों के पास एक पत्र आया जिसमें उन्होंने आग्रह किया कि हम उन्हें अपने चुनिंदा विज्ञान लेखों की फोटो कॉपी भेजें ताकि वे उन्हें अपनी एक योजना के तहत पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर सकें।

उनका कहना था कि जो भी पुस्तक छपेगी, उसके लिए लेखक को बतौर मानदेय दस हज़ार रुपए दिए जाएँगे।

मेरे एक क़रीबी लेखक मित्र (?) ने मुझे कहा कि इस अधिकारी पर कोई विभागी कार्रवाई चल रही है और यह यक़ीन करने लायक़ इंसान नहीं है।

कुछ महीने बाद मुझे पता चला कि जिन लेखकों ने उस अधिकारी को अपने लेखों की फोटो प्रतियाँ भेजीं थीं, उनमें मेरे वह क़रीबी लेखक मित्र भी शामिल थे। यह जुदा बात है कि वह योजना परवान नहीं चढ़ी।

आपको यह बताना ज़रूरी है कि मैंने उस अधिकारी को अपने लेखों की फोटो कॉपी नहीं भेजी थी।

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