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कोरोना बनाम (को) रोना

वे सभी दुनियाँ में लगातार हो रहे  मानवमूल्यों के अवमूल्यन से चिंतित थे। धर्मराज ने कहा, "धर्म की स्थापना करना तो भगवान का काम है। वे चाहें तो अवतार ले लें और अपनी ड्यूटी करें।"

धर्मराज की सभा में कई देवदूत थे, जिनमें से हरेक की अपनी-अपनी राय थी जिसे रखने को वे बेचैन से थे।

एक देवदूत बोला, "अभी भगवान के अवतार लेने का समय नहीं आया है।"

दूसरा ने बात काटी, "तुमको किसने बताया,भगवान ने या समय ने?"

पहले ने दलील दी, "जब धर्म का लेशमात्र भी नहीं बचेगा। गाय, गंगा और तुलसी  पृथ्वी से लुप्त हो जाएँगे... तब।"

धर्मराज ने विचारों में डूबते हुए कहा, "अच्छा।"

तीसरे देवदूत ने प्रश्न उछाला, "तो फिर अभी क्या दिक्क़त है?"

चौथे ने हताशा जताई, "दिक्क़तें कई हैं, एक हो तो कहें!

पहने ने तंज कसा, "आप एक ही कहें।"

मामला तूल पकड़ता देख धर्मराज बीच में ही बोल पड़े, "देखिए (दिखाने को था नहीं कुछ फिर भी वे बोले)! देखिए, आप सभी देवदूत एक-एक करके समस्या बताएँ  ततपश्चात उसका समाधान भी सुझाएँ।"

पहले देवदूत ने कहा, "सभी पृथ्वीवासी आध्यात्मिकता से दूर होते जा रहे हैं। वे भौतिक वस्तुओं के पीछे हाथ धो कर पड़े हुए हैं। सुविधाओं और साधनों की  येन केन प्राप्ति के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। सही ग़लत रास्ते का विचार नहीं करते। अगर कुछ भी मूल्यवान पा जाएँ तो जोंक की तरह उससे चिपक जाते हैं। इतना ही नहीं वे समूची प्रकृति पर अपना आधिपत्य चाहते हैं। पृथ्वी के संसाधनों का मानव स्वयं को राजा समझने लगा है। पैसा(धन) जिसे कि हाथ का मैल कहा गया है, ये पृथ्वीवासी उसे छोड़ना नहीं चाहते अपितु मैल पर मैल इकट्ठा करने में लगे रहते हैं।"

धर्मराज ने पूछा, "तो आपकी दृष्टि में इसका समाधान क्या है?"

पहले देवदूत ने समाधान सुझाया, "महाराज, इन पृथ्वीवासियों से खूब हाथ धुलवाए जाएँ ताकि मैल छूट जाए।"

धर्मराज मुस्कुराए, "अच्छा।"

दूसरे देवदूत ने अपनी शिकायत सामने रखी, "पृथ्वीवासी आजकल सतही रिश्ते बनाते हैं। सरसरी निगाह से अपने लोगों को देखते हैं, ऊपरी मेल-मिलाप रखते हैं। भावनात्मक तौर पर रूखे होते जा रहे हैं। मित्रों से घिरे होने का दिखावा करते हैं, गले मिलते हैं, हाथ मिलाते हैं और निकटता का स्वांग भरते हैं लेकिन भीतर ही भीतर एकाकी और दुखी रहते हैं। इन्हें ये पीड़ा बनी रहती है कि इन्हें पहचाना नहीं गया, ये तो ऐसे नहीं थे, इन्हें ग़लत समझा गया आदि। अंततः ये ‘डिप्रेशन’नामक बीमारी के मरीज़ बन जाते हैं।"

धर्मराज के माथे पर बल पड़ गए। वे बोले, "समाधान...?"

दूसरे देवदूत ने उत्तर दिया, "इसका समाधान बहुत सरल है महाराज। ये मानव गले मिलने, हाथ मिलाने और पीठ थपथपाने जैसी यांत्रिक क्रियाएँ न करें।"

धर्मराज ने मुस्कुराते हुए पूछा, "तो क्या सामने आए परिचित को ऐसे देखें जैसे बरसात में बिजली के खम्बे को देखते हैं…..दूर से?"

दूसरा सकपकाया, "नहीं महाराज। इन्हें हाथ  मिलाने और गले मिलने के स्थान पर थोड़ी दूर से अभिवादन करने को विवश किया जाए क्योंकि स्पष्ट दृष्टि के लिए उचित दूरी आवश्यक है।"

धर्मराज आश्वस्त हुए बोले, "अच्छा।"

तीसरे को आपत्ति थी, "पृथ्वीवासियों में जीवजंतुओं के प्रति दया भाव का लोप होता जा रहा है। जब मम्मी मछली के सामने बच्चा मछली को धोखे से काँटे में फँसा कर लाया जाता है और पका कर खा लिया जाता है तब मम्मी मछली को कितना दुख होता होगा, इस बात की इन्हें परवाह नहीं। इसी भाँति मानव अपने से दुर्बल और छोटे अन्य प्राणियों का भी निर्ममतापूर्वक भक्षण करता है। इसे रोकना होगा ताकि केंचुआ, चमगादड़, कॉकरोच और पक्षी आदि जीव बचे रह सकें।"

धर्मराज ने प्रश्न किया, "कैसे?"

तीसरा समाधान दिया, "इन्हें शाकाहार की ओर बलपूर्वक मोड़ना होगा। ये योगाचार्यों सौहार्दपूर्ण आग्रहों पर कान नहीं देते।"

धर्मराज गम्भीरता से बोले, "अच्छा।"

चौथा देवदूत बोला, "आजकल देखने में आ रहा है पृथ्वीवासी धनोपार्जन सम्बन्धी कार्यों में कोल्हू के बैल की भाँति लगे रहते हैं, अपने परिवार को समय नहीं देते। बच्चों के साथ खेलते नहीं, बुज़ुर्गों से क़िस्से नहीं सुनते और हमजोलियों की संगति में कहकहे नहीं लगाते।"

धर्मराज मुस्कुराये, "समाधान...?"

चौथा उत्साहित होकर बोला, "इन्हें चौदह दिनों तक इनके घरों में बंद कर दिया जाए ताकि ये परिवार के साथ समय बिताएँ। बात- चीत, हँसी-ठिठोली और कहासुनी करके ये एक दूसरे के निकट आएँ। इनकी उदासी और तनाव दूर हो।"

धर्मराज ने हामी भरी, "अच्छा।"

हर बार धर्मराज के ‘अच्छा’ कहने के साथ ही देवदूत प्रसन्नता से फूल कर कुप्पा हो जाते और अति भावुकता में थोड़े निकट आ जाते। अन्त में वे फूलते-फूलते एकमएक  हो गए। एक हुए उन दूतों ने अपना एक नाम रख लिया - "कोरोना"।
अनीता श्रीवास्तव
टीकमगढ़ म प्र

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