अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

कुहासा

इस कुहासे में समाये जाने कितने अंग होंगे।
एक उपासी ने सजाये कितने भक्ति रंग होंगे। ।
होके मुकुलित मुकुल बोली हर दिशा में भृंग होगे। 
भ्रमर निर्मोही कहाते ले सुरभि क्या वे संग होंगे।।

व्योम में सृष्टि की रचना होम में आहुति का जलना। 
सोंचता हर पल यही हूँ क्या कहीं नव रंग होंगे।।
ओ सृजन के रूप कारक हो प्रलय के भी संहारक। 
नव सृजन मे सृजन के कितने ही अभिनव रंग होंगे।।

 

फूल हंसता शूल चुभता है यही जीवन कहानी। 
कोई आशीर्वाद पाता और किसी पर व्यंग होंगे। ।
दिवस जाता रात्रि आती दीप की लौ प्रखर होती। 
प्राण ले आहुति चढ़ाने प्रेम के ही पतंग होंगे।।

 

मिलन पथ दुर्गम बहुत है लक्ष्य कैसे प्राप्त होगा। 
आस लेकर प्यास बढ़ती जाने कितने प्रसंग होंगे।।
धैर्य की डोरी पकड़ कर राह कुछ आसान होगी। 
नाम जपते गीत गाते जाने कितने ही मलंग होंगे।।

 

रवि किरण पाकर कुहासा छोड़ता है भ्रमित पथ को। 
ज्ञान की एक बूंद पाकर मन सभी मकरंद होंगे।।
अब गूँजती है एक वाणी मेरे अन्तस में सदा ही। 
गीत गाऊँगा तुम्हारे स्वर तेरे मेरे छन्द होंगे।।

 

मन सरोवर में खिलेगा पुन:एक सरसिज निराला। 
अष्ट दल में घूमते फिर विरह के ही विहंग होंगे।।
प्रेम कलिका का सभी एक साथ स्वागत ही करेंगे। 
ले सुरभि इसकी सभी जग द्वेष से स्वछन्द होंगे।।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं