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कुंठा - अनीता श्रीवास्तव

कहानी: कुंठा
कहानीकार: अनीता श्रीवास्तव
समीक्षा: डॉ. शोभा श्रीवास्तव 

 

अनीता श्रीवास्तव द्वारा लिखित कहानी 'कुंठा' मनोविश्लेषण पर आधारित एक बेहतरीन कहानी है। वर्तमान सुविधा भोगी समाज में मनुष्य अपनी निजता में इस क़दर डूब चुका है कि उसे अपनी सुविधा अनुसार कार्य करते समय प्रायः सही-ग़लत का भान नहीं रह पाता है। ऐसा नहीं है कि मनुष्य को सही-ग़लत का ज्ञान नहीं होता किंतु उसकी टरका देने की प्रवृत्ति के कारण समस्याओं ने कब विश्व स्तर पर भयावह रूप ले लिया है इसे वह महसूस ही नहीं कर पाता। अनीता जी की कहानी 'कुंठा' का पात्र अमर आधुनिक समाज का प्रतिनिधित्व करता है। वह एक ज़िम्मेदार पिता तो है ही, साथ ही स्व सुधार की दिशा में विवेकपूर्ण निर्णय लेकर ग़लत को छोड़ देने का साहस भी दिखाता है। वह अपने बच्चों से भी ऐसी उम्मीद करता है। दरअसल वर्तमान पीढ़ी का यही कर्तव्य है कि भावी पीढ़ी के लिए बेहतरीन एवं उपयोगी सोच विकसित किया जाए। अनीता जी ने अपनी इस कहानी में पॉलिथीन की बढ़ती भयावह समस्या एवं उसके दुष्परिणाम पर चिंता तो जताई है साथ ही सुधार की दिशा में संकेत करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि मनुष्य के स्व सुधार से ही समाज सुधार एवं समाज सुधार के द्वारा ही विश्व स्तर पर बेहतरीन व्यवस्था को स्थापित कर पाना संभव है।  इस बेहतरीन रचना के लिए अनीता श्रीवास्तव जी को बहुत-बहुत बधाई।

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