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लोकगीत और भारतीय संस्कृति पर इसके प्रभाव 

लोकगीत दो शब्दों के योग से बना है। लोग+गीत अर्थात् लोगों द्वारा निर्मित गीत। भारत में अनेक प्रकार की संस्कृति या विद्यमान है। अलग-अलग भाषा बोलने वाले और उनमें जाति के अनुसार विभिन्न अवसरों पर जो गीत गाए जाते हैं उन्हें ‘लोकगीत’ कहा गया है। कहा गया है कि “विश्व अथवा भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में हिंदी लोक-गीतों का साहित्य भाव, भाषा अथवा शिल्प आदि की दृष्टि से कुछ कम आकर्षक नहीं प्रतीत होता। हिंदी लोक-गीतों के इस साहित्य को हिंदी लोक-काव्य की भी संज्ञा भी दी जाती है।  इसमें शिष्ट साहित्यिक कविता की रचनागत सतर्कता तथा काव्य शास्त्रीय नियमों की गतानुगतिकता भले ही न हो किंतु इसके उद्भव का मूल स्रोत मानवीय संवेदना ही है। व्यक्ति की चेतना, कल्पनाशीलता तथा भावना प्रवणता समूह में घुल-मिल कर तथा समूह की वाणी बनकर लोक-काव्य का स्वरूप ग्रहण करती है। हिंदी लोक-गीत इस रचना प्रक्रिया के अपवाद नहीं हैं। इन गीतों ने हिंदी की शिष्ट साहित्यिक काव्य धारा के उद्भव और विकास में बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इस दृष्टि से इसका स्वत्रंत अध्ययन बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ हैं।”1 लोकगीतों में जनसाधारण के हृदय के सरल एवं सहज उद्गार होते हैं जो वास्तविक एवं व्यवहारिक जीवन से जुड़े हुए होते है। 

इन गीतों में व्यक्ति जीवन के विविध रूपों के दृश्य देखने को मिलते है। जन्म से लेकर मृत्यु के साथ-साथ माता-पिता के करुण स्वर, आनंद, विवाह के अवसर पर बधाई एवं मंगलाचार के रस की ध्वनि और कृषि तथा किसान की ख़ुशी और मार्मिक अभिव्यक्ति के गीतों का रूप देखने को मिलता है। लोकगीत भारतीय समुदाय में असंख्य प्रकार के हैं। लोकगीतों में अलग-अलग क्षेत्रीय एवं स्थानीय भाषा, बोली, संस्कृति, रहन-सहन, पूजा और अनेक प्रकार के संवाद एवं हाव-भाव देखने को मिलते हैं। 

संस्कृति से हमारा तात्पर्य—उस देश या समाज के गुण या विशेषता का रूप संस्कृति कहलाता है, जिसमें व्यक्ति अपने धर्म, जाति और परंपरा के अनुसार समाज में सोचने-विचारने और कार्य करने के स्वरूप में अंतर्निहित होता है। संस्कृति का शाब्दिक अर्थ है, ‘विकसित या परिष्कृत करना’। लोकगीत एक संस्कृति है किसी भी देश या समाज का लोक उसकी पहचान होता है। प्रो. अमर सिंह का कथन है, "संस्कृति निरंतर प्रवाह मान एक धारा है जो लोक में बहती रहती है उसमें नया- पुराना कुछ नहीं होता, श्रेष्ठ और निम्न की श्रेणियां हो सकती है। यह इतिहास का रहस्य हैं, सृष्टि की प्रक्रिया का रहस्य है कि कैसे कुछ जातियां समाज व् देश सृष्टि की चलती धारा के अनुरूप हो जाते हैं और उन्नति करते हैं।"2 

गीत, संस्कृति या लोग जीवन में कुछ समाप्त नहीं होता जो वस्तुएँ हमारे लिए आवश्यक एवं उपयोगी होती हैं। वह हमारे तथा समाज के लिए सर्वश्रेष्ठ होती हैं। जो कलाएँ मंगलकारी एवं कल्याणकारी होती हैं, व्यक्ति समय-समय पर इन कलाओं का जीवन में प्रयोग करता रहता है। भारतीय संस्कृति में लोक गीतों के प्रभावों को अनेक रूपों में देख सकते हैं। भारत एक बहुभाषी देश है अर्थात भारत के क्षेत्र में संस्कृति की छटा अनेक रूपों में बिखरी हुई है। भारतीय संस्कृति में अलग-अलग जाति और संस्कृति का अपना एक विशेष महत्व है। भारत की विशाल संस्कृति को उन्नतशील एवं समृद्धशाली बनाने में हर क्षेत्र का अपना विशेष योगदान होता है। एक और जहां भारत की उत्सभूमि अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, कलात्मक और संगीतक अभिव्यक्ति के लिए संपूर्ण भारत में अपना स्थान स्थापित करती है वही भूमि में पारिवारिक विवाह के रीति-रिवाज़, व्यभिचार, मूल्यों, भाषा, रहन-सहन और खान-पान का अनूठा संगम भी देखने को मिलता है। भारतीय संस्कृति में लोक गीतों को निम्न बिंदुओं के आधार पर देखा जा सकता है। 

परिवार समाज की महत्वपूर्ण इकाई है। संपूर्ण देश छोटे-छोटे परिवारों में वर्गीकृत है। भारतीय परिवार एवं समाज परिवारों में बँधा हुआ है। इसकी महत्ता के कारण भारत देश का महत्व और ज़्यादा बढ़ जाता है। भारतीय समाज की पारिवारिक संरचना संयुक्त परिवार पर टिकी हुई है। अलग-अलग स्थानीय प्रदेश में अधिकतम लोग संयुक्त परिवारों में रहकर ही अपना निर्वाह करते हैं। इसका मुख्य आधार प्रेम की भावना, संस्कृति, परंपरा और मान्यताएँ हैं। संयुक्त परिवार में व्यक्ति पर चाहे जितने भी कष्ट, विपत्ति एवं विषमताएँ क्यों ना हों परिवार एकजुट हो, समस्या को सहज एवं सरल भाव से दूर कर लेता है जैसा कि किस लोकगीत में व्यक्त हुआ है–

"पिया एकला गंडासा मत फेरियों, मत फेरियों हो
तेरी देहि-की-करडाई,
तेरा सारा कुंणबा ठाली सै,
हो ठाली सै-कोये ना किसै का भाई। 
मेरा बडला बीरा घेर में हे-रे-घेर में, 
मेरी भावज खेत तै आई,
म्हारा हो रह्या धारां का टैम सै, हे-रै-टैम 
सै तनै क्यूकर सुझै अचाई?”3 

इस लोकगीत में परिवार किस तरह से समस्या के प्रति एकजुट भाव देता प्रतीत होता है। संयुक्त परिवार में सभी व्यक्ति के गुण–दोष छिप जाते हैं। पूरा परिवार समस्या से लड़ने एवं संघर्ष करने के लिए तैयार हो जाता है। 

भारतीय समाज में विवाह एक सामाजिक एवं धार्मिक इकाई माना जाता है। विवाह को जीवन का आवश्यक संस्कार भी माना गया है। भारतीय समुदाय में विवाह संस्कार को धूमधाम और उत्साह से मनाया जाता है। वर और कन्या पक्ष अपने रीति-रिवाज़ों के अनुसार अनेक प्रकार के अनुष्ठान करते हुए प्रतीत होते हैं। जैसे सगाई, मेहंदी, भात, हल्दी-गीत आदि अनेक प्रकार शुभ कार्य किए जाते हैं। विवाह के संदर्भ में एक लोकगीत जो कन्या पक्ष में वधू गा रही है। मेरे बन्ने को किसने सजाया उसके प्रति भाव प्रकट कर रही है– 

"सुने री लचकदार बन्ना मेरा किनने सजाया जी। 
बाबा सजाया जी दादी सजाया जी, दादी का तावेदार,
दादी कू जोड़े हात। बन्ना मेरा किनने . . .
अम्मा कू जोड़े हात। बन्ना मेरा किनने सजाया जी।”4 

इसमें बन्ने के रूप-सौंदर्य का वर्णन किया जा रहा है। वर के सजने-सँवरने के बाद उसके रूप का जो आकर्षण कन्या को प्रभावित कर रहा है।  

संयुक्त परिवार में जहाँ एक और सहृदयता एवं प्रेम का रूप स्वरूप देखने को मिलता है वहीं परिवार में उत्पन्न अनेक प्रकार के व्यभिचार भी देखने को मिलते हैं। परिवार में अलग-अलग विचारधारा वाले लोग जब साथ में जीवन-निर्वाह करते हैं तो अनेक प्रकार की विसंगतियों का जन्म होता है। यही विसंगति कब कलह के रूप-व्यवहार में देखने को मिलती है, जैसे: आयु के आधार पर, समय एवं वातावरण के आधार पर, व्यापार में परस्पर अंतर होने पर और भेदभाव के आधार पर देख सकते हैं। इस लोकगीत में संयुक्त परिवार में सास–बहू, नंद–भावज और जेठानी–देवरानी के संबंधों में परस्पर दूरी आ जाती है– 

"जेठ मन्नै न्यारी कर दें, क्यूँ घर में राड़ जगावै,
तेरी बहू का घर मैं ‘टोरा’ [रोब] आधी रात जगावै सै,
ठाआरा सर पीसण नै धर दे आधी रात जगावै सै,
इसी जिंदगानी में आग लगै, हो जडै रात्यं आवै रोंणा,
जेठ मन्नै न्यारी कर दें क्यूँ ............................जगावै। ”5

भारतीय संस्कृति में भाषा, खान–पान और विविध लोक-परंपराएँ और विश्वास आदि के आधार पर भी देखा और समझा जा सकता है। भारत बहुभाषी देश है जिसमें अनेक प्रकार के परिधान भी देखे और समझे जा सकते हैं। पुरुषों के परिधान महिलाओं से अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। इसके साथ ही खान-पान में भी अनेक प्रकार की विविधता पाई जाती है। उसी तरह भाषा का महत्व भी उसकी जाति के अनुसार अलग-अलग दिखाई देता है। भारतीय भाषाओं के साथ पश्चिमी देशों की भाषा का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता है। 

अतः कहा जा सकता है कि लोकगीत का महत्व संस्कृति के माध्यम से अनेक रूपों में दृष्टिगत होता हुआ दिखाई देता है जो साधारण जन-जीवन के व्यवहार सुख–दुख के एक–दूसरे से जोड़े रखता है। लोकगीत पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव आदिकाल से लेकर अब तक विद्यमान है और इसकी उपयोगिता एवं विशेषता अलग-अलग प्रकृति तथा सामाजिक–सांस्कृतिक रूप से देखी जा सकती है। लोकगीत हमारी संस्कृति के गौरव और धरोहर के रूप में अपनी मान–प्रतिष्ठा हमेशा से विकसित करते रहते हैं। 

संदर्भ-सूची:

  1. हिंदी भक्ति साहित्य में लोकतत्त्व– रविंदर, पृ.53

  2. पुस्तक-रचना और आलोचना– सत्य प्रकाश मिश्रा, पृ.802.

  3. हरियाणा की लोक-संस्कृति– डॉ. सावित्री, पृ.89 

  4. लोक साहित्य की भूमिका– डॉ. रवींदर भ्रमर

  5. हरियाणा की लोक-संस्कृति– डॉ. सावित्री, पृ.89 

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