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माँ लोरी सुना

माँ लोरी सुना, जिसमें,
अखण्ड भारत का इतिहास रचा हो।
सुना देश की गौरव गाथा तू,
जो सपूतों के रोम-रोम में बसा हो।
मधुर स्वरलहरियों से,
तन-मन में देशभक्ति का भाव जगा।
माँ तू ऐसी लोरी सुना,
कि कैसे विषधर भुजंगों को,
चट कर जाती हैं हज़ारों चींटियाँ?
और कैसे देश के अस्तित्व को,
निगल जाती हैं, हज़ारों कुरितियाँ?
मानवता की महानगरी से हारकर,
ईर्ष्या और द्वेष न आया,
हज़ारों सपूत मिट गए, फिर भी,
बदलाव कुछ विशेष नहीं आया।
नज़र आए जिससे अमिट चाँदनी,
नज़र आए पूर्णिमा।
माँ तू ऐसी लोरी सुना,
उपलब्धियों का ताँता भी न लगा
संस्कृति का अस्तित्व ही छिन गया,
विज्ञान का चमत्कार श्राप हुआ,
कला और साहित्य का,
स्वामित्व ही छीन गया,
बता इसके आगे और होगा क्या,
माँतू ऐसी लोरी सुना।

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