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महाराजा अग्रसेन

सदियों पुरानी बात है, अगरोहा के राजा अग्रसेन के बारे में किंवदन्ति प्रचलित है कि राजा बहुत ही दयालु प्रवृत्ति के राजा माने जाते थे। उनकी दयालुता के चर्चे सुनकर किसी दूसरे शहर से एक नवागंतुक उसी शहर में बसने के लिए अगरोहा आ गया। यह व्यक्ति भूकम्प की चपेट में आकर अपना सब कुछ गँवा चुका था। ना खाने को भोजन, ना सिर छुपाने को छ्त थी। किसी तरह इधर- उधर भटकता हुआ वह राजा के दरबार में पहुँचा, जहाँ उस समय एक सभा का आयोजन हो रहा था जिसमें राजा सारी प्रजा से बात करते थे और उनके कष्टों का निवारण करने का प्रयास करते थे। धीरे-धीरे राजा सभी के पास आते और उनकी कठिनाइयाँ सुनते और उन्हें दूर करते। जब इस व्यक्ति की बारी आई तो राजा ने कहा कि नए लगते हो हमारे शहर में? कहो क्या परेशानी है? अमुक हाथ जोड़कर बोला- महाराज आपकी दयालुता के चर्चे सुनकर आपके शहर में शरण लेने आया हूँ। न घर है न पैसा क्या करूँ? जीवन निर्वाह करना दुर्लभ है दाने-दाने को मोहताज हूँ।

राजा अग्रसेन को उस वृद्ध की आँखों में आँसू देखकर बहुत दुःख हुआ। वे वापिस जाकर अपनी गद्दी पर बैठे और सारी प्रजा से अनुरोध किया कि इस वृद्ध का घर बनाने में सब योगदान करें।

योगदान करने के लिये उन्होंने सबसे एक-एक ईंट देकर उसका घर बनाने में सहायता की माँग की, और साथ ही उस वृद्ध को एक-एक पैसा देकर मदद करने को कहा। इतना ही नहीं अपने मन्त्रियों की सलाह से राजकोष से कुछ धनराशि भी दिलवाई। कुछ ही दिनों में वह व्यक्ति उसी शहर का निवासी हो गया और सुख से जीवन व्यतीत करने लगा।

इसी प्रकार राजा अग्रसेन सभी की मदद करने के लिये प्रसिद्ध थे। राजा अग्रसेन के वंशजों को उन पर गर्व है और हमेशा रहेगा। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि उन्हीं की तरह हमें भी ज़रूरत-मन्दों की सहायता करनी चाहिए। इस दयालु नीति को बढ़ावा देना चाहिये।

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