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मैं भी लिखूँ कहानी

कल कहानी लेखन पर ढेर सारी बात चीत सुनी, सोचने पर बाध्य कर देने वाली। विभिन्न विचार, कहानी कैसे लिखी जाये, उसमें क्या क्या होना चाहिये और क्यों? शब्दों के अतिरिक्त बहुत कुछ!

यही सब सोचते-सोचते बहुत सी कहानियाँ याद आती रहीं, नई पुरानी कुछ आसपास की, कुछ किताबों की, जो पढ़कर भूल गई थी।

मैं भी लिखना चाहती हूँ कहानियाँ, बहुत सारी व ऐसी कि पढ़ने वाला भूल न पाये, कम से कम मन को मथे ज़रूर, चोट पहुँचायें।

इधर उधर देखने पर पाया कि कहानियों की कमी नहीं है। वह नानी की कहानियाँ जो कई रात चलती थीं, भूत प्रेतों की कहानियाँ, राजा रानी की कहानियाँ जिन्हें सुनकर कितने प्रश्न मन को झकझोरते थे, डर भी लगता था परन्तु उन कहानियों को हम अपने निर्दोष जीवन को उथल-पुथल नहीं होने देते थे व अपनी उन्हीं पुरानी राहों पर चल पड़ते थे, एक नई कहानी की प्रतीक्षा में।

इस अवस्था के बाद स्कूल कॉलेज में अँग्रेज़ी व हिन्दी के उपन्यास, कहानियाँ पढ़ने का समय आया, जिनका प्रभाव मन मस्तिष्क पर पड़ा परन्तु परीक्षायें पास करने के बाद उनका उपयोग पकड़ के बाहर ही रहा, हाँ कभी-कभी उन कहानियों के पात्र अपना रंग, कहीं कल्पनाओं में, कभी किसी अन्य ढंग से अवश्य दिखा कर भाग जाते।

जीवन अपनी चुनी हुई रफ़्तार से चलता रहा और कहानियाँ बुनता रहा, रुहानी, रुमानी, चुलबुली कहानियाँ!

और अब? जहाँ बैठो, जहाँ सुनो, कहानियाँ ही कहानियाँ! जीवन जीने की कहानियाँ! सच्ची, जीवंत! किसकी लिखूँ? अपनी, तुम्हारी या उनकी?

बहुत सी कहानियाँ हैं मेरे पास लिखने को, पर कभी-कभी उन कहानियों से घबरा जाती हूँ। क्यूँ? बहुधा यह घबराना ही रोक लेता है शायद। 

फिर लगता है कि इस तरह तो कितनी कहानियाँ अनकही रह जायेंगी। 

इसलिये मैं लिखूँगी, असमंजस में नहीं रहूँगी। जैसी भी बन पड़ेगी, लिखूँगी अवश्य।

मैं लिखूँगी! वह कहानियाँ जिनके पात्र कोई वैज्ञानिक, लेखक, संगीतज्ञ आदि नहीं थे, ना ही उन्होंने कोई बड़े पुरस्कार प्राप्त किये। बस वे हमारे चारों ओर हैं, हमारे मन मस्तिष्क में हैं, जो अनगिनत किताबों के पन्नों में भी हैं, जिनमें जीवन को मुँहतोड़ जवाब देकर अपना स्थान बनाने की क्षमता है। जिनका विस्तार दूर तक जाता है।

जो भी वर्जनायें उनके रास्ते में आयीं, उन्हें रौंदते हुये वे आगे बढ़ते गये। यही उनके जीवन का सबसे बड़ा उपदेश है और यही मैं अपनी कहानियों में आप सबको बताऊँगी।

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