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मैं जानता न था...

मैं जानता न था कि, तू भी ज़माने का चलन देगी, 
रख बेबसी अपनी समाज के रिवाज़ों का भरम देगी। 


एक दोपहर तेरा आँचल ओढ़े निकले थे हम,
‘वो चले दीवाने’ जैसे फ़िक़रों में कसे गए थे हम।
फिर ऐसे लम्हात गुज़रे तो अतीत में खो जाएगी तू ,
फिर अपने आप को खुद से दूर ले जाएगी तू ,
ऐसे आलम में किसी अपने को तू क्या सनम देगी?
मैं जनता न था कि, तू भी...
  

हल्की सी खरोंच देख मैं कितना परेशान हो गया था,
बेचैन होकर तेरी कलाई पर मैंने रुमाल लपेटा था। 
हमेशा साथ रखेगी उस रुमाल को ऐसा कहती थी तू ,
यादों से उड़ वो सामने आ गया तो क्या करेगी तू ,
उठ गयी कोई उँगली तो एक झूठ को जनम देगी।
मैं जनता न था कि, तू भी...


याद होगी तुझे वो सर्द भीगी-भीगी रात के तू , 
अपने ही साये से डर मुझसे लिपट गयी थी तू ,
गुज़र गया फिर ऐसा मंज़र तो रो ही देगी तू ,
बे-वज़ह अपने यार का कांधा भिगो देगी तू ,
पूछा जो उसने सबब तो उसे ख़ामोशी भरी चुभन देगी। 
मैं जनता न था कि, तू भी...

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