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मैं सूर्य पुत्र कर्ण  

मैं सूर्य पुत्र कर्ण
आज कुछ कहना चाहता हूँ
जीवन के तरकश बिखेरना चाहता हूँ
 
मैं सूर्य पुत्र कर्ण
क्यों बनाया सहनशीलता को वर्ण
मित्रव्रत अति कठिन, कौन वीर जीवन देता
तन, मन, धन, सर्वस्व देकर, कौन अपयश लेता
भाग्य सम्मुख हार, जिसके संकल्प ने न मानी
 
मैं सूर्य पुत्र कर्ण
हाँ पिता सूर्य माता कुन्ती राजकुमारी
झूला मेरा गंगा में बहती एक पिटारी।
सारथी अधिरथ ने देखते ही गले लगाया
मैं क्षत्रिय कैसा? जो सूतपुत्र सदैव कहलाया
माता- राधा, पिता- अधिरथ,अनुज शोण मेरा संसार
मत जाना गंगा तट को, माँ कहती बारंबार 
 
मैं सूर्य पुत्र कर्ण
चातक, चकोर, कोकिल, सारंग असंख्य पक्षियों का घर
गंगा-तट पर सुन्दर था, मेरा गाँव चंपानगर
प्रत्यूषा में जाग, कदंब की शीतल सायं को बुलाया
सुन्दर बचपन फिर लौट कर कभी नहीं आया
गंगातट, मिला जीवन वहीं, जा बैठा हुई जो अनमनी
सौभाग्य भी मिला, वहीं मिली वृषाली जीवन संगिनी 
 
मैं सूर्य पुत्र कर्ण
ये चमकते कुंडल मेरे कानों में क्यों हैं?
ये अभेद कवच मेरी काया पर क्यों है?
अस्त्र-शस्त्र, शिक्षा-शास्त्र क्यों क्षत्रिय अधिकार
शक्ति कौशल मिला और मिला तिरस्कार
प्रारब्ध भी कर रहा था विरोध
नियति ने दिया गुरु का क्रोध,
 
मैं सूर्य पुत्र कर्ण
मैं कैसे धर्म राज ज्येष्ठ कहलाता
क्या मैं भारत में श्रेष्ठ कहलाता
पार्थ-कर्ण क्या दोनों होंगे कुशल धनुर्धर
संग मेरे दुर्योधन, अर्जुन संग हैं गिरधर
अर्जुन ने निश्चित ही जीते है रण
कुंती को गर्व होता है जैसे लड़ा कर्ण
 
मैं सूर्य पुत्र कर्ण
रथ का पहिया युद्ध क्षेत्र में जब धँस गया
याद कर गुरु वचन राधेय रथ से उतर गया
भाग्य के मन में भी संशय होता होगा
अनन्य मित्र पाकर दुर्योधन को विस्मय होगा
इन्द्र ने पुत्र अर्जुन के लिए माँगा अभयदान
धर्म पथ पर चलकर प्राप्त हुआ अभिमान 
 
मैं सूर्य पुत्र कर्ण
आज कुछ कहना चाहता हूँ
जीवन के तरकश बिखेरना चाहता हूँ
नित एक युद्ध परिवर्तन का लड़ता रहा
मैं सूर्य पुत्र कर्ण शौर्य कथा गढ़ता रहा
कुरुक्षेत्र का जब-जब गुणगान गाया जाएगा
इस कर्म जग में सम्मान कर्ण भी पायेगा
कुल-गोत्र नहीं कौशल उच्च कहलाया जाएगा
तब परिवर्तन लाने को फिर कोई कर्ण आयेगा . . .
 

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