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मनुष्यत्व

अब यहाँ मनुष्य होने का,
कुछ सबूत होना चाहिए।
कुछ प्रमाण होना चाहिए।
अब शायद सूरत पा जाना पर्याप्त नहीं।
क्योंकि किस क्षण 
आपको यह एहसास हो जाए 
वर्तमान की भीड़ में,
हम कहाँ से कहाँ आ गए।
कब कोई खो जाए कहा नहीं जा सकता।
मैं इसलिए कह रहा हूँ कि-
अनुभव ने जो सच महसूस कराया
इसका परिणाम यह है कि
हर क्षण बताना पड़ता है।
यह समाज वर्चस्व का नहीं।
ईर्ष्या का नहीं,
घृणा का नहीं,
तेरे-मेरे का नहीं,
प्रतिस्पर्धा का नहीं,
महत्वाकांक्षा का नहीं,
नफ़रत का नहीं,
डर का नहीं और शायद एक का नहीं।
बल्कि मनुष्यत्व का है।
मगर वर्तमान की भीड़ में,
मनुष्यत्व बार-बार कुचला जाता है।
साँसों को क्षण-क्षण घायल किया जाता है।
और भविष्य डरा रहता है कि
मेरा परिणाम क्या होगा?
कितनी नफ़रत भरी पड़ी है,
वर्तमान की संकीर्ण गलियों में,
जहाँ से मनुष्यत्व द्रुतगति से निकलना चाहता है 
ताकि वर्तमान के कुछ पल भूत हो सकें।
और यह विश्वास लेकर फिर जीना चाहता है कि 
भविष्य में मनुष्य होने का अनुभव हो सके।

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