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मरीचिका - 2

(मूल रचना:  विद्याभूषण श्रीरश्मि)

धारावाहिक कहानी

1948-50

मेरे वैवाहिक जीवन की शुरुआत करोल बाग़ से हुई। विमल ने भारत सरकार के ही एक अन्य कर्मचारी, एक असिस्टेण्ट, के साथ मिल कर वहाँ 65 रुपए महीने पर दो कमरों का एक फ़्लैट किराये पर ले रखा था। 35 रुपए और बिजली-पानी का ख़र्च वह असिस्टेण्ट देता था, और बदले में एक कमरे के साथ-साथ रसोईघर भी उसी के पास था। बाथरूम वगैरह में दोनों किरायेदारों की साझेदारी थी। असिस्टेण्ट का परिवार छोटा था–पति-पत्नी और दो बच्चे। कम लोग होने की वज़ह से हमें फ़्लैट में कोई ख़ास परेशानी नहीं होती थी। मकान-मालिक भला आदमी था। वह दोनों के नाम से 30 और 35 रुपए की अलग-अलग रसीदें जारी कर देता था, जिससे मकान-किराया भत्ता आसानी से वसूल हो जाता था। मेरे लिए यह अनुभव अद्भुत था। कहाँ आरा का चार-पाँच कमरों और विशाल आँगनवाला मकान, और कहाँ यह 10 बाई 12 फ़ीट का क़बूतरख़ाना, जहाँ खाट, मेज़ और दो कुर्सियों के बाद तिल धरने की जगह भी नहीं बचती थी! खाना पकाने के लिए बरामदे में पार्टीशन करना पड़ा था।

रहने की जगह भले ही कम थी, पर विमल मुझे अच्छा लगने लगा था। जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण, उसकी स्पष्टवादिता, और मेरे प्रति उसकी आसक्ति– ये सब मुझे प्रिय थे। दफ़्तर से लौटने के बाद वह एक क्षण के लिए भी मुझसे अलग न होता, बैठा-बैठा बातें करता रहता– कुछ अपने दफ़्तर की और कुछ राजनीति की। किसी दिन वह दफ़्तर से कोई पत्रिका लेकर आता और उसमें छपी कहानियाँ सुनाने बैठ जाता। बीच-बीच में छेड़छाड़ भी चलती रहती। किसी-किसी संध्या को हम पहाड़ी पर भूली भटियारिन की सराय की तरफ़ घूमने निकल जाते। शुरू-शुरू में तो वह छुट्टियों में मुझे लाल क़िला, फ़िरोज़शाह कोटला, क़ुतुब मीनार, आदि ऐतिहासिक स्थल दिखाने ले गया, बाद में हम इण्डिया गेट जाकर बैठने लगे। महीने का पहला रविवार फ़िल्म देखने के लिए नियत हो गया। मतलब यह कि हम एक-दूसरे में सिमटते जा रहे थे। कबूतर-कबूतरी-सा था हमारा हाल। स्त्री के लिए इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा कि पति उसी में लीन हो जाए? चुनांचे, सब मिला कर मैं संतुष्ट थी जीवन से!

हमारे पड़ोसी असिस्टेण्ट महोदय, यानी शर्माजी, सभ्य-संयत भले आदमी थे, पर बेचारे आर्थिक संकट से परेशान रहते थे। उन्हें गाँव में रह रहे बूढ़े माता-पिता और छोटी बहन का ख़र्च भी वहन करना पड़ता था। वे दफ़्तर से घर सीधे वापस नहीं आते थे, दो जगह ट्यूशन पढ़ा कर लौटते थे। उनकी पत्नी गाँव की थीं और अनपढ़ भी थीं, लेकिन उनका स्वभाव बड़ा अच्छा था। अब तो लगता है कि उनका स्वभाव शायद इसीलिए अच्छा था क्योंकि वे न पढ़ी-लिखी थीं और न शहर के तौर-तरीक़ों से वाक़िफ़ थीं। दो प्यारे-प्यारे बच्चे थे उनके– सात साल की राधा और पाँच साल का भोला। दोनों पास की म्युनिसिपल पाठशाला में पढ़ते थे। उनकी "काकी-काकी" की रट अब भी कानों में गूँज उठती है कभी-कभी। उन लोगों के साथ के कारण अपरिचित-अनजान महानगर में भी ऐसा लगता, जैसे ब्याह कर एक भरे-पुरे घर में आई हूँ। ज़िन्दग़ी मज़े से कट रही थी।
कोई छः महीने बीते होंगे कि एक शाम विमल दफ़्तर से उदास-सा लौटा। उसे चिन्तित देख मैं भी परेशान हो गई, पर मैंने तुरन्त कुछ नहीं कहा। और दिनों की तरह ही मैंने उसके जूते उतारे, कपड़े यथास्थान रखे, और चाय बना कर ले आई। थोड़ी देर बाद मैंने विमल के मन की थाह लेने की चेष्टा की, "का बात है? काहे परेसान हैं हेतना?"

वह बोला, "कोई खास बात नहीं है, प्रतिमा। यूँ ही कभी-कभी शॉक लगता है अपनी ग़रीबी पर।"

"गरीबी? ई का कह रहे हैं आप? कौन बात के कमी है हमको?" मैंने हतप्रभ होकर पूछा।

"है, प्रतिमा, है। ग़रीब हैं हम लोग। हम चाहे आँख मूँद लें, पर दूसरे लोगों को हमारी ग़रीबी झट से दिख जाती है। मज़ाक बनाते हैं हमारा," उसके स्वर में वेदना छलकी पड़ रही थी।

मैंने ताड़ लिया कि दफ़्तर में किसी ने कोई चुभती हुई बात कह दी होगी। संदेह दूर करने के लिए पूछ बैठी, "कोई कुछो कह दिया का?"

"कहेगा क्या?" विमल ने फीकी-सी हँसी हँसते हुए कहा, "लेकिन कुछ नहीं कहा, ऐसा भी नहीं है। नॉन्सेन्स!"

"हुआ का? हेतना बड़ा कौन कमी है हममें जो दुसरा लोग से बर्दास्ते नहीं हो रहा है?"

"बात कोई वैसी बड़ी नहीं है, प्रतिमा। वह हमारा सुपरिण्टेण्डेण्ट है न, वह रास्कल आज एक नया सूट पहन कर आया था। मुझे अच्छा लगा, तो मैंने क्यूरिऑसिटी में पूछ लिया कि सूट पर कितना कॉस्ट आया। जानती हो, उस इडियट ने क्या जवाब दिया? बोला, 'पूछ कर क्या करेगा, तेरे बस की बात नहीं है! पूरे दो सौ का है, दो सौ का!' लगा जैसे उसने जवाब नहीं दिया हो, थप्पड़ मारा हो। उसकी बदतमीजी के बावजूद मुझे चुप रहना पड़ा। व्हाट एल्स कुड आई हैव डन? झूठ तो बोला नहीं था उस कुत्ते के पिल्ले ने! क्या मैं कभी दो सौ रुपए का सूट पहन सकूँगा? नहीं! क्या तुम कभी सौ रुपए की साड़ी पहन सकोगी? नहीं। क्यों? क्योंकि हम ग़रीब हैं। यू डी सी, अपर डिविजन क्लर्क। एक छोटा-सा कमरा, एक सस्ती-सी कॉट, एक टूटी-फूटी टेबिल, लकड़ी-ठुकी चेयर्स, बरामदे में किचन, दस रुपए की साड़ी, आठ का पैण्ट।" वह चारों-ओर देख-देख कर मानो ख़ुद-से ही बोलने लगा, "फिर बच्चे होंगे। म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ने जाएँगे। कॉन्वेण्ट के बच्चे उन पर रौब गाँठेंगे। अपनी क्रिकेट की बॉल उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मँगवाएँगे। बच्चे बड़े होंगे तो वह भी क्लर्क बनेंगे। खानदानी क्लर्क। कॉन्वेण्ट के बच्चे उनके अफ़सर बनेंगे, उन पर रूल करेंगे। वैसे ही, जैसे डायरेक्टर तो डायरेक्टर, वह टुटपुंजिया सुपरिण्टेण्डेण्ट भी मुझ पर रूल करता है।" 

मैं सकते में आ गई। तुरन्त समझ में नहीं आया कि क्या कहूँ। थोड़ी देर चुपचाप सोचती रही, फिर बोली, "आप ठीके कह रहे हैं। हम लोग अमीर नहीं हैं, गरीबे कहे जाएँगे। लेकिन ऐसा हमेसा थोरो चलेगा? कल आपका तरक्की हो जाएगा, फेर हमहूँ मजा से रहने लगेंगे। हेतना परेसान होने का जरूरत नहीं है।"

विमल के होठों पर निरीह मुस्कान उभरी, बोला, "यह सन् 48 है न? सन् 44 में ज्वाइन की थी सर्विस। अब तक यू डी सी का यू डी सी हूँ, और शायद चार साल और ऐसे ही सड़ूँगा, तब जा कर प्रोमोशन होगा। और असिस्टेण्ट बनने पर कौन-सी क्रान्ति आ जाएगी? शर्माजी का हाल देख ही रही हो। वैसा ही कुछ हाल हमारा भी होगा। परेशान होने की जरूरत है। वी हैव नो फ़्यूचर ऐट ऑल। अँधेरा-ही-अँधेरा है हर तरफ़ ... विद नो रे ऑफ़ होप।"

मैं दृष्टि झुका कर चाय के कप के हैण्डल को सहलाने लगी, पर वह कोई जादुई चिराग़ तो था नहीं जिसके रोशन होते ही हमारी विपन्नता समाप्त हो जाती और विमल का मूड ठीक हो जाता। उसका ज्वार अब भी उफ़ान पर था। वह आक्रोश में बोला, "एक कमरे में ही कट जाएगी हमारी जिन्दगी। ऐसे ही एक-दूसरे के आँसू पोंछते-पोंछते बीत जाएगी जवानी। इज़ दिस ए ह्यूमन बीइंग्स लाइफ़? इससे तो ... इससे तो मर जाना, स्युसाइड करना, अच्छा है। रोज-रोज तिल-तिल कर मरने की बजाय एक बार में ही खतम हो जाएगी कहानी। इन्सल्ट बर्दाश्त करते-करते अब तो मेरे खून में भी इन्सल्ट भर चुकी है, कानों में डाँट-फटकार गूँजती रहती है हमेशा। इस तरह डिमोरलाइज्ड़ होकर मैं क्या अचीव कर पाऊँगा? मेरी सारी ऐम्बिशन्स, सारी डिज़ायर्स धूल में मिल जाएँगी और ..."

तब तक समस्या का एक समाधान मुझे सूझ गया था। विमल की बात काटते हुए मैंने कहा, "एगो बात कहें?"

"बोलो," विमल ने अनमने भाव से कहा।

"हम भी नौकरी पकर लेते हैं। फिर तो सब ठीक हो जाएगा।"

"तुम... नौकरी करोगी? यू मीन? सर्विस?"

मैंने पिताजी के समक्ष सफल पैंतरा आज़माया, "ऑफिसवाला नौकरी नहीं, इस्कूल में टीचरी का। सादी के पहले भी तो हम टीचरी करिए रहे थे। घर सम्भालने में हमरा भी तो जिम्मेदारी है। दूनों मिल कर पैसा कमाएँगे।"

"वह तो ठीक है प्रतिमा, बट..."

"बट का? टीचरी करना कौनो गुनाह है? आउ ठीक से खोजेंगे त कहीं-न-कहीं काम मिलिए जाएगा।"

"अच्छा, देखेंगे। लेट्स थिंक इट ओवर। फिर कोई फ़ैसला करेंगे।" विमल का मूड ठीक हो गया, और हम दूसरे विषयों पर बात करने लगे। 

लेकिन मैं टीचर न बन सकी। कहीं मुझे यह कह कर रिजेक्ट कर दिया गया कि मैं ट्रेंड नहीं थी, कहीं मेरे अनुभव में कमी पाई गई, और कहीं मेरी बिहारी हिन्दी ने मेरा रास्ता रोक दिया। एक जगह नौकरी ऑफ़र की गई, पर वेतन था मात्र 60 रुपए। अध्यापन से विमल को वैसे भी चिढ़ थी, 60 रुपए वेतन की पेशकश ने तो जैसे आग ही लगा दी। चिढ़ कर बोला, "कोई जरूरत नहीं टीचर बनने की। इस लाइन में प्रॉस्पेक्ट्स नहीं हैं। आज साठ पर ज्वायन करोगी तो दस साल बाद सौ रुपल्ली कमाओगी। छोड़ो! तुम शॉर्टहैण्ड-टाइपिंग सीखो। अगर तीन-चार महीने में पिक-अप कर लिया, तो मैं अपने ही ऑफ़िस में स्टेनो टाइपिस्ट लगवा दूँगा। सवा-सौ के करीब तनख्वाह भी मिलेगी और हम दोनों साथ ही काम भी कर सकेंगे। आगे चल कर स्टेनोग्राफ़र, पी ए, वगैरह बनने का चांस भी रहेगा। इट वुड बी मच बेटर दैन रॉटिंग इन ए स्कूल।"

लिहाज़ा, मैं एक शॉर्टहैण्ड-टाइपिंग स्कूल में दाख़िल हो गई। मेरे सामने भविष्य का चित्र बहुत-कुछ स्पष्ट था। मुझे आधुनिक गृहिणी के नए कर्तव्य-क्षेत्रों का ज्ञान हो चुका था। मैंने ख़ूब मन लगा कर शॉर्टहैण्ड और टाइपिंग का अभ्यास आरम्भ किया। चार महीनों में मेरी शॉर्टहैण्ड स्पीड 80 शब्द प्रति मिनट हो गई। मैं हर मिनट में 35 शब्द टाइप भी करने लगी। साथ ही, अंग्रेज़ी बोलने में झिझक मिटने लगी और हिन्दी में बिहारीपन एक हद तक समाप्त हो गया। स्कूल ने मुझे शॉर्टहैण्ड में 100 शब्द और टाइपिंग में 45 शब्द प्रति मिनट का प्रमाणपत्र दे दिया। नौकरी दिलवाने की ज़िम्मेदारी विमल की थी, और उसने अपनी बात पूरी भी की। ऐडमिनिस्ट्रेशन के डेप्युटी डायरेक्टर की ख़ुशामद करके और उसे यह आश्वासन देकर कि नियुक्ति के बाद मैं उसके बच्चों का  मुफ़्त ट्यूशन भी कर दिया करूँगी, उसने मुझे अपने ही दफ़्तर में स्टेनो-टाइपिस्ट नियुक्त करा दिया। 

इतने दिन बाद हमने चैन की साँस ली। अब हमारी आय लगभग तीन सौ रुपए मासिक हो गई थी, जो दो व्यक्तियों के लिए, निस्संदेह, पर्याप्त थी। पर इस पर्याप्तता का पहला नतीजा सुखद होने के बावजूद मेरे लिए दुःखद भी था। हम शर्माजी के परिवार से बिछुड़ कर दो कमरे के फ़्लैट में आ गए। यह फ़्लैट हमने चालीस रुपए अधिक ख़र्च करके प्राप्त किया था। यहाँ दम घोंटनेवाला संकुचन नहीं था, पर हृदय को उत्फुल्ल करनेवाली आत्मीयता भी नहीं थी। अब चारों ओर पड़ोसी थे, प्रतिद्वन्द्वी थे, आत्मीय नहीं। यहाँ किसी को बातचीत करने की फ़ुर्सत न थी, दूसरों के सुख-दुःख में भागीदार बनने का ख़याल न था। सब एक-दूसरे के सुख से जलते थे, दूसरों को परेशान देख राहत महसूस करते थे। मुझे पहली बार लगा कि मैं एक बेगानी जगह आ गई हूँ। यहाँ सब पराये हैं, अपना कहने को कोई भी नहीं है।

लेकिन यह कसक भी जल्दी ही जाती रही। हमने सोच-विचार कर यह निष्कर्ष निकाला कि ऐसे स्वार्थी पड़ोसियों से अधिक लाग-लपेट न रखने में ही भलाई है। वैसे भी, दफ़्तर के बहुत-से लोग अब हमारी मैत्री की कामना करने लगे थे। इनमें क्लर्क और असिस्टेण्ट तो शामिल थे ही, कुछेक सुपरिण्टेण्डेण्ट भी हमें कमोबेश अपनी बराबरी का मानने लगे थे। इस नई परिस्थिति के शायद दो कारण थे। एक तो यह कि मैं सुन्दर थी, और दूसरा यह कि डेप्युटी डायरेक्टर के घर हमारा आना-जाना था। 

हम पहले के मुक़ाबले कहीं अधिक सामाजिक बन गए। हम संध्या को प्रायः या तो किसी मित्र के घर चले जाते, या कुछ दोस्तों को अपने घर बुला लेते। बाक़ी रोज़ इधर-उधर घूमने और सिनेमा देखने में व्यतीत हो जाते। यूँ तो मैं डेप्युटी डायरेक्टर के घर ट्यूशन दफ़्तर के ही समय में, चार से पाँच बजे, पढ़ाती थी, पर घर आकर चूल्हा-चक्की में जुटना मुझे भारी लगता था। हमने खाना बनाने और घर की सफ़ाई के लिए एक लड़के को नौकर रख लिया। वैसे भी, सभी पड़ोसियों के यहाँ नौकर थे, बस हम ही पिछड़ रहे थे उस मामले में। घर का ख़र्च पूरा करने के लिए हम दोनों की नौकरी करने की मजबूरी पर पहले ही नाक-भौं सिकोड़ते थे वे। 

इस तरह, हम जो कुछ कर रहे थे वह वस्तुतः हमारा नहीं, परिस्थितियों का कृतित्व था। एक धारा थी जो बह रही थी, और हम उसमें उथलाने को मजबूर थे। जलसतह के नीचे छुपी कठोर नुकीली चट्टानों से रह-रह कर आहत होते रहना इस जीवन का स्वभाव था। तरह-तरह की बातें होतीं हमारे बारे में। अफ़सर मौक़े-बेमौक़े बेहूदे मज़ाक करते। चंद बिगड़ेदिल मजनूँ उल्टी-सीधी फ़ब्तियाँ भी कसते। हमने उन्हें अपरिहार्य मान कर स्वीकार कर लिया। लेकिन एक समस्या दोबारा मुँह बाने लगी हमारे सामने। हमारे हाथ-पैर विस्तृत हो गए थे, उन्हें ढाँपनेवाली चादर एक बार फिर संकुचित हो गई थी। 

एक दिन मैंने विमल से कहा, "यह हमने अच्छा नहीं किया। इतना सोशल नहीं बनना चाहिए था कि ख़र्चे ही न सँभल पाएँ।"

"सोशल क्या हम जान बूझ कर बने हैं? सरकम्सटान्सेज़ ही ऐसी होती गईं।" उसने जवाब दिया।

 "वह तो ठीक है, लेकिन इसका कोई अन्त नहीं है। हमें कहीं-न-कहीं मुँह की खानी पड़ेगी। हमारे ख़याल में, हमें कहीं-न-कहीं थोड़ी कमी लानी चाहिए मिलने-जुलने में। आज हमने हिसाब जोड़ा था। हमारी आमदनी का एक-तिहाई हिस्सा दोस्तों और सैर-सपाटे पर ही ख़र्च हो जाता है।" मेरी भाषा परिष्कृत हो गई थी, बस, विमल के सामने ख़ुद को 'हम' की जगह 'मैं' कहने में हिचक होती थी। वह कोई पराया थोड़े-ही था जिससे औपचारिक तरीक़े से बात की जाए!

"लेकिन इसे कर्टेल कैसे किया जा सकता है? कोई इनवाइट करे तो क्या कहें, नहीं जाएँगे?"

"कोई बहाना बनाया जाएगा।"

"और अगर वह खुद आ ही धमके तब क्या कहेंगे? भाग जाओ? ऐसा भी कहीं होता है? और फिर, हमारे ज्यादातर मिलनेवाले हमसे ऊँचे तबके के हैं। वे तुरन्त डिक्लेयर कर देंगे कि मेरा दीवाला पिट गया, या मैं अपने ओरिजनल स्टैण्डर्ड पर आ गया।"

मैंने देखा, विमल 'मैं' का प्रयोग ज़रूर करता था, पर उसकी भाषा में अब भी बिहारी खिंचाव था और पता नहीं जानबूझ कर या अनजाने में वह हिन्दी-उर्दू के कई शब्दों का ग़लत उच्चारण करता था। लेकिन अभी मुद्दा भाषा और लहजे का नहीं, फ़िज़ूलख़र्ची का था। मैं बोली, "बात तो आप ठीक कहते हैं, लेकिन उपाय क्या है? आपका दो सौ का सूट और मेरी सौ रुपए की साड़ी कैसे आएगी? मामूली कपड़े ख़रीदने के लिए तो पैसे बच नहीं रहे, हर महीने कर्ज़ लेना पड़ रहा है। अब तो हम दो से तीन होने वाले हैं, इस तरह पैसे उड़ाते रहे तो लुटिया डूब जाएगी।"

"तुम्हारी बात भी ठीक है।" विमल ने कुछ सोच कर कहा, "आखिर यह ट्यूशन क्या जिन्दगी-भर मुफ़्त ही चलेगा? सात-आठ महीने हो गए।"

"तो क्या उनसे पैसे माँगें? और फिर कौन बड़ा अपने समय में ट्यूशन करते हैं?" मैं विचलित हो गई।

"अरे नहीं बाबा, नहीं। पैसे क्यों माँगोगी? खन्ना साहब से कहो कि पाँच साल से ऊपर हो गए मुझे यू डी सी बने। अब वे मेरी तरक्की का इन्तजाम कर दें। अगर वे चाहें, तो मैं पलक झपकते असिस्टेण्ट बन सकता हूँ। और, असिस्टेण्ट बनने का मतलब है पचास-पचपन रुपए की एक्स्ट्रा इनकम। क्विक ऐंड सिम्पल राह है!"

सचमुच, एकदम सामने तो यही एक राह थी। मुझे एहसास हुआ, आदमी के लिए नीचे से ऊपर जाना कितना सहज है, पर ऊपर से नीचे आना कितना भयावह होता है। हम जहाँ तक बढ़ आए थे, वहाँ से पीछे लौटना दुश्कर था। 

मैंने खन्ना साहब के आगे अपना दुखड़ा रोया। वे मेरे रोने-गिड़गिड़ाने से द्रवित हो गए। पकी उम्र के आदमी, रिटायरमेण्ट में मात्र एक साल बचा था। बोले, "अच्छा, देखो, जो कुछ हो सकेगा, ज़रूर करूँगा।" मेरे पास और कहने को बचता ही क्या था? उन्हें धन्यवाद और दुआएँ देकर लौट आई।

दो महीने बाद, नवम्बर 1949 में, हमें अनुराग के विवाह की सूचना मिली। अनुराग ने उसी वर्ष बी ए पास किया था और अब राज्य सरकार में क्लर्की करते हुए पी सी एस की तैयारी कर रहा था। विवाह के बाद मैं एक बार भी मायके नहीं गई थी, इसलिए माँ ने ख़ास तौर पर काफ़ी पहले आने का आग्रह किया था। अनुराग के विवाह की बात और मायके का बुलावा, दोनों बातें ऐसी थीं कि मैं ख़ुशी से फूली न समाई। लेकिन विमल चिट्ठी पढ़ कर सोच में डूब गया। बोला, "बड़ी मुश्किल हो गई यह तो।"

मैं सहसा उसका मतलब नहीं समझ पाई। "मुश्किल हो गई? क्या मुश्किल हो गई? मेरे अनुराग की शादी है और आप कह रहे हैं कि मुश्किल हो गई!"

विमल फीकी हँसी हँस कर बोला, "मुश्किल नहीं हुई? जाओगी कैसे?"

"क्यों? चले चलेंगे। आप सोच रहे हैं कि खन्ना साहब दोनों को एक साथ छुट्टी नहीं देंगे? आप इत्मीनान रखिए। हम छुट्टी मंज़ूर करवा लेंगे।" मैंने उसे आश्वस्त करना चाहा।

"अरे नहीं भाई, छुट्टी की कौन सोचता है! मैं पूछता हूँ, पैसे कहाँ से आएँगे?"

"क्यों? पहली को तनख़्वाह लेकर चल देंगे, और क्या?"

"तुम समझती हो, सौ-डेढ़ सौ में काम चल जाएगा अपना? ब्याह-शादी का घर होगा..."

"सौ-डेढ़ सौ ही क्यों? बाक़ी डेढ़-दो सौ का क्या हुआ?"

"तुम भी आज कैसी बातें कर रही हो, प्रतिमा? हाउस रेंट नहीं देना होगा? नौकर को तनख्वाह नहीं दोगी? और, मलहोत्रा को पचास रुपए नहीं देने होंगे? पहली तारीख के वायदे पर उधार लिए थे। फिर क्या बचेगा? डेढ़ सौ ही तो, जब कि सौ रुपए सिर्फ़ रेल भाड़े वगैरह में लग जाएँगे।"

मैं सन्न रह गई। विमल भी ख़ामोश हो गया। कुछ देर सन्नाटा छाया रहा, फिर विमल ने धीरे से कहा, "कोई बहाना बना दो। छुट्टी न मिलने का, या ..."

"हम अपने माँ-बाप से धोखा करें?"

"फिर क्या करें? परिस्थिति सब कुछ करा देती है।"

"नहीं, यह नहीं होगा। हम जाएँगे। घर में पहले लड़के की शादी है। जाना ही पड़ेगा।"

"तो तुम अकेली चली जाओ। कहना कि दोनों को एक साथ छुट्टी नहीं मिली।"

"नहीं, चलेंगे तो दोनों।"

"फिर पैसे कहाँ से आएँगे?" विमल खीझ पड़ा था, "बच्चों की तरह बातें कर रही है तब से!"

"ऐसा करो," मैंने सुझाव रखा, "मलहोत्रा से एक महीने की मोहलत माँग लो। उसे अगले महीने दे देना।"

"वह नहीं मानेगा, भाई। तुम विश्वास क्यों नहीं करतीं? मैं अच्छी तरह जानता हूँ उसे। और अगर मान भी जाए तो फिर कभी एक कौड़ी भी नहीं देगा। समझीं?"

विमल की बात सुन कर मैं चुप हो गई। 

जब आमदनी पौने दो सौ थी, तब भी सामने अन्धकार था और अब भी, जब हम तीन सौ कमा रहे थे। बहुत टटोला हमने, पर राह न मिली। पहले तो हमने लम्बी छुट्टी न मिलने का बहाना किया, और फिर ऐन मौक़े पर विमल के अचानक बीमार पड़ जाने की सूचना भेज दी। शादी में न जाने से ज़्यादा माँ-बाप से झूठ बोलने का मलाल बरसों सालता रहा। अब भी कचोटती है वह बात। पर, मैं विवश थी।

अनुराग के विवाह के लगभग चार महीने बाद प्रेरणा का जन्म हुआ। हमारी पहली सन्तान हुई, पर प्रसन्नता न आ सकी हमारे पास। पैसों की कमी जो खाए जाती थी हर समय। तीन महीने बाद खन्ना साहब की कोशिशों का नतीजा सामने आया, विमल असिस्टेण्ट बन गया। हमने सन्तोष की साँस ली। 

– क्रमशः

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