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मरीचिका - 5

(मूल रचना:  विद्याभूषण श्रीरश्मि)
धारावाहिक कहानी

1953-56

उस शाम भी मुझे दफ़्तर के समय के बाद ज़रूरी काम से रोक दिया गया। अमूमन देर तक बैठनेवाले कर्मचारी भी चले गए। एम डी के चपरासी ने बताया, "मेमसाब, मैं जा रहा हूँ। साहब ने छुट्टी दे दी है, वे देर तक बैठेंगे। आपका कोई काम तो नहीं है?"

"जा रहे हो? अच्छा, कूलर से एक ग्लास पानी ला दो, फिर जाना," मैंने कहा।

चपरासी ने मेरी टेबिल पर ठण्डे पानी का ग्लास रखा, और सलाम कर चला गया।

मैं समझ गई, आज एम डी का इरादा कुछ दूसरा था। यों हम जब तक दफ़्तर में बैठते, उसका चपरासी भी बैठता था। पर जिस दिन उसकी नीयत साफ़ नहीं होती थी, वह चपरासी को छुट्टी दे दिया करता था। हम दोनों के सिवाय केवल बाहरी फाटक पर दरबान रह जाता था उस दिन।

मैंने टाइपराइटर को कवर से ढँक दिया। अब उसकी नहीं, एक दूसरे दिखावे की आवश्यकता थी। बाथरूम जाकर अपने को व्यवस्थित किया, कोलोन का छिड़काव किया, बाल सँवारे, लिपस्टिक-पाउडर की रीटचिंग की, और वापस अपनी जगह आकर मेज़ के शीशे पर काँच का पेपरवेट नचाने लगी। इस खेल को अनाड़ी खेलें तो शीशे में दरार आ सकती है, पर दक्ष खिलाड़ी पेपरवेट को चकरघिन्नी की तरह नचा सकते हैं। बेचारा पेपरवेट गतिज ऊर्जा के सम्पूर्ण ह्रास तक बिना आवाज़ किए कभी वृत्ताकार तो कभी अण्डाकार दायरे में केन्द्रबिन्दु के गिर्द नाचता रहता है। 

इंटरकॉम पर एम डी का स्वर गूँजा, "मिज़ प्रतिमा! प्लीज़ सी मी।"

मैंने पेपरवेट को एक आख़िरी चक्कर दिया, पर बीच में ही हथेली से उसकी गति को दबा कर रोक दिया। "देखें, आज की शाम कौन खिलाड़ी बनता है और कौन पेपरवेट," मन-ही-मन सोचती मैं उठ खड़ी हुई। 

वह अपनी कुर्सी पर नहीं, सोफ़े पर बैठा था। मुझे देखते ही बोला, "हाउ अबाउट क्वेन्चिन्ग सम थर्स्ट?"

मैं मुस्कराई। इस बासी जुमले को वह न जाने कितनी बार आज़मा चुका था। मैंने कैबिनेट से 'जॉनी वॉकर' और 'ड्यूक्स सोडावाटर' की बोतलें और दो गिलास निकाल कर ट्रे में रखे, फ़्रिज से बर्फ़ निकाल कर आइसबकेट में उड़ेली, एक प्लेट में भुने काजू डाले, और सब लिए-दिए एम डी के पास आ गई। उसका पेग बनाते हुए मैंने पूछा, "ऑन द रॉक्स, न?"

मेरे हाथ से पेग लेते हुए उसने पहले तो मेरी उँगली दबाई, फिर दूसरा ग्लास ख़ाली देख कर बोला, "व्हॉट्स दैट?"

मैंने मुस्कराते हुए कहा, "मन नहीं कर रहा।"

"बट यू मस्ट टेक। यू लुक टायर्ड," उसने मनुहार की।

मैंने भौंहें उचकाईं, आँखें मटकाईं, और बोली, "इज़ दैट सो? तब तो मुझे घर जाना चाहिए!"

उसने मेरा हाथ पकड़ कर दबाया, "कहाँ से ये रोज़ नए-नए पैंतरे सीख रही हो? आओ, सिट हियर," उसने अपनी बगल में इशारा किया।

मैंने ऐसे जताया मानो मेरे हाथ में दर्द हो गया हो, और एक चंचल चितवन के साथ कहा, "वहाँ? ... आपके पास? ... न-न-न, सर, कहाँ आप और कहाँ मैं! हाउ कैन आई सिट बिसाइड यू?"

एम डी ने पेग होठों से अब तक नहीं लगाया था। शराब और शबाब, दोनों बेहद क़रीब होकर भी आनन्दपूर्ति नहीं कर सके थे उसकी। उसने बेताबी से मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा, "नाहक़ परेशान न करो। अब आ भी जाओ।"

मैंने अपने शरीर को हल्का छोड़ दिया और लड़खड़ाती हुई उसकी बगल में जा गिरी। मैंने अपने हाथ को दूसरे हाथ से दबाते हुए शिकायत की, "उफ़्, मोड़ दी न मेरी कलाई! बड़े बेरहम हैं आप," मेरे चेहरे पर पीड़ा-मिश्रित मुस्कान थी।

उसे मेरी कलाई सहलाने का बहाना मिल गया। बोला, "सचमुच? बहुत दर्द हो रहा है?"

"चलिए, मेरे दर्द से क्या मतलब आपको!" मैंने रूठने का स्वांग रचा, "आपको तो बस अपने-आप से मतलब है। मैं मरूँ या जियूँ, आपकी बला से।"

"अच्छा, मुझे तुम्हारी कोई फ़िक्र नहीं होती?" उसने मेरा कन्धा दबाते हुए पेग मेरी ओर बढ़ाया, "भला बताओ तो, कौन-सी बात नहीं मानी तुम्हारी?"

मैंने पेग थाम तो लिया, पर जाम उसी के होठों से लगाते हुए कहा, "कौन-सी बात नहीं मानी? ... जैसे हर बात कहनी पड़ेगी, तभी मानी जाएगी। ... ये कैसी फ़िक्र है कि मेरे अन्दर चाहे तूफ़ान ही क्यों न मचले, बिना बताए आपको पता ही नहीं चलेगा?"

एम डी ने लम्बा-सा घूँट लेने के बाद मेरे अधरों का स्वाद चखना चाहा, पर मैंने चेहरे के आगे हथेली फिराते हुए कहा, "ऐसे नहीं, पहले जवाब दीजिए मेरी बात का। ... कैसा अफ़ेक्शन है आपका? ऐसा तो एक हम्बल क्लार्क भी नहीं करता। ... इतनी कंजूसी क्यों करते हैं आप?"

"मैं और कंजूस?" उसने मुस्कराते हुए फिर मेरी ओर मुँह बढ़ाया, पर मैंने बिजली की तेज़ी से उसका गाल चूम लिया। कहा, "यह कंजूसी नहीं तो और क्या है, सर? ख़ुद तो पीने लगे और किसी दूसरे प्यासे की ख़बर भी नहीं पूछी।"

मैं दूसरा पेग भरने लगी, वह मेरी कमर में हाथ डाले मेरा मुँह ताकता रहा। गिलास उसकी ओर बढ़ाया तो बोला, "नहीं, तुम लो।"

"कहा न, आपको प्यार करना नहीं आता। प्यार में दी गई चीज़ को ठुकराते हैं कहीं?"

बेचारा फिर मात खा गया, लेकिन जल्दी-ही सम्भल गया। बोला, "नो लव, यू मस्ट टेक द फ़र्स्ट सिप।" 

मैंने एक घूँट पी, बाक़ी व्हिस्की उसने थोड़ी देर में ख़त्म कर दी।

ज्यों-ज्यों उसकी ख़ुमारी चढ़़ती गई, उसकी बेक़रारी भी बढ़़ती गई। उसने पुनः मुझे दबोच लिया, पर मैंने उसके होंठों की गर्मी न उतरने दी। उसकी कमीज़ के बटन खोलती, उसकी कनपटी से गाल सटा कर बोलती गई, "मैं आपसे प्यार करती हूँ, लेकिन सबसे छुपा कर। मेरा सबकुछ आपका है, लेकिन सबसे छुपा कर। ऑफ़िस आती हूँ, तो वह भी जैसे सबसे छुप कर।" मेरी उँगलियाँ उसकी छाती के बालों से खेलने लगी थीं। "पहले भी पीए थी, आज भी पीए हूँ। ... लोग अचम्भा करते हैं, कुछ मज़ाक़ भी उड़ाते हैं, पर ..." मैंने उसकी मदहोश आँखों में अपनी चंचल आँखें डाल दीं, "आपको नहीं लगता कि मेरे साथ आपकी भी तौहीन होती है। मैं आपकी ख़ुशियों पर चुपचाप जान देती हूँ, और आप अप्रीशियेट भी नहीं करते।"

एम डी बड़ी मुश्किल स्थिति में फँस गया था। एक तरफ़ उसकी वासना का ज्वार पूरे उफ़ान पर था, तो दूसरी तरफ़ उसकी चारित्रिक और व्यावसायिक निष्ठा दाँव पर लगी थीं। उसने थरथराते स्वर में कहा, "भरोसा नहीं है मेरी सिन्सियेरिटी पर? ... माँगो, क्या माँगती हो!"

"छोड़िए भी, अब और क्या दे देंगे आप?" उसकी त्वचा मेरे कोमल स्पर्श से थरथराने लगी थी।" अभी मेरे पास ही बहुत-कुछ है आपको देने के लिए," मैं होंठ उसके क़रीब लाकर बोली। 

वह वासना से अभिभूत अवश्य था, पर उसके पौरुष को पहले चुनौती का जवाब देना था। उसका दर्प जाग उठा था। वह बोला, "नहीं, पहले मैं दूँगा!" बेचारा नशे में ठीक से सोच भी नहीं पा रहा था, आगे कुछ न बोल सका।

"अब छोड़िए भी, क्या दीजिएगा? मैंने तो यूँ ही कह दिया था," बोल कर मैंने बड़े अन्दाज़ से आँखें नचाईं।

"नहीं-नहीं, आई डोन्ट एक्सेप्ट डिफ़ीट!" उसने मेरे बदन को स्पर्श करते हुए कहा, "गो, ब्रिन्ग द डिक्टेशन पैड।"

"सच?" मैंने उसके गले में बाहें डाल कर शोख़ी से पूछा।

"सच!" उसने मेरे होठों को चूम कर कहा।

"अच्छा!" मैं कपड़े व्यवस्थित करती उठी, और झट से अपने केबिन से डिक्टेशन पैड-पेन्सिल ले आई।

उसने चार पंक्तियों की डिक्टेशन दी, बोला, "जाओ, टाइप कर लाओ। ... इमीडिएटली!"

मैं कम्पनी के लेटरहेड पर ऑफ़िस ऑर्डर टाइप कर लाई। एम डी के हस्ताक्षर करते ही मैंने काग़ज़ सहेज कर रख लिया, कहीं नशा उतरते ही वह इरादा न बदल दे। वैसे उस रात मैंने कोई कसर न छोड़ी, कुछ ऐसा किया कि उसका शराब का नशा भले ही सुबह उतर जाए, पर मेरा नशा उस पर बरसों, बल्कि ताउम्र तारी रहे। मैं सेल्स प्रोमोशन ऑफ़िसर जो बन गई थी, एक ही झटके में मेरी तनख़्वाह छः सौ रुपए से छलाँग मार कर हज़ार रुपए जो हो गई थी! ऊँचा पद उन जान-पहचानवालों का मुँह बन्द करनेवाला था जो मेरे पी ए होने पर नाक-भौं  सिकोड़ते थे। आदमी की पहचान गुणों से कहाँ होती है? उसका धन, उसका पद, और उसका रसूख़ ही उसे सम्मान दिलवाते हैं। अगर ऐसा न होता, तो मेरे पिताजी का तिरस्कार क्यों होता, शान्ति देवी को पति के इलाज के लिए आत्मसम्मान गिरवी क्यों रखना पड़ता?

कई लोग मेरे छोटे पद के कारण मुझसे मेलजोल बढ़ाने में कतराते थे, कुछ ओछा व्यवहार करने से भी नहीं चूकते थे। पदोन्नति के साथ मैं उच्च आर्थिक स्तर के सामाजिक दायरे में विचरण करने का स्वप्न देखने लगी। आमदनी बढ़ने से घर-गृहस्थी में भी सहूलियतें बढ़तीं। लेकिन, विमल को मेरी तरक़्क़ी से ख़ुशी नहीं हुई। मैंने उसे हर्षावेग से प्रोमोशन की बात बताई, पर उसने ठण्डे स्वर में बस इतना कहा, "कॉन्ग्रेचुलेशन्स ऑन द अचीवमेण्ट!" बात वहीं ख़त्म हो गई। 

दरअसल, बात वहीं ख़त्म नहीं हुई। कोई दो सप्ताह बाद उसने पूछा, "एमडी के साथ क्या सचमुच तुम्हारी रिलेशनशिप है?"

बचाव का सबसे अच्छा तरीक़ा आक्रमण होता है। मैं क्रोध से बोली, "यह क्या बक रहे हो?"

वह सहम कर सोचते हुए बोला, "मैं नहीं कह रहा। लोग कह रहे हैं।"

"लोग बकते हैं, तो बकें! व्हाई आर यू टॉकिंग रबिश? ... आई टॉइल सो हार्ड फ़ॉर द फ़ैमिली, एण्ड यू ... वाह! वाह!"

"नहीं, नहीं, आई डोन्ट डाउट योर डेडिकेशन। बट इतनी चर्चा हो रही है तुम्हारे और एमडी के बारे में ..." विमल गिड़गिड़ाया।

"रियूमर तो तुम्हारे और माधुरी के बारे में भी उड़ रहे हैं, बट आई नेवर बिलीव्ड देम। क्योंकि मुझे तुम पर भरोसा है, जबकि तुमको ..." मैं बिफ़र उठी।

"... च् च्! माधुरी के साथ मेरा वैसा कोई कनेक्शन है ही नहीं। वह मैरिड है, हर हस्बैण्ड इज़ हाइली प्लेस्ड।" विमल पराजय की कगार पर पहुँच चुका था।

"तो तुम्हारा मतलब है कि एमडी के साथ मेरा 'वैसा कोई कनेक्शन' है। और एमडी की शादी थोड़े ही हुई है, उसकी बीवी थोड़े ही वेल एजुकेटेड और सुन्दर है!" मैंने आक्रमण जारी रखा। "डू यू नो, शी इज़ सो अट्रैक्टिव ईवन नाऊ? ... हुँह! ... ऐसा दकियानूसी आउटलुक लेकर चलोगे तो गिर पड़ोगे। माइण्ड यू, नेवर इन्सल्ट मी लाइक दिस अगेन।"

"कूल डाउन, प्रतिमा। ... लोगों ने कहा, इसीलिए मैंने पूछ लिया था। ... सॉरी!" विमल ने हथियार डाल दिए।

"लोगों ने कहा? लोग तो कहेंगे ही। जेलसी में कुछ भी करेंगे। कावर्ड्स! मुझे कहते हैं, हस्बैण्ड को बेटर प्लेस्ड होना चाहिए, कम-से-कम गाड़ी के पहिए बराबर तो होने ही चाहिएँ, व्हाई आर यू कॉन्टिन्यूइंग विद ए क्लार्क? ... तो मैं क्या करूँ? तुम्हें बोलूँ यह बात? सेपरेट हो जाऊँ?" मैंने ब्रह्मास्त्र का वार किया।

विमल कुछ देर अवाक् देखता रहा मुझे, फिर बोला, "तुम बेकार में ग़ुस्सा कर रही हो इतना। एक रिलायबल आदमी ने कहा था, इसलिए ..."

मैं पैर पटकती बोली, "रिलायबल आदमी! मैं भी तो ज़रा सुनूँ, कौन है यह रिलायबल आदमी?"

"अब उसका नाम सुनने पर ही तुली हो, तो सुनो! वह आदमी है नौटियाल। कहता है, उसने अपनी आँखों से तुम्हें एमडी के साथ ऑब्जेक्शनेबल सिचुएशन में देखा है।"

"हूँ, तो नौटियाल हैज़ स्पूयड द वेनम। क्यों नहीं? जब ज्वाइन किया था तब उसकी और मेरी सैलरी में ज़मीन-आसमान का अन्तर था, अब मैं कम्पेयरेबल पोज़ीशन पर पहुँच गई हूँ। ... कितनी फ़िल्दी पॉलिटिक्स खेलता है," मैंने यथार्थवादी फ़रियादी के समक्ष यथार्थवादी तर्क प्रस्तुत कर दिया।

विमल की बोलती बन्द हो गई। नौटियाल से उसका विश्वास भी उठ गया। मैंने एक तीर से दो शिकार कर कुछ दिनों के लिए शान्ति हासिल कर ली।

सेल्स प्रोमोशन ऑफ़िसर बनने के बाद मेरी गाड़ी काफ़ी तेज़ी से दौड़ी। कम्पनी के अटके काम को रास्ते पर वापस लाने में मैंने महारत हासिल कर ली। इसी क्रम में मेरी पहुँच रत्नद्वीपों तक फैल गई, मैं  मोतियों से मालामाल होने लगी।  

इस तरह सन् 1954 मेरे लिए बड़ा शुभ साबित हुआ, सिवाय एक दुर्घटना के। वह दुर्घटना थी पप्पू का जन्म। मैं बड़ी सावधानी बरतती थी, अपने गर्भ से फिर किसी दुर्भाग्य के पुतले को जन्म नहीं देना चाहती थी, पर न जाने कैसे, कब, कहाँ चूक हो गई और साल के अन्त में विमल एक बच्चे का बाप बन गया। दुनिया बच्चे के जन्म पर ख़ुशियाँ मनाती है, पर मैं दुःखी हो गई। बच्चे के दुर्भाग्य की कल्पना मुझे सिहरा देती थी। उसके जन्म से मेरे सौंदर्य पर धब्बा लग गया था, काम में कई महीनों की रुकावट पड़ गई थी। विमल भी न जाने किस उधेड़बुन में फँसा, न दुःख और न ही ख़ुशी का इज़हार कर सका। हाँ, प्रेरणा, मैना और बाबू ज़रूर आह्लादित हो गए। प्रेरणा का अकेलापन ख़त्म हुआ, मैना को बेटा मिल गया, और बाबू की बोरियत दूर हुई। पता नहीं क्या सोच कर मैना ने तनख़्वाह लेना भी बन्द कर दिया। वह अब हमारे परिवार की 'असोसिएट' नहीं, 'फ़ुल' मेम्बर बन गई। 

सन् 1955 की शुरुआत भी शुभ रही। पता चला कि शान्ति देवी के पति सेनेटोरियम से रोगमुक्त होकर वापस आ गए। मार्च के आरम्भ में सुकुमार का विवाह हुआ, पर दो महीने बाद ही समय बदलने लगा। मेरी मानसिक अशान्ति बढ़ने लगी। इस बेचैनी का मई में हुई दादीजी की मृत्यु से कम, और जुलाई में शान्ति देवी के पति के ख़ून की उल्टी के बाद आकस्मिक निधन से अधिक सम्बन्ध था। सबसे बड़ी बात, विमल की अवस्था मुझे त्रासदायक लगने लगी थी।

शान्ति देवी के पति के देहान्त के बारे में जान कर मुझे संसार में धर्म के अस्तित्व पर शंका होने लगी। मनुष्य तो भ्रष्टाचारी लगते ही थे, अब ईश्वर की निष्पक्षता पर भी सन्देह होने लगा। रह-रह कर मेरी आँखों के सामने शान्ति देवी का काल्पनिक विधवा-वेश नाचने लगता, और मैं बेचैन हो उठती, मेरा हृदय भर आता। शायद यही वज़ह थी कि मैं विमल को एक दूसरे परिप्रेक्ष्य में देखने लगी। पहले उसे देख कर घृणा होती थी, अब उस पर तरस आने लगा। उससे संवेदनापूर्वक बातें कीं, तो लगा वह उतना बड़ा अपराधी नहीं था जितना मैंने क़रार दिया था। शायद वह अज्ञान और स्वाभाविक दुर्बलता के कारण फिसल गया था, संभवतः उसकी ग़लती माफ़ी के क़ाबिल थी।

मैं बच्चों में रुचि लेने लगी। प्रेरणा को पहली बार लगने लगा कि उसकी माँ भी बाक़ी माँओं की तरह है। उसकी आँखों में ख़ुशी देख कर मैंने लोकैषणा और वित्तैषणा से परे संयत जीवन बिताने की सोची, पर कुछ महीनों में ही अपनी नादानी का एहसास हो गया। एक तो कम्पनी के कामों की वज़ह से मिलना-जुलना पूरी तरह बन्द नहीं किया जा सकता था, दूसरे, प्रमुखता पाते ही विमल पुनः मुझ पर पूर्ण आधिपत्य के स्वप्न देखने लगा। वह मुझे आदेश देता, मैं उनकी अवहेलना करती। उसकी बाँदी थोडे़-ही थी मैं, हर चीज़ उसकी इच्छा से कैसे कर सकती थी! पर वर्षान्त में संघ लोक सेवा आयोग द्वारा सेक्शन ऑफ़िसर के लिए चुने जाने के बाद वह अपने को पता नहीं क्या समझने लगा था। हमारे बीच खटपट होने लगी।  
 
सन् 1956 की एक आरम्भिक सुबह उसने कठोर शब्दों में कह दिया, "प्रतिमा! आई डोण्ट लाइक इट ऐट ऑल। मेरा जन्म हर किसी के आगे सिर झुकाने के लिए नहीं हुआ है।"

"मैं समझी नहीं तुम्हारा मतलब," मैंने अनजान बनते हुए कहा।

"तुम ख़ूब समझती हो मेरा मतलब," विमल ने आदेश-मिश्रित स्वर में कहा,"बस, इनफ़ इज़ इनफ़। रिज़ाइन करो और घर बैठो। तुम्हें कमाने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

मैंने पुराना अस्त्र फिर आज़माना चाहा, "पर हाउ विल वी मैनेज? ... साढ़े तीन सौ होते ही क्या हैं?"

"वी विल हैव टू मैनेज," वह गुर्राया, "जितने भी होते हों, हमें उतने में ही रहना होगा। दो कमरे के फ़्लैट में, बिना टीम-टाम के, बिना नौकर-चाकर के रह लेंगे, बट यू विल नॉट वर्क एनी मोर।"

"लेकिन क्यों? मेरे नौकरी करने में क्या बुराई है?" 

"बुराई-ही-बुराई है। तुम्हारी यह सो-कॉल्ड मॉडर्निटी मुझे पसन्द नहीं। आई डोण्ट लाइक इट ऐट ऑल। वी डोण्ट हैव टु बी सोशल ऐट द कॉस्ट ऑफ़ आर फ़ैमिली लाइफ़ ऐण्ड सेल्फ़ रिस्पेक्ट," वह उत्तेजना से लाल हो रहा था।

"तुम पागल हो गए हो। मेरी नौकरी क्या नुक़्सान पहुँचा रही है हमारी फ़ैमिली लाइफ़ और सेल्फ़ रिस्पेक्ट को? तुम्हारे दिमाग़ में शक का कीड़ा घुस गया है," मैंने विकल होकर कहा।    

"कीड़ा मेरे दिमाग़ में नहीं है, तुम्हारे दिमाग़ को चाट कर खोखला कर चुका है। तुम्हें कोई परवाह नहीं रह गई है अच्छे-बुरे की, राइट ऐण्ड रांग की। लोगों के बिस्तर गर्म करना तुम्हारी ड्यूटी, तुम्हारी हॉबी, तुम्हारा लाइफ़स्टाइल बन गया है। व्हाट ए पिटी!" वह ग़ुस्से में झाग उगलने लगा।

"शट अप!" मैं चीखी।

"चिल्लाओ मत, मुझे सब मालूम हो गया है।"

"क्या मालूम हो गया है तुम्हें? ... कुछ नहीं जानते हो तुम!"

"मुझे सब मालूम है। आई कैन स्टिल पार्डन यू, बट ओनली इफ़ यू स्टॉप स्लीपिंग अराउण्ड।" उसका ग़ुस्सा कम ही नहीं हो रहा था।

"आई स्लीप अराउण्ड! लोगों के बिस्तर गर्म करना मेरी ड्यूटी और हॉबी है?" मैं अपमान से जल रही थी।

"हाँ, हाँ, हाँ! कल रात पण्ड्या के साथ क्या कर रही थीं, बोलो?" 

मैं इस सवाल से थोड़ी चौंक गई, पर हिम्मत न हारते हुए बोली, "अब लोगों के साथ मिलना और बात करना भी गुनाह हो गया?"

"मिलना-जुलना गुनाह नहीं है, पर और कुछ करना है। समझीं?" वह दाँत पीस रहा था।

मुझे चुप हो जाना चाहिए था, पर ढीठ की तरह बोल बैठी, "तुम पागल हो गए हो। क्या किया है मैंने उसके साथ? बस, कम्पनी के काम से उसके घर ही तो गई थी।"

"जो लोग कम्पनी के काम से जाते हैं, उनके क्लायण्ट मीटिंग शुरू होने के दस मिनट के अन्दर खिड़की से विदेशी 'ड्यूरेक्स' कण्डोम के रैपर नहीं फेंकते। लाइट डिम करके मीटिंग नहीं होती। मैं तुम्हारी 'मीटिंग' ख़तम होने तक सामनेवाली सड़क पर ही था। चोरी और सीनाज़ोरी! कमीनी कहीं की!"

मैं सन्न रह गई। कुछ पल तो समझ न आया, क्या कहूँ। फिर बोल पड़ी, "कमीने तुम हो। बहुत गिर गए हो। अब नहीं रह सकता तुम्हारा-मेरा साथ। बस, मेरा-तुम्हारा रिश्ता ख़त्म। डोण्ट शो मी योर डर्टी फ़ेस अगेन।"

घर छोड़ते समय मैं बच्चों से भी न मिल सकी। प्रेरणा स्कूल में थी, और मैना पप्पू को पार्क ले गई थी। बेचारा, डेढ़ साल का बच्चा! उसे क्या पता कि घर में भूचाल आ गया था जिसने उसके माता-पिता दोनों की बलि ले ली थी।

– क्रमशः

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