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मरीचिका - 7

(मूल रचना:  विद्याभूषण श्रीरश्मि)
धारावाहिक कहानी


1960-62

मैना बाई मुझसे बराबर मिलती रहती थी। अब तो वह घर के अलावा मेरे दफ़्तर भी आ जाती थी। वह विमल को इन मुलाक़ातों की हवा भी नहीं लगने देती थी। अकेली आती, बच्चे माँ से मिलने का हर्ष भला विमल से कैसे छुपा पाते! कभी-कभी मैं उसे किसी पार्क में निर्धारित समय पर बच्चे लाने को कह देती, पर वहाँ भी उन्हें छू नहीं पाती, उनसे बात नहीं कर पाती। दूर से, चोरी-चोरी, उनकी नज़रें बचा कर उन्हें निहारती। उन्हें हँसते-खेलते देख कर मेरा मन आह्लादित हो जाता, उनकी छोटी-छोटी शरारतें देख कर उन्हें गोद में लेने का मन करता। मैं उनका साथ पाने के लिए तड़पने लगती, किन्तु वस्तुस्थिति का कठोर सत्य मेरी इच्छा पर अंकुश जड़ देता। मन मसोस कर, भरा हृदय लिए मैं वापस आ जाती। उनके लिए कभी खिलौने ख़रीदती तो कभी कपड़े और दूसरी चीज़ें, पर कभी अपने हाथों न दे पाती। मैना बाई तरह-तरह के बहाने बना कर वे वस्तुएँ बच्चों को देती। उसने विमल को अपने पास कुछ रुपए होने की जानकारी दी थी, ऐसे रुपए जो ख़त्म होने को ही न आते थे!

एक दिन मैना घबराई हुई आई। उसने विमल की दोस्तों से बातचीत और उसके उखड़े-उखड़े-से व्यवहार से ताड़ लिया था कि घर पर कोई भारी विपत्ति आने वाली थी। वह विपत्ति मेरे और विमल के सम्बन्धों के बारे में नहीं, उसकी नौकरी को लेकर थी, यह भी बूढ़ी अनपढ़ मैना बाई समझ गई थी। मैंने पता लगाया तो मैना का शुबहा सच निकला। विमल ने निश्चय ही मेरे जाने से घटी आमदनी को पूरा करने के लिए कुछ हेरा-फेरी की थी, और पकड़ा गया था। उस पर सरकारी रक़म के गोलमाल का आरोप था। सरकार का भ्रष्टाचार-विरोधी विभाग उसके ख़िलाफ़ जाँच-पड़ताल शुरू कर चुका था। सरकारी पैसे की गड़बड़ी! यह एक ऐसा अभियोग था जिसके साबित हो जाने पर कोई भी उसकी रक्षा नहीं कर पाता। उसे तत्काल निलम्बित कर दिया जाता। वर्षों मुक़दमा चलता जिसका सामना करने के लिए मनोवैज्ञानिक स्थिरता और आर्थिक दृढ़ता की आवश्यकता पड़ती, और विमल इन दोनों ही क्षेत्रों में निर्बल था। मैं चिन्ता में पड़ गई। विमल को बचाने के लिए मामले को तुरन्त रफ़ा-दफ़ा करवाना बहुत ज़रूरी था, पर मेरे जैसे निजी संस्थानों के कर्मचारियों की पहुँच उतनी लम्बी कहाँ होती है।

अचानक मेरे मानस में एक बिजली-सी कौंधी–शरद! तनिक भी विलम्ब किए बिना मैं उससे मिली, सारा हाल बताया, और अनुरोध किया कि चाहे जैसे भी हो, वह विमल की रक्षा करे।

शरद झल्ला उठा, "उसकी नौकरी छूटेगी, वह जेल जाएगा, तो तुम्हें क्या? तुम क्यों सिफ़ारिश कर रही हो उस सेल्फ़िश स्काउण्ड्रल की? लेट हिम सफ़र। ही डिज़र्व्स इट। सॉरी, आई वोण्ट डू एनीथिंग फ़ॉर हिम।"

"शरद, प्लीज़ ट्राई टू अण्डरस्टैण्ड। यू विल डू मी ए फ़ेवर बाई हेल्पिन्ग हिम।"

"फ़ॉरगेट अबाउट दोज़ सिली भारतीय नारी सैक्रिफ़ाइस स्टोरीज़। उस आदमी ने तुम्हें एक्सप्लाएट होने के लिए छोड़ दिया ताकि उसका सेल्फ़िश मोटिव सर्व होता रहे, और तुम..." शरद को मुझ पर ग़ुस्सा भी आ रहा था और तरस भी।

"लुक ऐट इट दिस वे, प्लीज़," मैंने दलील दी, "उसके बिना मेरे बच्चों का क्या हाल होगा? दे आर टू यंग टू बी लेफ़्ट इन ए होस्टल, और मेरी प्रेज़ेण्ट प्रोफ़ेशनल लाइफ़ उनकी आइडियल अपब्रिन्गिन्ग के लिए सुटेबल नहीं है।" 

"व्हाई? ...क्या तुम्हारे हसबैण्ड के घर में उनकी आइडियल अपब्रिन्गिन्ग के लिए सुटेबल ऐटमस्फ़ियर है? नहीं! ... वो जैसे नैनी के साथ वहाँ रहते हैं वैसे ही नैनी के साथ तुम्हारे पास रहेंगे।" शरद मेरी परेशानी समझ ही नहीं पा रहा था।

"शरद, शरद, मेरी बात समझो! वहाँ बच्चे नैनी के पास रहते हैं, पर मेरे होते हुए नैनी के पास नहीं, मेरे पास आएँगे। मैं अभी उस हालत में नहीं पहुँची हूँ कि नौकरी छोड़ कर घर बैठ जाऊँ या किसी नए जॉब में न्यूकमर की तरह स्ट्रगल करूँ। मेरी एक वे ऑफ़ लाइफ़ है। प्रेरणा दस की हो रही है, उसकी एज वलनरेबल है। हमारी मेल डॉमिनेटेड सोसाइटी में जब मुझे देर रात घर लौटते और गेस्ट्स को एण्टरटेन करते देखेगी, तो अच्छे-बुरे का फ़ैसला नहीं कर पाएगी, भटक जाएगी," मैंने पूरी गम्भीरता से कहा।

"हूँ, सो दैट इज़ योर कन्सर्न," शरद कुछ देर अपनी एक भौं को दो उँगलियों में दाबे सोचता रहा, फिर बोला, "अच्छा, स्टॉप वरीइंग। आइल डू समथिन्ग!"

शरद का 'समथिंग' बड़ा कारगर साबित हुआ, विमल के ख़िलाफ़ कार्यवाही स्थगित हो गई। शायद विमल को अब तक नहीं मालूम कि उसका तारणहार कौन था–वह अपने स्वप्नलोक में ही खोया होगा। ख़ैर! कुछ ही महीने बाद मेरी नौकरी से सम्बन्धित गतिविधि हुई। हमारी कम्पनी के सेल्स मैनेजर को कहीं जनरल मैनेजर का पद मिल गया, और उसने त्यागपत्र दे दिया। उससे मेरे बड़े अच्छे सम्बन्ध थे, सो एक साथी खोने का दुःख हुआ, पर साथ ही उसकी उन्नति पर प्रसन्नता भी हुई। 

दो दिन बाद एम डी ने मुझे बुला कर कहा, "मिज़ प्रतिमा, आई हैव ए गुड न्यूज़ फ़ॉर यू।"

"मेरे लिए गुड न्यूज़?" मैं हतप्रभ हो गई।

"यस, तुम्हारे लिए। यू हैव बीन शॉर्टलिस्टेड टू बी आर नेक्स्ट सेल्स मैनेजर!" एम डी मुस्करा रहा था।

"थैंक्यू, सर! लेकिन शॉर्टलिस्टेड होने और पोज़िशन पाने में फ़र्क होता है। देयर मस्ट बी मेनी मोर कैन्डिडेट्स इन द फ़्रे ..."

"देयर इज़ नो वन एल्स इन द फ़्रे," एम डी ने कहा।

मुझे धक्का-सा लगा, मैं पूछ बैठी, "व्हाट अबाउट मिस साइमन?"

"बोर्ड की राय तुम्हारे फ़ेवर में है।" 

मेरे मुँह पर फिर भी प्रश्नचिह्न जड़ा देख कर वह बोला, "बैठो। सेल्स मैनेजर की पोस्ट ऐसी नहीं है जो सीनियर एम्प्लॉई को ही दी जाए। वी प्रेफ़र यंग ब्लड इन इट, एण्ड यू आर द यंगर ऑफ़ द टू। हर कोर कम्पीटेन्स इज़ डिफ़रेन्ट, वह कोटा लेने, लाइसेन्स हासिल करने, एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट के पचड़े वगैरह सुलझाने में, लियाज़ाँ वर्क में, एक्सपर्ट है। ऑन द अदर हैण्ड, यू हैव प्रूव्ड योर वर्थ ऐज़ ए सेल्स प्रोमोशन ऑफ़िसर।"

"सर, मिस साइमन के होते हुए ... आई मीन ... शी इज़ सो नाइस ऐण्ड केपेबल ... आइ वुड फ़ील ऐज़ इफ़ आई हैव बिट्रेड हर!"

"वेल, आई कान्ट प्रेशराइज़ यू। अगर किसी वज़ह से तुम सेल्स मैनेजर नहीं बनना चाहतीं, तो हमें ऐक्सटर्नल कैण्डिडेट्स देखने होंगे। ... थिंक ओवर इट।" एम डी गम्भीर हो गया।

दिलो-दिमाग़ पर भारी बोझ लिए मैं बाहर आई। उस दिन न तो मैं किसी से हँस-बोल पाई और न ही कोई महत्वपूर्ण काम कर पाई। कोई और समस्या होती तो मिस साइमन से सलाह लेकर बोझ हल्का कर लेती, पर इस बारे में क्या बोलती? यह भी तो नहीं पूछ सकती थी कि पद स्वीकार करूँ अथवा नहीं। कैसा बेहूदा सवाल होता वह! पद को ठुकराने की सलाह भला कौन देता? मुझे समस्या से अकेले ही निपटना था, पदोन्नति और मिस साइमन की सद्भावना में से एक को चुनना था। मैं पिताजी और फिर शान्ति देवी के रूप में दो शुभचिन्तक पहले ही खो चुकी थी। मिस साइमन को खोने की हिम्मत नहीं बची थी मुझमें।

दूसरे दिन मिस साइमन मेरे पास आईं। एम डी की पीए से उन्हें मेरे पशोपेश का अन्दाज़ मिल चुका था। मेरी आँखों में आँखें डालती हुई बोलीं, "कॉन्ग्रेचुलेशन्स! सुना कि तुम्हें कल एसएम की पोस्ट ऑफ़र हुई पर तुमने ऐक्सेप्ट नहीं की।"

मेरा अंदाज़ सही था। अगर मैंने वह पद स्वीकार कर लिया होता तो उन्हें सदमा लगता। मैं उत्तर देने जा ही रही थी, कि वे फुफकारती हुई बोलीं, "तुम उँगली पकड़े बिना नहीं चल सकतीं?"

मैं भौंचक रह गई। 

वे बोलती गईं, "क्या तुम उस पोज़िशन को हैण्डल नहीं कर सकतीं? ... कर सकती हो, अच्छी तरह से कर सकती हो। ... तो फिर तुमने वह ऑफ़र एक्सेप्ट क्यों नहीं किया?"

मैं सकपका गई। ग़लती मेरी थी। सदमा उन्हें मेरे पद अस्वीकार करने से लगा था।

"तुम समझती होगी कि अगर तुमने वह पोस्ट ले ली, तो मैं बुरा मान जाऊँगी। लेकिन तुम नौकरी किस लिए कर रही हो? मुझे ख़ुश करने के लिए कि अपनी प्रॉब्लेम्स सॉल्व करने के लिए? तुम्हारे इस ग्रेट सैक्रिफ़ाइस से किसको फ़ायदा होगा? न तुमको, न मुझको, न कम्पनी को। तुम किसी आउटसाइडर को ख़ुश करने के लिए यह ऑपरच्युनिटी पास ऑन कर रही हो, कह रही हो कि आओ, हमारे सिर पर बैठ जाओ।"

उनके तर्क में दम था, पर दलील अधूरी थी। मैंने कहा, "बात प्रिंसिपल की है। व्हाई शुड यू बी सुपरसीडेड? आज आप सुपरसीड की जाएँगी, कल मैं। ऐसी प्रैक्टिस क्यों एनकरेज करें?"

मिसेज़ साइमन तैश में बोलीं, "क्योंकि आप गवर्नमेण्ट सर्विस में नहीं हैं। और वहाँ भी, ईवेन आर्मी में, टॉप रैन्किन्ग ऑफ़िशियल्स सिर्फ़ सीनियॉरिटी के हिसाब से आगे नहीं बढ़ते। जनरल थिमैया और सन्त सिंह, कलवन्त सिंह की कहानी मत भूलो। ... ऐण्ड व्हाई ब्लेम ह्यूमन्स, गॉड भी बुरे आदमी को दौलत, पावर, सब देता है और अच्छे आदमी को पुअर, हेल्पलेस बनाता है, उसके माथे पर कील ठुकवा देता है। पोएटिक जस्टिस रियल लाइफ़ में नहीं होता, सिर्फ़ फ़िक्शन में होता है। तुम्हारे इन्कार करने से रिवॉल्यूशन नहीं आ जाएगी, एक नया सर्विस रूल ऐड नहीं हो जाएगा कि कभी किसी को सुपरसीड नहीं किया जा सकता।"

उन्होंने जीवन का कड़वा सत्य उगल दिया था। मैंने उनसे बहस नहीं की, सेल्स मैनेजर बनना स्वीकार कर लिया। 

मैंने सोचा था कि मिस साइमन मेरे जीवन में लम्बे समय तक सारथी की भूमिका निभाएँगी, पर क़िस्मत में कुछ और ही लिखा था। मेरे सेल्स मैनेजर बनने के आठ-नौ महीने के भीतर उनका एक सड़क दुर्घटना में देहान्त हो गया। उनकी मुस्कान, उनकी झिड़क, उनका अट्टहास, उनकी डाँट, उनकी हमदर्दी–सब इतिहास बन गए। मैं अकेली पड़ गई।

मिस साइमन की असामयिक मृत्यु से मुझे गहरा मानसिक आघात लगा। सचमुच, मुझे उनकी उँगली पकड़ कर चलने की, उनके मार्गदर्शन की आदत पड़ गई थी। उनके जाते ही मेरे जीवन पर निराशा छा गई, मैं अवसाद के सागर में डूबने-उतराने लगी। गाड़ी, बँगला, बैंक-बैलेन्स, आधुनिक ठाठ-बाट होते हुए भी मिस साइमन की कमी मुझे खोखला किए दे रही थी। वही तो एक थीं जो मुझे समझती थीं, मुझे मेरी तमाम दुर्बलताओं के साथ स्वीकार करती थीं, मुझसे स्नेह रखती थीं। प्रेरणा, पप्पू, मैना बाई या कोई भी अन्य व्यक्ति मिस साइमन की कमी को पूरा नहीं कर सकता था। वह एक बड़ी बहन थीं जो अचानक मेरे जीवन र्में आईं, और मुझे दलदल में राह बनाने का गुर सिखा कर वैसे ही अचानक ग़ायब हो गईं। जो बातें बहन से की जाती हैं, वे हर किसी से थोड़े ही कही जा सकती हैं। नतीजा यह हुआ कि मैं अपनी वाचालता खोने लगी, जीवन के प्रति मेरा मोह क्षीण होने लगा, मेरा उत्साह ठण्डा पड़ने लगा, मैं एकान्तप्रिय होने लगी।

वह एकान्त का आकर्षण ही था जो मुझे पिछली गर्मिर्यों में अल्मोड़ा खींच ले गया। दिल्ली से बहुत दूर नहीं है अल्मोड़ा, पर फिर भी कितना अलग है! वहाँ क्षितिज पर हिमालय के हिमशिखर मुझे सम्मोहित करते, झीना तुषारपात पतले मलमल की तरह मेरे बदन से लिपट जाता, पिण्डारी ग्लेशियर का सौन्दर्य मुझे अनिर्वचनीय शान्ति देता। वहाँ के निवासी भी दिल्लीवालों की तरह नहीं थे। कुमाउँनी बालाओं का सरल-नैसर्गिक आचरण तथा वहाँ के युवकों की मासूमियत और सहज हास्य मुझे मुग्ध कर देता। मुझे अद्भुत शान्ति मिली वहाँ, मन आश्वस्त हुआ कि संसार में सर्वत्र कोलाहल, कृत्रिमता और चतुराई ही नहीं है, पृथ्वी पर कुछ स्थान छल-कपट से अब भी मुक्त हैं, बसने योग्य हैं।

उस दिन पिण्डारी ग्लेशियर को एकटक निहारता वह युवक भी शायद कुछ ऐसे ही विचारों में मग्न था। उसे आसपास की कोई ख़बर ही नहीं थी। एकाग्रचित्त, वह ऐसे टकटकी लगाए था मानो एक पल की चूक होते ही कोई अस्विस्मरणीय घटना घटेगी और वह उसका एकमात्र दृष्टा होने से वंचित रह जाएगा। उसे कई मिनटों तक एक ही स्थान पर मूर्तिसदृश जड़मान देख मैं उसके पास पहुँची, पर उसे पता न चला। धीरे से गला खखारा, तब भी आधुनिक युग के उस तपस्वी की साधना भंग न हुई। उसे अचानक ज़ोर से शब्द कर चौंकाने-डराने का बालसुलभ आनन्द लेने की इच्छा हुई, पर कुछ आनन्द बचपन में ही वृद्धावस्था प्राप्त कर काल-कवलित हो जाते हैं। 

"आपकी घड़ी में कितने बजे हैं?" मैंने औपचारिकता से पूछा।

वह चौंक कर हिल-सा गया, फिर मुझे लक्ष्य कर लजाते हुए बोला, "जी, आपने कुछ कहा?" 

मैं मुस्करा पड़ी, "जी, समय जानने के लिए कष्ट दिया था आपको।"

"सॉरी! मैं यहाँ की सुन्दरता में इतना खो गया था कि सुन ही सका आपकी बात।" वह ग्लेशियर की तरफ़ दोबारा ताकने लगा।

मुझे हँसी आ गई, "लेकिन टाइम तो आपने अब भी नहीं बताया।"

वह भी हँस पड़ा, "आदमी जब किसी चीज़ में टोटली इन्वॉल्व्ड हो जाए, तो बाक़ी कुछ का ख़याल ही नहीं रहता। जैसे एक्सपेरिमेण्ट के बारे में सोचते हुए एक फ़ेमस साइन्टिस्ट ने सोने के लिए पलंग पर छड़ी रख दी थी और ख़ुद दीवार से टेक लगा कर खड़े हो गए थे।"

अन्त में मैंने स्वयं ही संजय की घड़ी देखी थी। हम साथ-साथ वापस आए, और मुझ सफल सेल्स मैनेजर को यह जानने में ज़्यादा समय नहीं लगा कि वह दिल्ली के एक बड़े सेठ का पुत्र था जो अपने प्रकृतिप्रेम और अव्यावहारिकता के चलते व्यापार करने की बजाय इधर-उधर घूमता रहता था। मुझे उसका मुझसे ऐसे बच-बच कर चलना, जैसे मैं बिजली का करेण्ट होऊँ, बहुत भाया। वह अविवाहित था। उसे शहरी लड़कियाँ पसन्द नहीं थीं, और उसके पिता को देहाती लड़कियाँ अनगढ़ लगती थीं।

"आप अपने पिताजी से डरते हैं!" मैंने उसे छेड़ने की चेष्टा की।

"अब तक वे ही मुझे पालते रहे हैं, मेरी ज़रूरतें पूरी करते आए हैं, मुझे सब कुछ देते रहे हैं। मैंने उन्हें कुछ नहीं दिया। डरना तो पड़ेगा ही," उसने बिना हिचकिचाए या शेख़ी बघारे वस्तुस्थिति स्पष्ट कर दी।

मुझे उसकी साफ़गोई पर अचरज हुआ, उसकी भीरुता पर खीझ भी आई। 

"फिर तो आप ज़िन्दगी-भर डरते रहेंगे उनसे?"

"नहीं, वैसा नहीं होगा। मेरी फ़ॉर्मल एकेडेमिक एजुकेशन कम्प्लीट हो चुकी है। जब चाहे काम शुरू कर सकता हूँ, सेल्फ़ डिपेण्डेण्ट बन सकता हूँ। जब सेल्फ़ डिपेण्डेण्ट बन जाऊँगा तो डरने का कोई सवाल भी नहीं रहेगा। अभी यह सब तो स्पिरिचुअल अवेयरनेस गेन करने और अपने देश को जानने के लिए कर रहा हूँ," उसने बड़े आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया।

संजय की कॉटेज मेरे होटल के पास ही थी। अगले दो दिन रास्ते पर हमारी मुलाक़ात हुई। वह मुझसे कतराता, शर्माता रहा। दूसरे दिन मैं उसकी कॉटेज भी गई, पर उसने मेरे होटल का रुख़ न किया। तीसरे दिन से मैं उसकी पसन्द के सीधे-सादे कपड़े पहनने लगी। कुछ ऐसा करती कि उसकी निगाह मुझ पर पड़े, हम दो शब्द बोल सकें। उसकी अवहेलना मेरे लिए चुनौती सिद्ध होने लगी थी।

शायद वह सीधे-सादे सूती कपड़े पहनने का ही नतीजा था कि मुझे पाँचवें दिन बुख़ार हो गया। डॉक्टर ने गर्म कपड़े पहनने और बाहर ख़ुली हवा में न निकलने की हिदायत दे दी। मैंने दो दिन कमरे की छत ताक कर काटे। उस पर कभी मिस साइमन, तो कभी प्रेरणा, पप्पू, पिताजी, शान्ति देवी, आदि की छवि उभरती रही। मुझे हैरानी होती जब इन पुराने सम्बन्धियों के साथ संजय का चित्र भी उभर आता। ठीक ही तो है, अगर सामान्य पुरुषों की तरह वह भी मुझ पर आकर्षित हुआ होता, तो वह असाधारण लोगों की पंक्ति में सम्मिलित ही न हो पाता। 

दो दिन बाद ज्वर समाप्त हो गया, पर मुझ पर कमज़ोरी छा गई। कमरे से बाहर निकलने का साहस नहीं हो रहा था। आरामकुर्सी पर असहाय लेटी-लेटी सोच रही थी कि क्या किया जाए, कि तभी वेटर के साथ सहमे-सहमे से संजय ने कमरे में प्रवेश किया। इस अनपेक्षित सहृदयता से मेरी आँखें भर आईं, मेरे कृतज्ञ मुख से अनायास ही निकल गया, "कोई तो है अब भी मेरा ख़याल रखनेवाला!"

इन शब्दों ने संजय के मर्म को छू लिया। वह मेरे पास काफ़ी देर तक बैठा। अगले दिन भी आया, और जाते-जाते मुझे अकेले बाहर जाने से मना करता गया। लिहाजा, बाक़ी दिन हम साथ-साथ घूमे-फिरे। मैंने धीरे-धीरे उसे अपने परित्यक्ता होने और पुरुषों के साथ सम्बन्धों के बारे में बता दिया। वह शहरी स्त्रियों को नापसन्द करता था, पर मेरे ऐब जानने के बाद भी उसके व्यवहार में परिवर्तन नहीं आया। मुझे लगा, पुरुष रूप में मिस साइमन वापस लौट आईं। 

हम दिल्ली साथ-साथ लौटे। हमारा मिलना-जुलना जारी रहा। जिस दिन भी उसका साथ न मिलता, मेरा मन अकुलाने लगता। मैं अगले दिन समय पाते ही या तो उसके पास पहुँच जाती या उसे अपने पास बुला लेती। दर्शन, इतिहास, धर्म, अन्तरिक्ष–हमारे लिए कोई भी विषय अछूता न था केवल एक को छोड़ कर। मैं जब भी आत्मविश्लेषण करने लगती, वह मुझे रोक देता, "मुझे मेरी आँखों से देखने दो, मेरे दिमाग़ से समझने दो!" 

संजय ने मेरा नज़रिया बदल डाला। उसने साबित कर दिया कि हर पुरुष नारी देह से आकर्षित नहीं होता, कुछ मर्द मानसिक तथा चारित्रिक सौन्दर्य को प्राथमिकता देते हैं। संसार मानवता-विहीन नहीं है। वह मेरे जीवन में वरदान बन गया। बल्कि कहें, वह ऐसा देवदूत था जो मेरी हर दबी कामना पूरी कर रहा था। उसने मुझे प्रेम और विश्वास तो दिया ही, विश्व की सबसे दुर्लभ वस्तु भी दी। मेरे जीवन में श्रद्धा के पात्रों का सर्वथा अभाव हो चुका था, उसने वह कमी पूरी कर दी। एक बार उसने कहा था कि उसके पिता उसे सब कुछ देते रहे थे, बदले में वह कुछ न दे सका था। मेरी भी हालत कुछ वैसी ही थी। वह मुझे कितना-कुछ दे रहा था, किन्तु मेरे पास उसे देने को कुछ भी अलभ्य नहीं था।

उसका साथ पाकर मुझे छल-छद्म रहित सीधा-सादा जीवन निर्वाह करने की इच्छा हुई। मैंने अपने आचार-व्यवहार में परिवर्तन लाने की चेष्टा की, पर मुझे मुँह की खानी पड़ी। लोक व्यवहार का मेरा एक चिर-परिचित, गर्मजोशी भरा, सफल अंदाज़ बन चुका था। मैं मौक़े की नज़ाक़त के हिसाब से बातचीत और शारीरिक मुद्राओं द्वारा विषम परिस्थितियों को अनुकूल बना लेने में सिद्धहस्त थी। मेरे सम्पर्क में आए लोग क्रोध, असन्तोष और अविश्वास भूल कर सकारात्मक दृष्टिकोण अपना लेते थे। मेरे साथ वे प्रसन्नता का अनुभव करते थे, मेरी बातों पर ध्यान देते थे, और प्रगति के सामान्यतः बन्द दरवाज़े सिर्फ़ मेरे लिए खोल देते थे। मैंने अपना आचरण बदला, तो लोगों का रवैया भी बदलने लगा। पहले तो वे यह समझ कर बुरा मानने लगे कि मैं उनकी अवहेलना कर रही हूँ, बाद में उन्हें लगा कि मैं अस्वस्थ हूँ, सहानुभूति की पात्र हूँ। दोनों ही सूरतों में, मेरी नई छवि उस स्त्री की नहीं रही जिस पर विश्वास कर कोई बड़ा सौदा तय किया जा सके। जो बाधाएँ मैं पहले चुटकी बजाते पार कर लिया करती थी, अब मेरे लिए दुर्गम पर्वत साबित होने लगीं। पानी सिर से ऊपर होने की नौबत आ गई। वही एम डी जो कभी मुझे ख़ुश रखने की कोशिश करता था, अब अनमना-सा दिखने लगा। बात साफ़ थी। आर्थिक स्वावलम्बन के लिए 'नॉवेल ऐन्टरप्राइज़ेस' की नौकरी आज भी मेरा एकमात्र सम्बल थी, पर सेल्स मैनेजर के रूप में मैं लड़खड़ाने लगी थी। नौकरी बचाने के लिए मैं पुराने तरीक़े अपनाने को मजबूर हो गई। गाड़ी फिर पटरी पर चलने लगी, पर इसलिए नहीं कि उसे कहीं पहुँचना था, इसलिए कि चलने के अलावा कोई विकल्प न था।

जीवन-शैली में परिवर्तन का मेरा प्रयास और उसमें मिली विफलता, दोनों ही संजय के सामने स्पष्ट थे। उसे लगा, पति के साथ रहने का विकल्प मुझे शान्ति देगा। वह विमल के पास गया भी, पर बात नहीं बनी। अंत में, कल विवाह का प्रस्ताव दे कर उसने मेरे हृदय और मस्तिष्क को झकझोर कर रख दिया। उसका कहना था कि मेरे साथ अन्याय हुआ है, मुझे जबरन गन्दे नाले में ढकेला गया है। वह मेरे हृदय की पवित्रता का सम्मान करता है, मुझे अपनाना चाहता है। 

आकर्षण, प्रेम, आदर्श–उसके प्रस्ताव का कारण कुछ भी हो सकता था। मैं अचकचा गई, सोचने के लिए एक दिन का समय माँगा। दूसरे दिन दफ़्तर और क्लब गई ताकि एकान्त में मनोवेग मेरी सोच विकृत न कर दे। पर, बात इतनी महत्वपूर्ण थी कि मन से दूर ही नहीं हुई। मैं संजय को जवाब नहीं दे पाई। मेरे अन्दर ऊहापोह मची थी। रात बिस्तर पर लेटने के बाद भी मैं विचारों से घिरी रही, किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाई।  

हृदय ने कहा, ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलेगा। मुझे संजय से विवाह कर लेना चाहिए। वह मुझे प्यार ही नहीं करता, मेरी इज़्ज़त भी करता है। उसके साथ रहने पर मुझे मिस साइमन और पिताजी के प्रेम की मरीचिका में भटकना नहीं पड़ेगा।

मस्तिष्क ने पूछा, क्या सचमुच मेरा हृदय उतना ही पवित्र है जितना संजय सोचता है? कहाँ कर पाई मैं आत्मिक आनन्द के लिए भौतिक सुखों का त्याग? मेरी प्रवृत्ति संचय की है, संग्रह की है, मैंने बलिदान कभी किया ही नहीं। कहीं उससे विवाह के बाद भी मैं अपनी स्वाधीनता का बलिदान नहीं कर पाई, तो? यदि उसके पिता ने मुझे अस्वीकार कर दिया, तो घर चलाने के लिए मेरे पास नौकरी करने के अलावा क्या उपाय रह जाएगा? और, मेरे बच्चों का क्या होगा? वे विमल के पास रहेंगे, या मेरे पास?

1962

"रात कभी-कभी इतनी बेरहम क्यों हो जाती है कि काटे नहीं कटती? किन सवालों का जवाब माँगने लगती है यह? क्यों पूछती है ऐसे सवाल, जिनका जवाब होता ही नहीं?" ठण्डे बिस्तर पर छटपटाते हुए मैंने सोचा। दिनभर काम की व्यस्तता और फिर क्लब में अच्छी-ख़ासी शाम के बावजूद संजय की छवि मेरे मानसपट से धूमिल न हो सकी, अब अकेले में तो और भी हावी होती जा रही है यह। 

तीन बजे हैं। अगर चार घण्टे भी नहीं सोई, तो चेहरे पर थकान की लकीरें उभर आएँगी, लोग मेरी उम्र का ग़लत अंदाज़ लगाने लगेंगे। नींद की गोलियों की शीशी की ओर हाथ बढ़ाया, पर याद आया, डॉक्टर ने सख़्त ताक़ीद की है कि शराब पीने के बाद उसे हाथ भी न लगाऊँ। 

तो क्या करूँ? यूँ ही पड़ी छटपटाती रहूँ? 

शीशी के बग़ल में, गौतम बुद्ध की आबनूसी मूर्ति के इस तरफ़, फ़ोन पड़ा है। सुन्दर, सब्ज़ रंग का। एक मित्र विदेश से ख़ास तौर पर लाया था मेरे लिए। मैंने बड़े-बड़े घरों में लोगों को काले बदसूरत फ़ोन इस्तेमाल करते, उनके मोटे-मोटे तार सुलझाते देखा है। इस फ़ोन में स्प्रिंग-जैसा तार लगा है, जो कभी नहीं उलझता। मैं तार में उँगलियाँ कुछ इस तरह फँसाती हूँ जैसे कभी एम डी की छाती के बालों में फिराई थीं। 

छिः, कहाँ संजय और कहाँ एम डी! अलसाई-सी उठ कर मैं जिन का एक पेग बनाती हूँ। जहाँ इतनी पी, थोड़ी और सही! ग्लास को फ़ोन के पास हौले-से रखती हूँ। संजय सोया होगा अभी। उसका नम्बर याद है मुझे। मैं धीरे-धीरे नम्बर डायल करती हूँ। जब तक वह फ़ोन उठाए, मेरा ग्लास ख़ाली हो चुका है। 

"हलो," उसकी उनींदी-सी आवाज़ आती है।

"उधर है कोई जो जाग नहीं पाता, इधर हमारी नींद उड़ी जाती है।" मैं अपनी अनचाही शोख़ी से घबरा कर, इससे पहले कि संजय कुछ बोले, कहती हूँ, "देखो, मुझे टोकना मत। मैं तुम्हें बेहद चाहती हूँ, तुम्हारे आगे सुध-बुध खो बैठती हूँ। इसीलिए, जो तुम्हारे सामने नहीं कह सकती, अभी कह रही हूँ।"

संजय जाग चुका होगा, पर चुप है।  

मैं कहती हूँ, "सुना है कि तपते रेगिस्तान में ऊँट मरीचिका को सच समझ लेता है, प्यास बुझाने के लिए आगे बढ़ता रहता है। मरीचिका तो मरीचिका ठहरी, प्रतिबिम्ब से कहीं प्यास बुझती है! प्यास और थकान से शिथिल ऊँट भले ही प्रकृति का छल न समझ पाए, पर ऊपर उड़ते गिद्ध उसकी दशा अच्छी तरह भाँप लेते हैं। वे ऊँट के मरने का इन्तज़ार भी नहीं करते, उसके गिरते ही माँस नोचने लगते हैं उसके शरीर से। ऊँट का लहू रिसने लगता है, रेत लाल होने लगती है। दूर, बस कुछ ही दूर, मरीचिका फिर दिखती है उसे। ऊँट उठने का एक बार फिर प्रयास करता है। उसके बाद क्या होता है, बताने की ज़रूरत नहीं। 

"मैं सोचती थी कि मैंने गिद्ध की तरह जीवन जिया। एलीट सोशल सर्कल, ऊँचा पद, बँगला, कार, बैंक-बैलेन्स, नौकर-चाकर–मैंने वह सब हासिल किया जो एक प्रतिशत औरतों की भी नसीब नहीं होता। लेकिन अब लगता है कि मेरी भूमिका तो दरअसल ऊँट की थी। मरीचिकाओं के पीछे ही भागती रह गई मैं! सुख पाने की मरीचिका, प्रेम पाने की मरीचिका, शान्ति पाने की मरीचिका! 

"लेकिन अब और नहीं। मैं अपने-आप से और छल नहीं कर सकती। मैं इनके बिना नहीं रह सकती, आत्मत्याग नहीं कर सकती, प्रेम नहीं कर सकती।"

"यह क्या कह रही हो तुम?" संजय का परेशानी में डूबा स्वर उभरता है।

"वही, जो एक ईमानदार दोस्त को दूसरे दोस्त से कहना चाहिए। अगर तुम ईमानदार हो, तो मैं तुम्हारी पत्नी बन कर तुम्हें धोखा नहीं देना चाहती, और अगर तुम भी औरों की तरह ईमानदार नहीं हो, तो संजय, मैं अब और धोखे खाना नहीं चाहती।"

"प्रतिमा, तुम मुझे अच्छी तरह जानती हो ..."

संजय की बात बीच में ही काट कर मैं कहती हूँ, "हाँ संजय! मेरे लिए तुम नटराज की वह भव्य मूर्ति हो जिसे म्यूज़ियम में देख कर मैं प्रभावित तो हो सकती हूँ, पर जिसे अपने घर के मन्दिर में स्थापित नहीं कर सकती।" 

मेरी आवाज़ काँप जाती है। फ़ोन काट कर मैं रिसीवर बगल में रख देती हूँ, ताकि संजय फ़ोन करे भी तो मेरा नम्बर इंगेज़्ड मिले। 

"भाँड़ में जाए डॉक्टर," बुदबुदा कर मैं नींद की चंद गोलियाँ बिना पानी के ही निगल लेती हूँ। 

—  अंतिम

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