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मौन

मौन-
तुम में कितने स्वर
कितनी आहटें हैं निहित
कितने वाचाल हो तुम
बिना स्वर के ही
कह देते सब कुछ
एक ही दृष्टिपात में
या चेहरे के बदलते रंगों में
होंठो कि हल्की सी थिरकन में
कभी भृकुटि की नन्हीं सी सिलवट में
तुम्हें शब्दों की क्या आवश्यकता -

 

तुम तो स्वयं
स्रोत हो सब भावों के,
तुम्हारी ही गोद में होते उत्पन्न
पलते और जीते अपना
सहज सुगम जीवन
शब्दों में बँधते ही
असीम भाव
सीमाबद्ध हो -
फँस अपनी ही विषमता में
अपना अर्थ ही खो जाते

 

मौन
तुम सीमा रहित हो
अनादि अनन्त
निराकार निरंकार
यही तो है परिभाषा परमात्मा की
तुम ही थे साक्षी
सृष्टि के जन्म के
और तुम्हीं इसके अन्त के पश्चात
रहोगे जीवित
शब्द, स्वर तो लोप हो जाते हैं
अन्त में तुम्हीं में
जैसे आत्मा परमात्मा में मिल जाती है!
कहीं तुम्हीं परमात्मा तो नहीं?
मेरे प्रश्न का उत्तर भला मौन क्या देगा -
शब्दों में ढलते ही अर्थहीन हो जाएगा!

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