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मेरा गाँव

कभी बड़ा ख़ूबसूरत था मेरा गाँव 
मिलती थी बरगद वाली ठण्डी छाँव 

 

शहरों ने सीमा जब से तोड़ी 
गाँव की पगडंडियाँ हुईं चौड़ी 

 

लग गई हवा शहर की गाँव को, 
तो हर चीज़ का होने लगा मोलभाव 

 

हृदय बने मशीनी, दया रही न तनिक 
ऑनलाइन रिश्तों में मिली न महक

 

हरे-भरे खेत सब हो गये बंजर
कैसा चला गाँव पर शहरी खंजर 

सर्वत्र खड़ा कचरे का पहाड़ मिले 
धरती के आँचल में विनाश पले 

कभी बड़ा ख़ूबसूरत था मेरा गाँव 
अब पहले जैसा नहीं रहा मेरा गाँव 

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