अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मेरा घर

आज ऑफ़िस में काम के
सिलसिले में
मेरा मन
उचटा हुआ था।
 
घर आते वक़्त
रास्ते में सोचता रहा
चलकर आज घर में
किसी से बात करूँगा
माँ से,
पापा से,
या
पत्नी से,
बेटे से,
बेटी से,
न.. नहीं
छोटे भाई से
 
या
अपने पालतू कुत्ते
शेरू से
उसके साथ कुछ पल खेलूँगा
अठखेलियाँ करूँगा
जी हल्का हो जाएगा!
 
घर पहुँचा . . .
तो देखा
माँ तल्लीनता से
चावल बीन रही थी
धीरे-धीरे कोई
दोहा गुनगुना रही थी।
 
पापा चारपाई पर लेटे
टीवी पर,
अपना पसंदीदा सीरियल
देख रहे थे।
 
छोटा भाई
अभी-अभी
टाई सही करते हुए
गीत गुनगुनाते
कहीं चला गया।
 
मेरी धर्मपत्नी
रसोई घर में
आटा गूँधनें में व्यस्त थी।
 
बेटा सोफ़े पर लेटे
मोबाइल पर गेम खेलने में
मशग़ूल था,
शायद मेरे आने की
उसे भनक भी नहीं थी।
 
बेटी अपना चेहरा
हथेलियों पर टिकाए
ध्यान से पढ़ रही थी।
 
मेरा शेरू कुत्ता
अपना खाना खाकर
पापा के चारपाई के नीचे
आराम से सो रहा था
 
मैं अपने कमरे में
आ चुका था उदास
कुर्सी पर बैठते
यह सोचने लगा
आज बहुत दिनों बाद
मैं फिर किसी से कुछ
नहीं कह पाया . . .

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

528 हर्ट्ज़
|

सुना है संगीत की है एक तरंग दैर्ध्य ऐसी…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

नज़्म

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं