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मेरे जूते

अतीत की यादों में डूबती तिरती वंदना कमरे में दीवार के संग सटी पत्थर सी हुई बैठी थी। आँखों की पुतलियाँ कमरे की छत की ओर एकटक देखती जाने क्या खोज रहीं थीं। चुप-चाप बहते आँसुओं का सैलाब वंदना के चेहरे को लगातार भिगोता रहा। पत्थराई सी आँखों में धीरे-धीरे आँसू सूखने लगे थे।

अपने उन पलों को याद कर जड़ सी हुई जाती थी वंदना। चैन-आराम की ज़िंदगी बसर हो रही थी। अच्छी भली नौकरी कर रहा था अजीत। पाँच बरस का सौरभ अपनी प्यारी-प्यारी बातों से हम दोनों का कितना दिल लगाए रखता था। उसकी नन्हीं-मुन्नी शरारतें कितना मन लुभाती थीं। रोज़ सुबह अजीत आफिस जाने के लिए अपने काले चमड़े के जूते पालिश कर के रखता तो सौरभ उन्हें अपने नन्हें-नन्हें पैरों में पहन सारे घर के चक्कर लगाता। एक ही बात रोज़ कहता - मम्मी सौरभ भी ऐसे जूते पहनेगा। मुझे पापा जैसे जूते ले दो। अजीत उसे अंक में भर कर यही कहता और थोड़े दिनों की बात है बड़े स्कूल में जाने वाले हो फिर ऐसे जूते ले दूँगा। सौरभ ख़ुशी से फूला ना समाता।

इसी बीच अजीत का तबादला अहमदाबाद से दिल्ली हो गया। बहुत ख़ुश था वह कि अब सौरभ को बड़े शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ा सकेगा। अगले सप्ताह ही उसे नए आफिस में जाना था। वंदना और सौरभ को कुछ दिन यहीं छोड़ वह दिल्ली चला गया। वहाँ उसने रहने के लिए किराए का मकान तथा सौरभ का बड़े स्कूल में दाखिला भी करवा दिया। महीने भर के भीतर ही अजीत ने वंदना और सौरभ को दिल्ली बुला लिया। सौरभ स्कूल जाने के लिए इतना उत्सुक था कि उसे आज ही पापा जैसे जूते चाहिए थे। लाख समझाने पर भी उसकी ज़िद्द के आगे वंदना को झुकना पड़ा और सौरभ को साथ ले बाज़ार जूते दिलवाने चली गई। जूते लेकर सौरभ की ख़ुशी का ठिकाना ना था। उछलता-कूदता वंदना का हाथ पकड़े आ रहा था। दोनों लाल बत्ती देख सड़क पार कर रहे थे। सड़क के किनारे पहुँच ही रहे थे कि बत्ती हरी हो गई। यकायक तेज़ी से वाहन आने लगे। सौरभ अपना आखिरी कदम पटरी पर रख ही रहा था कि एक कार तेज़ी से आई और सौरभ को चपेट में ले दूर धकेल गई। वंदना दुख से पागल हुई मदद के लिए चिल्लाती हुई बेसुध हो गई। होश आया तो स्वयं को और सौरभ को अस्पताल में पाया। पता चला कि बेरहम समय ने सौरभ के दोनों पाँव छीन लिए हैं। बेहोशी की हालत में भी बीच-बीच में पुकार उठता था "मेरे जूते"।

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