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मृग मरीचिका (प्रेरणा सिंह)

दोस्त ने पूछा - "कहाँ चली?"

 

मैंने सोचा ख़ुशी ख़रीद लाऊँगी बाज़ार से,
कुछ कपड़ों में, कुछ सुख के सामान में।
कभी उड़ेले अपने ख़्वाबों को,
क़ीमती स्वप्निल साजो-सँवार में।


कभी चलती  मतवाली सी ऐसे,
सुख में करती हूँ ताल जैसे।
बड़ा मकान, लंबी गाड़ी,
सब कहते अपनी क़िस्मत पे 
होता क्या अभिमान वैसे?


हाय! बताऊँ कैसे इन लोगों को!
ख़ुद को धोखे में रख,
दिखा रही वो- जो देखना चाहें
इन्हीं बातों में फँसे इन लोगों को,
मन से अनजान...
आँखों से जीते भ्रमित मुखौटो को।


क्या यही होते हैं सब के अरमान?


एक घर में दो मीठी बातें,
हँसी की फुहार,
थोड़ी तक़रार,थोड़ा इसरार,
हर बात कहने को कोई हो,
हर बात जो तुमसे ही कहे,
मुझे तो चाहिए था बस इतना ही...


कैसे कहूँ -
मृग मरीचिका के गोले में चले जा रहे इन लोभित लोगों को।

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