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मृत्यु

मृत्यु, किसकी मृत्यु!
इस देह की?
खाद्यान्नों ने बनाया है जिसे!
गर्भ में एक बीज से
हरदम हम बढ़ते हुए,
उसके रूप के पाश में,
उलझते,फँसते हुए,
अपनी सृष्टि के मूल को
अपनी देह में भूल कर,
इस देह के अंत को ही
समझ लेते हैं अंत अपना।

कहाँ होती है मृत्यु?
उन पलों की -
जो बीत कर भी
जीवित रहते हैं हम में,
ख़ुशी देते हैं, पीर भी!
वो प्यार,जो सुगंध सा
हृदय में बसता है हमेशा!
वो अनुभव, जिसकी मुहर
लगी है कण-कण में हर।
उन कर्मों के प्रभाव
सागर की लहरों सा अनंत है!
अंत नहीं है उर्जा का स्वभाव;
केवल परिवर्तन होता है!
छल है, माया है मृत्यु,
सत्य सिर्फ जीवन होता है!

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