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मूल्यों के मरने पर जन्मती हैं मूर्तियाँ

अबकी बारी आपकी प्रभु
सरयू तट पर स्थापित होंगे
रुपये दो सौ करोड़ में
दुनिया भर में खड़ी 
गगनचुम्बी प्रतिमाओं की नींव में दफ़न हैं
सिद्धांत महापुरुषों के
पढ़ा है आपके महल में भी थीं -
प्रतिमाएँ पूर्वजों की
पर इतनी भव्य तो नहीं थीं
रघुवंशियों को प्रिय थी प्रजा. . . प्रतिमा नहीं


किन्तु प्रजातंत्र में प्रजा सिर्फ़ मतदाता
निर्णायक हैं सत्ता और दंश सत्ता का
कौन जानेगा आपसे अधिक 
किशोरावस्था में ऋषियों की रक्षा
राक्षसों के संहार को पठाये गये वन
राज्याभिषेक की जगह -
चौदह वर्ष का वनवास
लौटने पर सत्ता तो मिली. . .
सीता चली गयी
छली सत्ता के समक्ष 
कितने असहाय थे आप
की अंततः शरण ली
सरयू मैया की गोद में


उसी तट पर फिर उभारेंगे 
गगनचुम्बी प्रतिमा आपकी
शायद उतनी ऊँचाई से देख पाओगे 
दवाओं के अभाव में मरते दुधमुँहे बच्चों को
शिक्षकों, सुविधाओं के अभाव में 
भटकते लव-कुशों को
धरती में प्रतिदिन समाती सीताओं को 
और रामनामी ओढ़े रावणों को


मैं सोच सकती हूँ 
कितने असहाय होंगे इस बार आप
अब तो डूबने भर को 
पानी भी नहीं बचा है सरयू में फिर भी
मैं रहूँगी आपके साथ हर हाल में
भीतर की श्रद्धा मर जाती है
तब बाहर बनती हैं मूर्तियाँ विशालकाय!

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