अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मुट्ठी भर धूप

दोपहर ढल भी न पाई थी 
और बदली साँझ लेकर आ गयी
मुट्ठी भर धूप का तेवर भी
कुछ कम नहीं 
उजाले छुपने लगे
कालिमा के आवरण में 
और गुलाबी साँझ 
सकुचाई सी 
निकल गई चुपचाप 
अँधेरे से अपना दामन छुड़ाकर
 
पर 
रात ने धीरे से थाम लिया अँधेरे को 
गोया कि
उसे सहलाते हुए कह रही हो 
"तुम किसी से कुछ कम हो क्या"
तुम हो 
तभी तो तलाश है रोशनी की 
तुम्हारे बिना 
उजाला
कैसे परिभाषित कर पाता 
ख़ुद को 
 
छोड़ो 
गर ढल गई धूप
वह देखो जलता हुआ दीया
जो तुम्हें ही निहार रहा है 
 
और सचमुच 
अँधेरा डूब गया 
जलते हुए दीये की 
मुट्ठी भर रोशनी में।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

सामाजिक आलेख

रचना समीक्षा

साहित्यिक आलेख

कविता-मुक्तक

बाल साहित्य कविता

ग़ज़ल

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं