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न जाने क्यों

न जाने क्यों
बार-बार
ये महसूस होता रहता है मुझे
कि जैसे कोई
यहीं कोई
आस-पास
नर्म क़दमों की आहट लिये
साथ-साथ है मेरे,
हर बार
किसी के
बहुत क़रीब होने का हर घड़ी
अहसास होता रहता है मुझे,
जबकि,
दूर-दूर तक
किसी का कोई अता-पता या
नामो-निशान
नज़र नहीं आता मुझे,
कहीं से
किसी भी तरह की
कोई सी भी आवाज़
नहीं पहुँचती मुझ तक,
शायद,
अदृश्य को देख पाने की
कोई ख़ास नज़र मेरे पास है ही नहीं,
दीवार के उस पार की
गतिविधियों को
जाँचने व परखने की
कोई सी भी
तांत्रिक व मांत्रिक
बुद्धि मेरे पास है ही नहीं,
काश,
मेरे क़दमों की इस भटकन को
वो राह नसीब हो पाती
जो मुझे
मेरी असल
मंज़िले-मक़सूद तक
ले जा पाती ।

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