अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

नई कविता का आत्म संघर्ष: मुक्तिबोध

"पथ भूल कर जब चांदनी 
की किरन टकराए
कहीं दीवार पर,
तब ब्रह्मराक्षस समझता है
वंदना की चांदनी ने 
ज्ञान गुरु मानव से।"
(ब्रह्मराक्षस कविता से)

नई कविता नए वैचारिक तेवर के साथ साहित्य जगत में एक नवीन भाव भूमि की सृष्टि करती दिखाई देती है। इस विचारधारा के अंतर्गत जिसे रूढ़ियों का विरोध करना कहा जाता है दरअसल वह प्रक्रिया सुधारवादी विचारधारा के अंतर्गत 'बेहतर' के लिए अन्वेषण करती हुई प्रतीत होती है।

प्रगतिवादी विचारधारा के निर्वहन के साथ ही सतत नएपन के अन्वेषक कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का रचनात्मक संघर्ष इतना व्यापक रहा है कि उनकी तमाम रचनाएँ बौद्धिक चेतना को स्पर्श करती हुई अपने विशाल कलेवर के साथ अभिव्यक्त होती दिखाई देती हैं। प्रयोगवाद के पश्चात 1952 के आसपास से ही कविता के क्षेत्र में एक नया दृष्टिकोण अपने नए-नए वैचारिक तेवर के साथ उजागर होने लगा था। इस नयेपन को रचनात्मक अन्वेषण का नया दौर भी कहा जा सकता है। इसी दौर में 1960 में 'कृति' नामक पत्रिका में मुक्तिबोध जी की रचना प्रकाशित हुई– "नई कविता का संघर्ष"।

"मुझे नहीं मालूम
मेरी प्रतिक्रियाएँ
सही हैं या गलत हैं या और कुछ
सच, हूँ मात्र मैं निवेदन- सौंदर्य।"
         (चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन, कविता से)

रचनाकार के लिए वैचारिक संघर्ष की पीड़ा का अनुभव और उस समय में जो आत्म संघर्ष की स्थिति निर्मित होती है वह सामान्य घटना मात्र नहीं है। यही समय है जब रचनाकार भीतर की यात्रा करता है और इस यात्रा के दौरान अन्वेषण की प्रक्रिया से गुज़रते हुए "जो कुछ बेहतर है" उसे सामने लाने का प्रयास करता है।

मुक्तिबोध जी की उपरोक्त रचना में रचनाकार ने कविता की प्रवृत्तियों के स्थान पर उसके भाव पक्ष एवं कला पक्ष पर चर्चा करने को विशेष महत्वपूर्ण माना है। यहाँ इस बात पर उन्होंने विशेष बल दिया है की कविता की रचना प्रक्रिया किस प्रकार अपनी परिणिति तक पहुँचती हैं और स्वयं को साकार करती है। नई कविता अपने समय के तमाम विद्रोह विरोधाभास ओं व्यंग्य एवं द्वंद्व को साथ लेकर चलने वाली प्रगतिशीलता से परिपूर्ण रचना है। गद्य प्रधान होते हुए भी लयात्मकता नई कविता की मूल विशेषता है। मुक्तिबोध अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाकर लिखने वाले एक महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। यह तथ्य इस बात से और अधिक स्पष्ट हो जाता है कि मुक्तिबोध ने अपनी रचना प्रक्रिया में जहाँ मनोवैज्ञानिक आधार लिया है वही समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण को भी बख़ूबी अपने चिंतन में स्थान दिया है। मुक्तिबोध स्पष्ट करते हैं कि रचना प्रक्रिया के दौरान रचना की जिस पीड़ा को रचनाकार भोगता है, अनुभूत करता है, वह बेहद अहम है। ऐसा इसलिए कि एक निश्चित समय में रचनाकार के द्वारा किसी वैचारिक प्रक्रिया से गुज़रना, उसकी कल्पनाशीलता एवं अभिव्यक्ति के नए-नए आयाम गढ़ना रचनात्मक संघर्ष का ही परिचायक है।

"कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं-
'सफल जीवन बिताने में हुए असमर्थ तुम!
तरक्की के गोल-गोल
घुमावदार चक्करदार
ऊपर बढ़ते हुए ज़ीने पर चढ़ने की 
चढ़ते ही जाने की 
उन्नति के बारे में 
तुम्हारी ही ज़हरीली 
उपेक्षा के कारण, निरर्थक तुम, व्यर्थ तुम!!'
         ("कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं" कविता से)

और यह जो समय है जिस क्षण में रचना फलीभूत होती है उसे मुक्तिबोध जी ने रचना प्रक्रिया के तीन क्षणों के रूप में उल्लेखित किया है। उन्होंने इस समय को कला के तीन क्षण माना है।

कला का जो पहला क्षण है– वह अनुभूति अथवा अनुभव का क्षण है। अर्थात बाहरी जगत से प्राप्त अनुभव का आभ्यन्तरीकरण करना। इस प्रक्रिया के द्वारा मन में जो हिलोर उठती है, जो तरंग उठती है, उस तरंग का उद्घाटन करना। दूसरे शब्दों में यह तरंग अथवा यह हिलोर एक आकार ग्रहण करती है, एक रूप ग्रहण करती है, एक निश्चित आकृति में ढलती है। 

कला का जो दूसरा क्षण है, उस क्षण में कल्पनाशीलता का स्वरूप मनोभाव से जोड़ता है इसे मुक्तिबोध जी ने फ़ैंटेसी का नाम दिया है। इस ठंड से के लिए वे तटस्थता को आवश्यक मानते हैं और इसीलिए फ़ैंटेसी को व्यस्त रूप में देखना ही उचित ठहराते हैं। क्योंकि उनके अनुसार अगर तटस्थ न रहा जाए तुझे कविता है वह आत्मग्रस्त हो जाएगी, दुर्बोध हो जाएगी। रिक्त हो जाएगी, शुष्क हो जाएगी। इसीलिए मुक्तिबोध जी वेदना को जीवन मूल्यों एवं जीवन दृष्टि के साथ जोड़कर देखने को आवश्यक मानते हैं। उनके अनुसार इसी प्रक्रिया से एक ऐसी विश्व दृष्टि प्राप्त होती है, एक ऐसी जगत दृष्टि प्राप्त होती है, जिससे कविता में एक नवीन सृजनशीलता का वर्चस्व दिखाई देने लगता है। 

प्रश्न उठता है– यह जीवन दृष्टि अथवा जीवन मूल्य है क्या? इसे स्पष्ट करते हुए मुक्तिबोध जी ने अपनी इस रचना में लिखा है कि अपने विश्लेषण के दौरान काव्य सृजन की जो प्रक्रिया होती है और उस प्रक्रिया में जो विशिष्ट होता है वह सामान्य में घुल-मिल जाता है। कहा जा सकता है कि यही वह स्थिति है जिससे रचना में संप्रेषणीयता की स्थिति उत्पन्न होती है। दरअसल विशिष्ट का सामान्य हो जाना ही तो रचना प्रक्रिया का महत्वपूर्ण लक्ष्य है। मुक्तिबोध जी ने इसी सामान्य को जीवन दृष्टि माना है, जीवन मूल्य माना है। वे स्वीकार करते हैं कि कवि का विशिष्ट जब सामान्य से घुलमिल मिल जाता है तभी प्रकाश तथा आह्लाद का अनुभव होता है। आनंद की अनुभूति होती है। और बाह्य जगत् के साथ संपर्क साधने से जब वह अपने मनोभावों को व्यक्त करता है तब उसकी यही भावना उसके माध्यम से आत्म विस्तार करती हैं। या यूँ कहें कि अपने आत्म औचित्य का विस्तार करती है, आत्म प्रगटीकरण करती है।

मुक्तिबोध जी के अनुसार काव्य का तीसरा क्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है, सर्वाधिक दीर्घ है, लम्बा है।

क्योंकि यही कवि के आत्म संघर्ष दूसरे शब्दों में कविता के आत्म संघर्ष की पराकाष्ठा का क्षण होता है। यही भाषण है जिसमें ज्ञान परंपरा एवं भाव परंपरा को भाषा का कलेवर प्राप्त होता है। ज्ञान और भाव का एक पूरा संसार आत्म संघर्ष का हिस्सा बनता है। इसी संसार के माध्यम से कवि अपनी कलाकृति अथवा रचना का निर्माण करता है। यह एक लंबी प्रक्रिया है और इसीलिए मुक्तिबोध जी ने काव्य सृजन की इस प्रक्रिया को सबसे दीर्घ माना है। यही वह क्षण है जब कवि अपनी रचना को अधिक पुष्ट एवं सार्थक कर पाता है। मुक्तिबोध के अनुसार केवल भाव प्रवण रचना ही रचना प्रक्रिया की पूर्णता का का आधार नहीं हो सकती। वरन रचना की पुष्टता के लिए कला पक्ष का आलंबन भी आवश्यक होता है। वे कहते हैं कि इसके लिए वक्रोक्ति का आलंबन लेना होता है भंगिमा का आलंबन लेना होता है कल्पना का सहारा लेना होता है और इन के माध्यम से नवीन बिंबो की सृष्टि कर के रचनात्मकता को पूर्णता प्रदान करता है। इस प्रकार उपरोक्त तीनों क्षणों की पूर्णता ही काव्य के सौंदर्य का आधार होती है। 

निष्कर्ष रूप में स्वयं मुक्तिबोध जी ने स्पष्ट किया है कि जब तक तीनों क्षण अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर लेते तब तक काव्य सुंदर नहीं हो सकता। इसीलिए तीनों क्षणों का पूर्णता प्राप्त करना आवश्यक है । इसके लिए उन्होंने संवेदना, बुद्धि और कल्पना को अनिवार्य माना है। किंतु यह भी सत्य है की अभिव्यक्ति सामर्थ्य के बिना कल्पना साकार रूप ग्रहण नहीं कर सकती इसीलिए वे अभिव्यक्ति सामर्थ्य को भी महत्व देते हैं।

मुक्तिबोध जी जिस अभिव्यक्ति सामर्थ्य की बात करते हैं वह इतना शक्तिशाली है कि सूक्ष्म संवेदना को मूर्तिमान कर सकता है। क्योंकि कल्पना को उसके वास्तविक स्वरूप के अनुसार भाषा में ढाल पाना अभिव्यक्ति सामर्थ पर ही निर्भर है। 

अंत में वे आलोचनात्मक विवेक पर भी बल देते हैं। उनके अनुसार जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि के कारण रचनाकार अथवा आलोचक एक खेमे से बँध जाते हैं, एक ढाँचे से बन जाते हैं, एक निश्चित फ़्रेम में बँध जाते हैं। और इसी कारण सृजन के जो दूसरे क्षेत्र हैं अथवा सृजन की जो अन्य विधाएँ हैं उनके साथ में विरोध का भाव रखने लगते हैं। मुक्तिबोध जी इस तरह के सेंसरशिप के ख़िलाफ़ खड़े होने वाले रचनाकार हैं। वे कहते हैं कि इस तरह की सेंसरशिप का त्याग करना आवश्यक है। इसे अधिक स्पष्ट करते हुए वह कहते हैं कि गीत और नयी कविता दो अलग-अलग काव्य धाराएँ हैं और इन्हें उसी रूप में देखना ही उचित है । उन को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखना एक ग़लत परंपरा है। दरअसल जो वास्तविक आलोचना है वह वैविध्य स्वीकार करके चलने वाली होती है क्योंकि विविधता ही कला के सौंदर्य का आधार है। परस्पर द्वंद्व में चीज़ों को देखना और उन्हें उसी रूप में स्वीकार करना रचना प्रक्रिया की सहजता का प्रमाण बनता है। इसीलिए सब की उपस्थिति ही काव्य समृद्धि का आधार समझी जा सकती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि अपने निबंध के माध्यम से मुक्तिबोध जी ने नई कविता की भाव भूमि और उसकी रचना प्रक्रिया के साथ साथ जड़ीभूत सौन्दर्यानुभूति और सौन्दर्याभिरुचि के माध्यम से आलोचनात्मक विवेक के महत्व को प्रतिपादित किया है। केंद्रीय तथ्य यह है कि रचना प्रक्रिया के तीन क्षणों के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक पक्ष एवं समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुकूलन के माध्यम से सृजन प्रक्रिया में आत्मविस्तार एवं आत्म प्रकटीकरण की स्थिति निर्मित होती हैं। इतना ही नहीं वे बाह्य जगत एवं आंतरिक जगत में सामंजस्य स्थापित करने की बात भी स्पष्टता के साथ करते हैं। नई कविता को वे किसी विशेष परंपरा के अंतर्गत नहीं लेते। इस काव्य धारा को भी स्वतंत्र भावधारा के रूप में ही स्वीकार करते हैं। वास्तव में मुक्तिबोध जी अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाकर लिखने वाले रचनाकार हैं। पूरी दुनिया की विसंगतियों को साफ़ कर जो कुछ है उससे बेहतर की चाहत रखने वाले यशस्वी रचनाकार हैं। 

"इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए
पूरी दुनिया साफ करने के लिए मेहतर चाहिए
वह मेहतर मैं हो नहीं पाता 
पर, रोज कोई भीतर चिल्लाता है 
कि कोई काम बुरा नहीं 
बशर्ते कि आदमी खरा हो।"
         ( 'मैं तुम लोगों से दूर हूँ' कविता से)

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

साहित्यिक आलेख

कविता

कविता-मुक्तक

बाल साहित्य कविता

ग़ज़ल

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं