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नया उत्कर्ष 

मेरी आँखों में
उतर आया है एक चाँद
व्यस्तताओं के बावजूद
यादों के मौसम को तलाशते
जीवन की जगह जलन
और प्रगति की जगह
भटकन ढोता हुआ


ज़िंदगी देने की कोशिश में
इतने मिले ज़ख़्म कि
रिसते है घाव आज भी
अरसा बीत गया
संवेदनाएँ चुप हो गईं
अभिव्यक्ति भी मौन हो
बिखर गई
अपनापन सब खो गया
डरा-डरा सा अंतर्मन
सिहर उठता है बार- बार


बहुत दिनों बाद
मेरी जीजिविषा ने
मेरे उगते हुए सपनों के
अहसास को छुआ
मन के समंदर में
आशा की पतवार थामें
गंतव्य तक पहुँचने की चाह में
अपने अस्तित्व को खोजता
बढ़ चला


रिसते हुए घाव 
मेरी तरफ़ देखकर मुस्कराए
संवेदनाएँ चेतन हो उठीं
सूख गया था जो दुःख का बिरवा
बहुत दिनों बाद
फिर हरियल होने लगा
हौसलों की सार्थक हवा
और मेहनत की दिशा पाकर


विश्वास बाँहें फैलाकर
स्वागत कर रहा
फिर नये उत्कर्ष का!

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