अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

निर्वासित

अलसाई भोर में 
कुँए की गड़ारी की गड़गड़ाहट
अलार्म हुआ करती थी
नए सवेरे की।

 

घर का जाँता 
छोटकी और बड़की बहुओं का 
संवाद माध्यम हुआ करता था।
बतियाने का ऐसा माध्यम
आज विलुप्त क्यों?
उजाला होते ही 
जाँते की आवाज़ पर गुफ़्तगू जारी।
ऐसा जाँता 
जो पूरे मुहल्ले को जगाता
खुशियन आटा पिसवाता
एकता और समरसता बाँटता
अब विदा हो चला है,
नहीं, विदा कर दिया गया है
इसलिए कि
हमें मेहनत की ज़रूरत नहीं,
समरसता की ज़रूरत नहीं,
केवल मशीनी समाज की ज़रूरत है।
एकता व समरसता 
परोसता जाँता
अब नहीं
नीम की डाल कटवाएगा
हत्था बनवाने के लिए।
बढ़ई नहीं बुलवाएगा
फ़िटिंग करने के लिए।
गुड़ पानी नहीं बँटवाएगा
नये घर में लगने के लिए।
क्योंकि वह ख़ुद
अपने ही घर से
निर्वासित कर दिया गया है।
अफसोस... नयी पीढ़ी तुम
जाँते के बारे में
सिर्फ कहावतें सुनोगे
या फिर
सिंधु घाटी के मनके की तरह
खुदाई में पाओगे।

 

(खुशियन=ख़ुशी-ख़ुशी /ग्राम्य भाषा)

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं