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निश्छल प्रेम

उन दिनों दसवीं बोर्ड की परीक्षा देने गाँव से दूर जाना होता था। यही पहला मौक़ा होता था जब कोई पहली बार घर से दूर रहता था। मन में घर से दूर रहने के भय के साथ-साथ आज़ादी का उत्साह भी रहता था। मन में कई प्रकार के प्रश्न उठते और साथ-साथ काल्पनिक जवाब भी मिल जाते थे। कहते हैं किशोरावस्था तूफ़ान की अवस्था होती है। किशोरावस्था के उत्तरायण और युवावस्था के प्रारंभ की अवस्था बड़ी ही रोमांचकारी और जटिल होती है। दसवीं तक आते-आते लगभग हर प्राणी इस अवस्था तक पहुँच चुका होता है। नितेश को भी दसवीं की परीक्षा देने दूसरे क़स्बे में जाना था। मन में उत्साह था। अजीब सा डर भी था। बाहर अकेला कैसे रहूँगा? क्या मैं अकेला रह पाऊँगा? खाने का प्रबंध कैसे होगा? कौन बनाकर खिलाएगा? आदि आदि कई प्रश्न मन में उभरते थे। परंतु जो भी हो इम्तिहान के लिए तो जाना ही था। माँ से दूर रहने का दुर्भाग्य या सौभाग्य जो भी था उसे मिला। 

अपने एक मित्र शाहिद के साथ जो कि नितेश का सहपाठी था के साथ जाने का फ़ैसला हुआ। दोनों ने रहने के लिए एक सामान्य दंपती के यहाँ कमरा किराए पर ले लिया। दोनों अपनी-अपनी अध्ययन सामग्री के साथ आवश्यकता की सभी वस्तुएँ लेकर वहाँ पहुँच गए। जाकर अपना कमरा जमा लिया। उनका मकान मालिक बहुत ही ग़रीब परिवार से था। वह सिलाई करके अपने परिवार का पालन पोषण करता था। उसकी बीवी मेहनत मज़दूरी करके अपना गुज़ारा चलाती थी। इस तरह दोनों पति-पत्नी सवेरे घर से निकलते और सूरज डूबने के बाद रात के अँधेरे में घर लौट आते थे। दोनों थके-हारे आते तब तक घर का सारा काम उनकी बेटियाँ सलमा और रेशमा दोनों सँभाल लेती थीं। सवेरे काम पर जाना और रात तक लौटना उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था। दोनों बेटियाँ घर के काम में और छोटे भाई की देखभाल में व्यस्त होने के कारण कभी विद्यालय का मुँह भी नहीं देख पाईं थीं। न ही आस-पास उनसे कोई सीधे मुँह बात करने वाला रहता था। इसलिए दुनियादारी का उन्हें ज़रा भी भान नहीं था। दोनों अकेली अपने काम में व्यस्त रहतीं थीं और अपने छोटे भाई की देखरेख में दिन गुज़ार रहीं थीं। 

इधर जब से उन्होंने कमरा किराए पर लिया तब से दोनों बहनों के अकेलेपन में बाधा आने लगी या यूँ कहें कि अकेलापन दूर हो गया। उनके साथ कभी-कभी थोड़ी-बहुत हँसी-ठिठोली हो जाया करती थी। वे एक दूसरे के काम में हाथ भी बँटा लिया करते थे। दिन भर काम में व्यस्त रहने के कारण उनके चेहरे भी मुरझाए हुए थे परंतु अब उनके चेहरों पर हँसी की फुहारें दिखाई देने लगीं। मन में नया उत्साह और उमंग उनके चेहरे पर स्पष्ट नज़र आने लगी थी। उन दोनों का भी इम्तिहान की तैयारी से ज़्यादा उन पर ध्यान रहता था। धीरे-धीरे बातचीत का दौर आगे बढ़ता रहा। वे भी अपना काम जल्दी समाप्त करने और समय बचाने की कोशिश में लगी रहतीं थीं। जिससे शेष समय में वे उनसे बात कर सकें। जब बातों का दौर चलता तो धीरे-धीरे एक दूसरे के मन की बातों में गुम हो जाते और समय का पता ही नहीं रहता। समय अपनी गति से बढ़ रहा था। समय के साथ-साथ नज़दीकियाँ भी बढ़ती गईं। एक समय ऐसा भी रहा कि वे दोनों अपने घर के कामकाज के साथ-साथ उनके कमरे का काम जैसे साफ़-सफ़ाई, झाड़ू-पोछा आदि भी कर देतीं थीं। पानी भर देतीं, कपड़े धो देतीं और भी बहुत सारे कार्य बिना कहे ही कर देतीं थीं। दोनों ओर से एक दूसरे का ख़्याल रखा जाने लगा था। अब ऐसी स्थिति हो गई थी कि दोनों पक्ष एक दूसरे को देखे बिना बेचैन रहने लगे थे। 

परीक्षा का आज अंतिम दिन था। एक डेढ़ महीना कैसे गुज़र गया कुछ पता ही नहीं चला। जैसे कल की ही बात थी। आज अंतिम पेपर देकर घर जाने का उत्साह था। वे दोनों इस बात से अनजान थीं कि ये आज ही चले जाएँगे। वे पेपर देकर आए और कमरे में जाकर अपने अपने सामान बिस्तर आदि समेटने लगे। बहुत देर तक जब दोनों ने उन्हें बाहर नहीं देखा तो दोनों बहनें कमरे में आ गईं। यहाँ आकर दोनों को आश्चर्य हुआ। क्योंकि वह चुपचाप बिस्तर समेटकर बाँध रहे थे। जिन्होंने कभी विद्यालय के दरवाज़े पर पैर नहीं रखा उन्हें क्या पता कि आज उनकी सभी परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी हैं। थोड़ी देर मूर्तिवत देखने के बाद पूछने लगीं कि हम से ऐसी क्या ग़लती हो गई जो हमें छोड़कर जाने की तैयारी कर रहे हो। दोनों की आँखों से अश्रु की धाराएँ बह रहीं थीं जो उनके वक्ष स्थल को गिला किए जा रहीं थीं। इधर इनका मन उन्हें छोड़कर जाने का नहीं था। आज उनके साथ बैठकर ढेर सारी बातें करने और उन्हें देखते रहने की हसरत थी। परंतु परीक्षा समाप्ति और माँ की ममता ऐसे दो कारण थे जो उन्हें घर की ओर खींच रहे थे। जब तक उन्होंने सारा सामान नहीं बाँध लिया तब तक वह ना जाने किस विचार में खोई टकटकी लगाकर उन्हें ही देखती रहीं। वे भी सामान बाँधने में जानबूझकर देरी किए जा रहे थे। उनको गाँव ले जाने वाली अंतिम बस सायं काल 5:00 बजे की थी। जैसे-तैसे उन्होंने चार तो कमरे पर ही बजा दिए। अब वहाँ से प्रस्थान की बारी थी। नितेश को जीवन में पहली बार ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं इन्हें छोड़ कर क्यों जा रहा हूँ? उसका मन भारी हो रहा था। कलेजा काँप रहा था। अंदर ही अंदर रो रहा था। अजीब सा महसूस हो रहा था। लेकिन जाना तो था ही। आख़िर हिम्मत से काम लिया और वहाँ से निकल पड़े। वे दोनों उन्हें घर के मुख्य दरवाज़े तक विदा करने आईं और रुँधे गले से कहने लगी कि 2 महीने बाद हमारा निकाह है। उसमें तुम ज़रूर आना। मैं तुम्हें चिट्ठी लिखूँगी। ऐसा कहते हुए आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने भी ज़रूर आने के वादे के साथ हामी भरी और चल पड़े । वे उन्हें आँखों से ओझल होने तक टकटकी लगाकर चकोर की भाँति देखती रहीं। अक्षर ज्ञान से अछूती पगलियों को क्या पता कि बिना नाम और पते के चिट्ठी नहीं पहुँच पाती और जिसने कभी स्कूल नहीं देखा वह चिट्ठी-पत्री कैसे भेजेंगी? नितेश बस में बैठकर उनके निश्चल प्रेम और भोलेपन के बारे में सोचता रहा। थोड़ी देर में बस हॉर्न बजाती हुई चल पड़ी। स्मृतियों के सागर में गोता लगाते लगाते कब गाँव आ गया पता ही नहीं चला। 

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