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निश्छल प्रेम (सलिल सरोज)

आख़िर
तुम मुझे क्या दे पाओगे
ज़्यादा से ज़्यादा
अपराध बोध से भरी हुई अस्वीकृति
या
आत्मग्लानि से तपता हुआ निष्ठुर विछोह


हालाँकि
इस यात्रा के पड़ावों पर
कई बार तुमने बताया था
इस आत्म-मुग्ध प्रेम का कोई भविष्य नहीं
क्योंकि
समाज में इसका कोई परिदृश्य नहीं


मैं
मानती रही कि
समय के साथ
और
प्रेम की प्रगाढ़ता
के बाद
तुम्हारा विचार बदल जाएगा
समाज का बना हुआ ताना-बाना
सब जल जाएगा


पर मैं ग़लत थी
समय के साथ
तुम्हारा प्यार
और भी काल-कवलित हो गया
तुम्हारा हृदय तक
मुझसे विचलित हो गया


तुम तो पुरुष थे
ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति
कभी कृष्ण, कभी अर्जुन की नियति
समाज की सब परिपाटी के तुम स्वामी
संस्कार,संस्कृति सब  तुम्हारे अनुगामी


फिर भी
प्रेम पथ पर
तुम्हारे क़दम न टिक पाए
विरक्ति-विमोह के
एक आँसू भी न दिख पाए


मैं
नारी थी
दिन-दुनिया,घर-बार
चहुँओर से
हारी थी


मुझको ज्ञात था
अंत में
त्याग
मुझे  ही करना होगा
सीता की भाँति
अग्नि में
जलना होगा


पर
मैं
फिर भी तैयार हूँ
तमाम सवालों के लिए
मैं ख़ुद से पहले
तुम्हारा ही बचाव करूँगी
और
ज़रूरत  पड़ी तो
ख़ुद का
अलाव भी करूँगी


मैं बदल दूँगी
सभी नियम और निर्देश
ज़माने के
और
हावी हो जाऊँगी
सामजिक समीकरणों पर
और इंगित कर दूँगी
अपना
"निश्छल प्रेम"
जो मैंने
जीकर भी किया
और मरने के बाद भी
करती जाऊँगी

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