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परीक्षा

दोपहर का समय था। द्रौपदी अपनी कुटिया में विश्राम कर रही थी। सोचती थी "मेरी भक्ति कृष्ण के प्रति तीव्र है, काश! औरों में हो ऐसी भक्ति! नहीं तो एक ही पुकार में चीरहरण की उस भयानक घड़ी में इस बहन को बचाने कैसे आते!" इसी सोच में डूबी द्रौपदी की दृष्टि अचानक बाहर की तरफ़ गई तो देखा, श्री कृष्ण अपनी कुटिया की ओर चलकर आ रहे थे। असल में द्रोपदी को अपनी भक्ति पर बहुत अभिमान था। कृष्ण एक बार उसकी परीक्षा लेना चाहते थे। कृष्ण को कुटिया की ओर आते देख उसके विस्मय और आनंद का बाँध एक साथ टूटा और उनके स्वागत के लिए दौड़ रही थी, ये सोचकर, अभी-अभी उनको याद क्या किया, दर्शन देने चले आए। मृदु मुस्कान को चेहरे में फैलाते श्री कृष्ण, द्रौपदी की ओर देख रहे थे। उसके हर्ष की सीमा न थी। 

"कृष्ण, आप पैदल आए? रथ कहाँ है आपका?" 

"प्रकृति का आनंद निहारते जंगल में चलना अनोखा अनुभव है, मुझे अच्छा लगता है द्रौपदी" उत्तर देते हुए दोनों ने कुटिया में प्रवेश किया। 

पानी इत्यादि प्राथमिक सत्कार एवं आपसी हालचाल पूछने के बाद कहने लगी कि 'गरम पानी का स्नान आपकी थकावट को दूर कर देगा। उसके बाद हम भोजन करेंगे', कहते-कहते पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भीम को पुकारा। उसकी पुकार को सुनकर पाँचों पांडव तत्काल पहुँच गए और कृष्ण को वहाँ पाकर फूले नहीं समाए। द्रौपदी ने भीम से गरम पानी का आग्रह किया। वह हाथों-हाथ बहुत बड़ा सा बर्तन लाया और उसमें पानी भरा, जंगल से एक पेड़ को उखाड़ लाया और अग्नि दी। घंटों तक चूल्हा जला किंतु पानी के गरम होने का नाम नहीं। वक़्त बीतता जा रहा था। द्रौपदी को ये चिंता सताने लगी कि साक्षात्‌ श्रीकृष्ण हमारे द्वार पर आए हैं, खाना तक खिला ना सकी। अतिथि का सत्कार ऐसे कोई करता है? लगातार अग्नि जलने के बाद भी ये पानी ठंडा पड़ा देख भीम सोचने लगा कि हमसे कोई भूल तो नहीं हुई? भीमसेन की मन की स्थिति को जानकर द्रौपदी हताश हो कृष्ण से ही पूछने लगी आखिर कारण क्या है? मृदु मुस्कान से मुरलीधर कहने लगे, "भीम, बर्तन के सारे पानी को फेंक दो। चूल्हे को जलाना भी बंद करो!"

"क्या हुआ वासुदेव? पानी क्यों फेंका जा रहा है? आपकी ये अनोखी लीला को मैं समझ नहीं पा रही हूँ , बताइए न श्याम!" 

द्रौपदी की शंका को मिटाते हुए वसुदेव बोलने लगें, "बस! बहुत छोटी सी बात है बहना! उस पानी में एक मेंढक था, और कब से मेरा नाम का जाप करता जा रहा था। इसलिए मैंने पानी को गरम होने नहीं दिया!"

यह कहकर कृष्ण सदाबहार मनमोहक की हँसी हँसने लगे। 

यह सुनकर द्रौपदी का घमंड चूर-चूर होने लगा। सोच रही थी कि मेरी भक्ति से कई गुना ज़्यादा उस मेंढक की भक्ति है। उसके सामने मेरी श्रद्धा एवं भक्ति की कोई मान्यता ही नहीं है। उस दिन से द्रौपदी का घमंड सर चढ़ने से पहले ही विलुप्त हो जाता था।

इस छोटी सी घटना से यह सबक़ हमें मिलता है कि किसी बात का घमंड कभी किसी को शोभा नहीं देता है।

*सुविचार:*

भक्ति का अहंकार भी एक दोष है जो सर्वथा त्याज्य है!

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टिप्पणियाँ

विजय मोहन सिंह 2021/05/31 09:02 PM

मनोहर कथा

डॉ. वि. अन्बुमणि 2021/05/31 08:16 AM

परीक्षा कथा बहुत सराहनीय है।

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