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पत्नी बीमार है

मैं उस समय एकदम जड़ बुद्धि हो गई, मेरे हाथ-पाँव सुन्न पड़ गए जब घर की सफ़ाई करते वक़्त अकस्मात पति महोदय के काग़ज़ों में ऑफ़िस का एक पत्र मिला। पत्र कुछ इस प्रकार था, "सूचित किया जाता है कि पत्नी की चिकित्सा हेतु रुपये पन्द्रह हज़ार मात्र कार्यालय से एडवांस के रूप में स्वीकृत किया है।" काग़ज़ हाथ से छूट गया और एक मुहावरे के तहत मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई फिर भी मैं खड़ी रही क्योंकि अभी यह सोचना बाक़ी था कि यह कौन सी पत्नी है, जो बीमार है और जो एकमुश्त पंद्रह हज़ार खाये जा रही है। जहाँ तक मैं जानती हूँ, मैं ही एकमात्र अब तक की पत्नी रहीं हूँ और इस समय तक पूर्ण रूपेण भली चंगी हूँ। पन्द्रह हज़ार की दवा तो दूर की बात है मुझे तो एक रुपये वाली सिरदर्द की गोली तक की आज तक दरकार नहीं हुई। हे भगवान, अब न जाने कैसे-कैसे दिन देखने पड़ेंगे! फिर सोचा बेचारे भगवान भी कहाँ-कहाँ और किस-किस के दुःख हरने पहुँचेंगे। कहावत है कि अपने ही मरने से स्वर्ग मिलता है, सो ठान लिया था तो स्वर्ग का रास्ता ख़ुद देखूँगी या फिर इस मरी चुड़ैल को ही स्वर्ग पहुँचा कर दम लूँगी। भगवान को कष्ट देने की बजाय ख़ुद ही कमर कस ली अब बस इस बीमार पत्नी का अचूक इलाज करके ही रहूँगी। मेरी कोशिशें रंग लाईं और पता चला कि वह बीमार पत्नी तो मैं ही हूँ। इस राज़ के पर्दाफ़ाश होते न होते यह बात बेपर्दा हो गई कि पत्नी की बीमारी पति के लिए ऐसा अचूक नुस्खा है जिसे पति जब चाहे, जिस तरह चाहे इस्तेमाल कर सकता है। लम्बी छुट्टी लेनी हो, तो पत्नी बीमार, अक्सर दफ़्तर लेट पहुँचें तो पत्नी रोगिणी, फंड से पैसा निकालना हो तो पत्नी की सीरियस बीमारी।

यह कहना बहुत मुश्किल है कि ये पति नाम का जीव इस तरह के मामलों में अपनी बीवी को ही क्यों बीमार कर डालता हैं। यूँ तो वे स्वयं को बहुत ही ज़्यादा आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और न जाने क्या-क्या समझते हैं, पर ऐसे मामलों में झट से बीवी के आँचल में ही जा दुबकते हैं। चाहे सरकारी कार्यालय हो, अर्द्ध-सरकारी या निजी संस्थाओं में ही कहीं कार्य न कर रहे हो। मौक़े का तकाज़ा होते ही बीवी की बीमारी की अर्जी आनन-फानन मंजूर करा ली जाती है। चपरासी से लेकर उच्च पदस्थ अधिकारी तक सभी ऐसे मामलों में बीवीशुदा होने का सुख प्राप्त कर रहे हैं। इतना ही नहीं, कभी-कभी तो ऐसे मामले भी प्रकाश में आ जाते है, जहाँ जनाब की ष्शादी भी नहीं हुई औार पत्नी बीमार हो जाती है। अब कार्यालय देर से पहुँचे हों, कोई आत्यावश्यक कार्य न हो पाया हो या फिर दफ़्तर में काम करने का मन ही न हो तो झट से पत्नी को बीमार बना दीजिए। लीजिए साहब, बन गया काम। आपको हज़ार-हज़ार बहाने मिल जायेंगे। मसलन पत्नी बीमार है, इसलिए डाक्टर के पास जाना पड़ा या पत्नी बीमार है इसलिए दिमाग़ी परेशानी है। आज काम न कर पाएँगे क्योंकि पत्नी बीमार है, इसलिए जल्दी घर जाना है।

मामला तब संगीन हो उठता है जब बात बनते-बनते बिगड़ जाती है। रामाधार जिस ऑफ़िस में कार्यरत है, उसके अधिकारी के बेटे की बर्थ-डे पार्टी में बुलाए गए थे। परन्तु उसी दिन मित्रों के साथ फ़िल्म देखने का प्रोग्राम पहले से निर्धारित था इसलिए पार्टी में न जाने बचने के लिए फोन पर पत्नी से यह कह दिया कि किसी आवश्यक कार्य में फँस जाने के कारण वे नहीं जा सकेंगे। रामाधार तो फ़िल्म देखने चले गए। उधर रामाधार की पत्नी ने सोचा कि अधिकारी की पार्टी में पति की अनुपस्थिति कहीं उनके प्रमोशन में बाधा न आए, अतः वे ख़ुद ही बच्चे को साथ लेकर पार्टी में चली गई। दूसरे दिन ऑफ़िस में साहब ने उनसे न आने का कारण पूछा तो तुरन्त कह दिया, "सर चाहता तो बहुत था पर पत्नी की तबियत अचानक ख़राब हो गई थी, इसलिए नहीं आ सका।" साहब यह सुनकर सकते में आ गए कि इस आदमी को झूठ बोलने की आदत सी पड़ गई है। बेचारे रामाधार को यह ख़याल ही न रहा कि उसकी पत्नी आमंत्रित पति के दायित्व की भूमिका का निर्वाह कर चुकी थी परन्तु रामाधार "पत्नी बीमार है" इन तीन शब्द के वाक्य के इतने आदी हो चुके थे कि कोई दूसरा बहाना सोच ही न सके और लेने के देने पड़ गए।

रामाधार इस मामले में नौसिखिए साबित हुए वरना क्षेत्र में जो माहिर हो चुके हैं उन्हें तो इस बीमारी की बिसात में चलने के लिए कुछ और मोहरे भी मिल जाते हैं, जैसे कि बीवी के अलावा कभी-कभार बच्चे भी बीमार हुआ करते हैं। बूढ़ी माँ को भी खाँसी आ जाती है, परन्तु पत्नी की बीमारी तो शतरंज की चाल में वज़ीर की तरह है जिसे उल्टा, सीधा, आड़ा-तिरछा मौक़ा-ए-वारदात पर जैसे चाहे वैसे चलाइए बशर्ते वह बीमार न हो, अन्यथा पति की खाट खड़ी हो जाएगी।

भाग्य की विडम्बना तो यह है कि जिस पत्नी की बीमारी के नाम पर पति महोदय दुनिया भर की सुविधाएँ व लोगों की सहानुभूति बटोरते हैं, वही पत्नी अगर बीमार पड़ जाए तो उसे पति से सन्त्वना के दो बोल भी नसीब नहीं होते हैं।

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