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पिघलते रिश्ते

काली रात/ जा छुप जा कहीं/ कल की सुबह/ प्यार की सुबह होगी/ जब माँग भरेगी/ रात की ज़ुल्फ़ें/ और सितारे. . .

कविता की इन पंक्तियों को लिखते हुए नैना के मन की वीणा के तार झनझनाए ही थे कि माँ की आवाज़ ने उन्हें तोड़ दिया। माँ लगभग दनदनाते हुए कमरे में आ गई थी। 

"मैं कितनी देर से तुम्हें आवाज़ लगा रही हूँ और तुम हो कि कुछ जवाब ही नहीं दे रही हो?"

"मैं कुछ लिख रही थी माँ। थोड़ी देर में तुम्हारे पास आ ही जाती। नैना ने लगभग झल्लाते हुए जवाब दिया।"

"बाद में लिखती रहना। अभी मैं जिस काम से आई हूँ, उसे सुन ले। तेरे लिए एक रिश्ता आया है। लड़का बहुत सुंदर और सुशील है। ख़ानदान भी अच्छा है। अपने माता-पिता का इकलौता लड़का है। तू वहाँ राज करेगी। अगले सप्ताह वे लोग तुझे देखने आ रहे हैं। मना मत करना।"

"लेकिन माँ, तुम जानती हो कि मैं अभी शादी नहीं करना चाहती। तुम क्यों मेरी शादी के पीछे पड़ी हो? और फिर माँ इस कोरोना जैसी महामारी में तुमने उन्हें यहाँ आने के लिए कैसे कह दिया? जब हर किसी का घर से बाहर निकलना ही मुश्किल है, तो ऐसे में वे लोग यहाँ आ कैसे रहे हैं?"

"यहाँ वे लोग एक की शादी में आ रहे हैं, तो उनका कहना है कि वे शादी के बाद तुम्हें देखने आ जाएँगे।"

"वाह! और तुमने इसके लिए हाँ भी कह दिया? बहुत समझदारी का काम किया तुमने? क्या माँ, मैं क्या तुम लोगों पर बोझ हूँ, जो इन दिनों में भी मुझे घर से निकालने के बारे में सोच रहे हो?"

"नहीं बेटा, माता-पिता के लिए बच्चे कभी बोझ नहीं होते। वो लोग यहाँ आ रहे थे और उन्होंने तुम्हें देखने की बात कही, तो मुझे ये अच्छा अवसर लगा, इसलिए हाँ कह दिया।"

"माँ, हमारा पूरा देश, बल्कि पूरा विश्व आज कोरोना जैसी महामारी से लड़ रहा है। 2020 का ये साल कोरोना के रूप में एक ग्रहण बनकर इस पृथ्वी पर आया है। इस महामारी के लिए अभी मास्क ही वैक्सीन है। सरकार बार-बार स्वास्थ्य के लिए जागरूक कर रही है और ऐसे में हम ख़ुद ही अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखेंगे, तो कौन दोषी होगा?"

"बेटा, तू अब 35 साल की हो गई है। अब और कितने समय तक शादी न करने का इरादा है? तेरे पिताजी तुझसे कुछ कह नहीं पाते। इसका मतलब यह नहीं कि वे तेरी शादी के पक्ष में नहीं हैं। मैं ही तेरे पीछे पड़ी रहती हूँ, क्योंकि अब धीरे-धीरे तेरी उम्र बढ़ रही है। पढ़ाई भी हो चुकी है। जॉब भी कर रही है। तेरा सपना था कि तू पढ़ाई के बाद पहले अपने पैरों पर खड़ी होगी, आत्मनिर्भर बनेगी, फिर शादी करेगी, तो तेरा ये सपना भी पूरा हो गया। कितने साल हो गए तुझे जॉब करते हुए। अब तो शादी कर ले। एक-एक करते हुए कितने अच्छे रिश्ते ठुकरा दिए हैं। अब इसे मत ठुकराना।"

"लेकिन माँ इस समय तो उन्हें बुलाना ही मत। मैं इसके पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ।"

"ठीक है, फिर हम उनसे वीडियो कॉल से ही बात कर लेंगे। आख़िर ऐसे भी बात पक्की हो सकती है ना?"

"माँ, तुम्हें इतनी जल्दी क्या है? ये समय निकल जाने दो। फिर इस बारे में सोच लेंगे।"

"नहीं बेटा, अच्छे रिश्तों को ठुकराना भाग्य को ठुकराने के समान होता है। अगर स्थितियाँ बनती है, तो मना मत करना। मैं उनसे वीडियो कॉल वाली बात करके देखती हूँ।"

"ठीक है माँ, सोचती हूँ। पहले मुझे अपनी ये कविता पूरी कर लेने दो। जो तुम्हारे इस रिश्ते के चक्कर में अधूरी ही रह गई है," कहते हुए नैना ने प्यार से माँ के दोनों कंधों पर हाथ रखा और उन्हें धकेलते हुए दरवाज़े तक ले गई।

माँ जानती थी कि इस बार भी नैना को शादी के लिए मनाना हर बार की तरह ही बेहद मुश्किल काम है। न जाने उसके मन में क्या है कि शादी के लिए हाँ ही नहीं कर रही है। अच्छी-ख़ासी पढ़ी-लिखी है, कमा रही है, सुंदर है। बस शादी की बात करो, तो प्यार से मना कर देगी। हर बार एक नया बहाना. . . आख़िर ऐसा कब तक चलेगा? उम्र भी तो बढ़ती जा रही है। कहीं कोई उसके मन को तो नहीं भा गया? यह भी पूछ कर देख लिया। जवाब ‘ना’ में ही मिला। फिर क्यों शादी के लिए मना कर रही है? माँ के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। 

नैना भी नहीं जानती थी कि ऐसा कब तक चलेगा? लेकिन जब तक वो टाल सकती थी टालती जा रही थी। आख़िर कौन ऐसी लड़की होगी, जिसके मन में अपने विवाह को लेकर सपने न हों? 21वें वसंत की सीढ़ियाँ चढ़ते ही मन अरमानों के बाग़ में पहुँच जाता है, जहाँ वह सपनों के झूलों में झूलने लगता है। एक अनजाने, अनदेखे राजकुमार का सपना मन के किसी कोने में बसने लगता है। नैना भी 21वें वसंत की सीढ़ियों से होते हुए 35 तक पहुँच चुकी थी। सुंदर थी, स्मार्ट थी। अपने मधुर व्यवहार से सभी को अपना बना लेती थी। अरमानों के फूलों की महक उसकी साँसों में भी समाई थी, परंतु. . . परंतु उसके पहले ही ज़िम्मेदारियों का ताज उसके सिर पर आ गिरा था जिसे वह नहीं फेंक सकती थी। 

माँ को केवल यही लग रहा था कि वह हर बार शादी से इंकार कर देती है, पर क्यों कर देती है, इस कारण को वे अनदेखा कर देती थी। उनकी नज़रों में बेटी बड़ी हो रही है, तो उसका विवाह कर उसे उसके घर सौंपकर वे उसकी ज़िम्मेदारी से मुक्त होना ही अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री समझ रही थी। लेकिन नैना के लिए कर्त्तव्यों की इतिश्री इतनी सहज नहीं थी।

बड़ा भाई तन्मय जॉब के सिलसिले में दूसरे शहर गया और फिर वहीं का होकर रह गया। इन दस सालों में लंबे सफ़र की दूरियाँ दिलों की दूरियों में बदल गईं। पहले वह सप्ताह में एक बार कॉल करता था, जिसे महीनों में बदलते देर नहीं लगी। अब तो जब वे लोग कॉल करते हैं, तभी उससे बात हो पाती है। उसमें भी कई बार कह देता है कि मैं अभी मीटिंग में हूँ। बाद में फोन करता हूँ। उसका बाद आते-आते इतनी देर हो जाती है कि माँ ही दुबारा फोन लगा लेती है। 

वहीं रहते हुए उसने अपनी कंपनी में ही काम करने वाली एक लड़की तन्वी से शादी कर ली है। तन्वी उनकी जाति की न होकर दूसरी जाति की है। माँ-पापा दोनों ही इस शादी के लिए तैयार नहीं होते। यही सोचकर उसने शादी करने के बाद इसकी सूचना घर पर दी। अब इतनी दूर से विरोध करने का कोई अर्थ ही नहीं होता। दिलों की दूरियाँ तो पहले ही थी, तो माँ-पापा दोनों ने चुप्पी साध ली। इन दस सालों में दो बेटियों के साथ उसकी गृहस्थी मुंबई जैसे बड़े शहर में अच्छी तरह से जम चुकी है।

बड़ी बहन स्वाति जो कि तन्मय से भी बड़ी है, वह घर पर ही है। स्वाति दीदी जॉब तो करती है, पर अपने शरीर से लाचार है। हाथ-पैरों की हडि्डयाँ धीरे-धीरे कमज़ोर होती चली जा रही हैं। ऐसे में चलना-फिरना, घर के कामों में हाथ बँटाना सब कुछ मुश्किल हो रहा है। वो तो गवर्मेंट जॉब है, तो उसे छोड़ना मूर्खता ही है, यही सोचकर जॉब कर रही है, वरना दीदी से अब जॉब करना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में एक वही तो है, जो घर को सँभाले हुए है। इस तरह ज़िम्मेदारियों का यह कँटीला ताज उसे किसी ने पहनाया नहीं था, बल्कि परिस्थितियों को देखते हुए उसने ख़ुद ही पहन लिया था। पापा इस बात को समझते थे। यही कारण था कि उन्होंने नैना पर कभी भी शादी के लिए दबाव नहीं डाला। 

एक रिटायर व्यक्ति रिटायर्ड होकर भी घर की ज़िम्मेदारियों से कभी भी रिटायर नहीं होता पर घर की शांति के लिए ज़िम्मेदारियों से रिटायर होने का दिखावा तो कर ही सकता है। इसे स्त्री उतनी अच्छी तरह से नहीं समझती, जितना कि पुरुष। यह समाज का सत्य है। जिसे गायत्री देवी ने तो नहीं पर ज्ञानचंद जी ने अच्छी तरह से समझ लिया था। 

नैना, पापा की चुप्पी का अर्थ समझती थी। उसने ख़ुशी-ख़ुशी इस घर की ज़िम्मेदारी एक बेटे की तरह उठा ली। वो जानती थी कि उसके घर से जाने के बाद घर को सँभालना मुश्किल हो जाएगा। तन्मय मुंबई से आ नहीं सकता। स्वाति दीदी ख़ुद ही बीमार है। और माँ-पापा? बुढ़ापा अपने आप में ही एक बीमारी है, तो ऐसे में सभी की देखभाल के लिए एक वही तो है। वो भी चली गई तो क्या होगा? 

अभी पिछले पंद्रह दिनों से उसे एक नई चिंता सता रही है, जिसके बारे में उसने घर में किसी को कुछ नहीं बताया। तन्मय और उसका पूरा परिवार मुंबई में रहते हुए कोरोना की चपेट में आ गया था। वहाँ रहते हुए इलाज करवाना मुश्किल था। हॉस्पिटल सारे भरे हुए थे। कोरोना मरीज़ों की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि और हॉस्पिटल में उनके इलाज में हो रही लापरवाही ने तन्मय को मुंबई छोड़कर अपने शहर भोपाल आने के लिए प्रेरित किया। भोपाल के एक पुराने डॉक्टर मित्र ने भी उसे यहाँ आकर एडमिट होने की सलाह दी। फिर क्या था, वह फ़्लाइट से परिवार सहित भोपाल आकर उसके ही हॉस्पिटल में एडमिट हो गया। तन्मय ने अपने आने की बात केवल नैना को ही बताई थी और घरवालों को बताने के लिए मना किया था। 

इन पंद्रह दिनों में उन सबका इलाज तो अच्छी तरह हो गया था और अब वे एक हॉटल में ही क्वारेंटाइन थे। डॉक्टर मित्र ने कहा था कि पंद्रह दिन बाद फिर से कोरोना टेस्ट करवाना और उसके बाद ही वापस मुंबई जा सकते हो। 

जब तन्मय ने नैना को ये ख़बर सुनाई तो नैना बहुत ख़ुश हो गई। ये पंद्रह दिन उसने कैसे काटे हैं, ये वही जानती है। घर में किसी को भी तन्मय के परिवार सहित भोपाल में होने के बारे में या उनकी कोरोना बीमारी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। ये सारी चिंताओं का बर्फ़ीला पहाड़, जो इतने दिनों से उसके सिर पर टिका हुआ था, वो इस सुखद समाचार को सुनते ही पिघलने लगा। उसने तय कर लिया कि अब वो तन्मय को कुछ समय के लिए तो यहाँ रोक ही लेगी। होटल में कुछ दिनों तक रहने के बाद जब फिर से कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट नेगेटिव आएगी, तब वो उन लोगों को मुंबई नहीं जाने देगी और घर पर बुला लेगी। तभी वो घरवालों को तन्मय के भोपाल में होने की बात बताएगी। वे सारी स्थिति जानकर बहुत ख़ुश होंगे।

वैसे भी बड़ी-बड़ी कंपनियों के द्वारा ‘वर्क फ्रॉम होम’ की सुविधा तो दी जा रही है। बच्चे भी ऑनलाइन ही पढ़ाई कर रहे हैं, तो ऐसे में वो उन चारों को कुछ समय के लिए यहाँ रहने के लिए मना ही लेगी। यहाँ रहते हुए सभी एक-दूसरे को समझेंगे। मन मिलेंगे, तो मनभेद दूर होंगे। हो सकता है कि नज़दीकियाँ तन्मय को घर की ज़िम्मेदारियाँ सँभालने के लिए प्रेरित करें। फिर घर के सभी लोग मिल-जुल कर कुछ समय साथ बिताएँगे, तो वह मेरे विवाह न करने की वज़ह को समझते हुए वापस मुंबई न जाने का निर्णय ले लें। यदि ऐसा होता है, तो माँ की मुझे लेकर चिंता ही दूर हो जाएगी। मैं भी इस बार माँ के बताए हुए रिश्ते पर अपनी स्वीकृति दे दूँगी। विचारों की इन हवाओं ने जब उसके गालों पर आई लट को लहराया तो 35 वें वसंत पर 21वाँ वसंत हावी हो गया और वह नवयौवना-सी शरमा गई।

पिछले पंद्रह दिन तो पंद्रह युग की तरह बीते थे, लेकिन अब ये पंद्रह दिन ताज़गी से भरपूर थे। रोज तन्मय और तन्वी से बातचीत होती थी। उन्हें माँ-पापा और स्वाति दीदी के बारे में सारी जानकारी देती थी। स्वाति दीदी की गिरती सेहत, माँ-पापा की चिंता, घर और जॉब की ज़िम्मेदारी को लेकर उसका घर-बाहर दौड़ना-भागना इन सारी बातों के बारे में बताते हुए उसे ऐसा लगता था, जैसे वो हर बार नए जीवन के और क़रीब जा रही है। तन्मय भी उसकी बातों को गंभीरता के साथ सुनता था और हर बार यही कहता था कि हाँ, नैना मुझे तुम्हारी ही चिंता है। तुम कैसे ये सब अकेले कर लेती हो। उसका इतना बोलना ही नैना को इस विश्वास की ओर ले जा रहा था कि अब वो उसे भोपाल में रुकने के लिए मना ही लेगी।

पंद्रह दिन सचमुच पंख लगाकर उड़ गए। सुबह-सुबह जब वो ऑफ़िस के लिए तैयार हो रही थी कि तन्मय का फोन आया। उसने बताया कि उन चारों की कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आई है। वे लोग शाम को होटल से चेक-आऊट करके उनसे मिलने के लिए घर आ रहे हैं। मिलने के लिए? आओ मिलने के लिए. . . तुम लोगों को जाने ही कौन देगा? मन ही मन ये सोचते हुए उसने ऑफ़िस जाने का विचार त्याग दिया। बॉस को फोन लगाकर मना किया और नीचे आकर धूप सेंक रहे माँ-पापा और स्वाति दीदी के पास जाकर बैठ गई। माँ को उसके इस तरह बैठने पर आश्चर्य हुआ, उन्होंने कुछ पूछना चाहा, उसके पहले ही नैना ने उनके होंठों पर अपना हाथ रखते हुए उन्हें चुप करा दिया और फिर एक-एक करके पूरे एक महीने तक का समाचार उन सभी के सामने रख दिया।

तीनों के चेहरों पर दु:ख, चिंता, हताशा, निराशा सुखद आश्चर्य और अंत में प्रसन्नता का भाव देखकर उसकी आँखें भी ख़ुशी से छलक उठी। कितनी ही देर तक वहीं आँगन में धूप सेंकते हुए वे चारों उनके बारे में ही बातें करते रहे। माँ ने कहा– "अब समझ में आया कि तन्मय मेरा फोन क्यों नहीं उठाता था और तुम रात को देर तक मोबाइल से क्यों चिपकी रहती थी। कैसे होंगे वे सब? कितने समय से वीडियो कॉल से भी उनको नहीं देख पाई हूँ। पूरे दस साल बाद उन चारों को एक साथ देखूँगी। तन्मय तो एक बार बीच में आया भी था, पर तन्वी और बेटियाँ? उनसे तो पहली बार ही मुलाक़़त होगी। कैसी होंगी वे तीनों?"

"अरे. . . गायत्री, शाम तक तो सब्र करो। वे लोग आ ही जाएँगे। देख लेना, मिल लेना और फिर रोक भी लेना। दादी हो उनकी। दोनों बच्चियाँ भला दादी की बात अनसुनी करेंगी?"

थोड़ी-सी नोंकझोंक, तकरार, हँसी-मज़ाक और कल्पनाओं की उड़ान भरते हुए वे चारों शाम के भोजन की तैयारी में लग गए।

नैना ने इस बीच समय निकालकर ऊपरवाला कमरा उन लोगों के लिए ठीक कर दिया था। जिससे उन चारों को कोई असुविधा न हो।

शाम 5 बजे क़रीब तन्मय का फोन आया। नैना ने माँ को ही फोन पकड़ा दिया कि वो ही बात कर ले और अपने प्यारे बेटे की आवाज़ सुन ले। माँ ने फोन काँपते हाथों से लिया और तन्मय से बात की। दूसरी तरफ़ से तन्मय बोलते जा रहा था और माँ आँखों में आँसू लिए सुनती जा रही थी। नैना मन ही मन इन आँसुओं को देखकर ख़ुश हो रही थी। ये ममत्व के अश्रु थे, जो माँ के गालों को भिगो रहे थे। इन्हें बह जाने दो।

तभी माँ ने फोन उसे पकड़ा दिया ओर जैसे ही उसकी बात तन्मय से हुई कि तुरंत उसे माँ के रोने का कारण समझ में आ गया। तन्मय और तन्वी दोनों होटल से चेक-आऊट करके दोनों बेटियों के साथ कार से मुंबई के लिए रवाना हो रहे थे। वे बस उनसे मिलने के लिए ही आएँगे। वो भी घर न आकर कॉलोनी के बाहर सड़क पर ही मिलेंगे। तन्मय ने इसके लिए ही फोन किया था कि आधे घंटे बाद कॉलोनी के बाहर सभी लोग आ जाना। वे लोग उनसे वहीं से मिलकर आगे बढ़ जाएँगे।

ओह? ये क्या? तन्मय तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? घर क्यों नहीं आ रहे हो? माँ-पापा और स्वाति दीदी से एक बार तो मिल लो। बहुत-बहुत समझाया नैना ने पर तन्मय कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। वह अपनी बात पर ही अड़ा रहा कि अभी एक महीने में मेरा बहुत नुक़सान हो चुका है, अब और नहीं करवा सकता। मुझे केवल अपनी ही नहीं, तुम सभी की भी चिंता है। मैं कुछ सोचकर ही यह क़दम उठा रहा हूँ। एक के बाद एक पापा और स्वाति दीदी से बातचीत की औपचारिकता निभाने के बाद उसने फोन रख दिया। सुबह से तन्वी और दोनों बेटियों की झलक देखने को उतावला मन उनकी आवाज़ सुनने को भी तरस गया।

कुछ देर बाद वे तीनों कैम्पस के बाहर थे और तन्मय की कार आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। स्वाति दीदी पैरों की तकलीफ़ के कारण नहीं आ पाई थी। कार आई, कुछ देर रुकी, कार की खिड़की का शीशा नीचे हुआ और उनमें से चार मास्क लगे हुए चेहरे दिखाई दिए। तन्मय-तन्वी और दोनों बेटियाँ बाहर आईं। सड़क की एक ओर मास्क से ढँके चार चेहरे थे और इस तरफ़ भी मास्क से ढँके तीन चेहरे थे। सभी की आँखें बहुत कुछ कह रही थीं। जो मौन नहीं कह पा रहा था। यहाँ महादेवी वर्मा के शब्द याद आ गए– “किसी कल्पना में जो सुख है, वह उसके साकार होने में नहीं।” दो पल के लिए सभी एक-दूसरे को अपलक देखते रहे और फिर तन्मय ने केवल इतना ही कहा– "आप लोग अपना ख़याल रखिएगा," कहते हुए वे लोग कार में बैठ गए। कार आगे बढ़ गई। तीन जोड़ी हाथ हवा में लहराते रह गए और आँखें आँसुओं से तरबतर होकर कार को ओझल होने तक देखती रह गई।

ये कोरोना की सच्चाई है या रिश्तों की सच्चाई? ये कोरोना से बढ़ी दूरियाँ हैं या स्वार्थ से बढ़ी दूरियाँ हैं? क्या है ये? प्रश्नों की शृंखला बढ़ती जाएगी, पर समाज में ऐसे कई घर हैं, जहाँ इन प्रश्नों का उत्तर मिलना असंभव है। 

कुछ दिनों पहले. . . कुछ घंटों पहले. . . या कहें कि कुछ देर पहले. . . देखे गए सपनों का अंत हो रहा था। इसके साथ ही टूट रहे थे कई और अनदेखे, अनजाने कल्पनाओं में तराशे गए सपने। नैना ने तुरंत घर आकर अपने आपको मज़बूत किया और कुछ समय के लिए कमरा बंद कर कलम-कॉपी से रिश्ता जोड़ा। एक नई कविता कुछ इस तरह काग़ज़ पर उतरी. . .

राहें कठिन हैं/ सफ़र मुश्किल हैं/ मगर चल पड़े हैं/ मुड़ना भी तय है/ एक मोड़ पर हम/ ख़ुद से ही टकराएँगे/ राहों में नहीं/ फूल दिलों में/ खिल जाएँगे/ न हारना ऐ दिल/ हम ये सफ़र यूँ ही/ हँसते-हँसते/ तय कर जाएँगे।

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