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प्रारब्ध

धनपत राय जी का वह मकान तिमंज़िला था। उन्होंने अपनी सारी जमा-पूँजी खर्च करके यह मकान तिमंज़िला इसलिए बनाया था क्योंकि उनके तीन बेटे थे। बड़ा बेटा किशोर उनके साथ खेती के काम को देखता रहा। मँझला रुपेश और छोटा महेश, ये दोनों नौकरी करते हैं। रुपेश तहसील में है और महेश एक स्थानीय प्राइमरी स्कूल में अध्यापक। ख़ैर, पाँच वर्ष पहले जब धनपत जी स्वर्ग सिधारे तो कुछ ही महीनों बाद रुपेश ने बताया कि पिता जी मकान की वसीयत उसके नाम कर गए हैं। फलस्वरूप, बड़े और छोटे भाई को कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। मुक़दमा यूँ तो पूरे चार साल तक खिंचा लेकिन फ़ैसला रुपेश के हक़ में ही आया। बीस अप्रैल 2015 के दिन कोर्ट का फैसला आया और 24 अप्रैल को पुलिस के दख़ल के बाद किशोर और महेश को मकान खाली करना पड़ा। पच्चीस अप्रैल को रुपेश ने मकान की शेष दो मंज़िलों को भी अपने कब्ज़े में ले लिया । संयोगवश, उसकी पत्नी अपने दो बच्चों के साथ अपने मायके गयी हुई थी। वह पत्नी और बच्चों को लाने के लिए पास के उस क़्स्बे के लिए रवाना हुआ जहाँ उसकी ससुराल थी। वह अभी ससुराल पहुँचा ही था कि भूकंप ने धरती को कंपा दिया। कुछ ही देर में टीवी चैनलों पर भारी जान-माल के नुक़सान के समाचार आने लगे। रुपेश जब देर दोपहर बाद पत्नी और बच्चों को लेकर वापस लौटा तो उसका वह तिमंज़िला मकान ज़मींदोज़ हो चुका था।

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