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प्रतिभाओं को ख़त्म करता नेपोटिस्म?

अनजान शहर और अपनी प्रतिभा, मेहनत, ज़िद से जगह बनाने की जद्दोजेहद में क़िस्मत कहें या सही कनेक्शन बहुत काम आते हैं। जो दरवाज़े बरसों की मेहनत से नहीं खुलते वह तुरन्त खुल जाते हैं। और आपके काम को नोटिस किया जाता है। फिर आपकी ज़िंदगी चल पड़ती है। लेकिन यह कनेक्शन, भाग्य की चाबी कुछ लोगों को जन्म से ही हासिल होती है। अट्ठारह वर्ष की उम्र से एक सामान्य भारतीय युवा पढ़ाई के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी, क्लर्क, शिक्षक बनने के लिए करता है, वहीं दूसरी ओर वह चाँदी का चम्मच लिए हुए युवा पार्टी, मस्ती, आउटिंग यानि ज़िंदगी के लुत्फ़ ले रहे होते हैं। जब आम युवा इतनी मेहनत के बाद भी बराबर असफल होने के डर से जूझ रहा होता है, दूसरी तरफ़ ख़्याल रखा जाता है कि अवसरों की लाईन उन ख़ास लोगों के लिए लगी रहे। इन्हें ताने, डाँट, तिरस्कृत किया जाता है कि केवल प्रथम श्रेणी से कुछ नहीं होता। और मेहनत कर, जान लगा दे। इन सबके बाद भी वह असफल होते, गिरते हैं और आख़िरकार निजी क्षेत्र में बहुत कम पैसों में काम करते-करते ज़िंदगी होम कर देते हैं। उधर नेपोटिस्म के लख़्तेजिगर का ख़्याल रखा जाता है कि उनका मूड कैसा है?  इसने हेल्दी फ़ूड, टॉनिक लिया या नहीं? कहीं घूम आओ। अनगिनत क़िस्से हैं जिनमेंं कपूर, बच्चन, ख़ान, देओल हो, टाटा संस, बॉम्बे डाईंग, हमदर्द, बजाज, हीरो समूह, एमडीएच आदि हो या आईएएस, पीसीएस, डॉक्टर्स के परिवारों की लाइन हो। फ़िल्मों में तो अनेक फरहान अख्तर, करन जोहर, फरदीन खान, जायद खान, आमिर, सलमान, तुषार, आदि गर्व से कहते हैं हम तो कॉलेज ड्रॉप आउट हैं। पढ़ने की फ़ुरसत नहीं मिली। घूमने, पार्टी आदि से। और जब जिस उम्र में उनका मन करता है, वह इंडस्ट्री में आ जाते हैं।  जबकि इसी वक़्त, दिककाल में आम व्यक्ति के बच्चे कला जगत, फ़िल्म, अभिनय, गाने, संगीत, निर्देशन या लघु उद्योग के सपने कब और कहाँ देखें?  यह स्पष्टतः ऐसी खाई है जिसका कोई युक्ति संगत समाधान निकालने की ज़रूरत इस इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में मुहँ बाए खड़ी है। अन्यथा ज़बरदस्त असंतोष, लावा, ग़ुस्सा उबल रहा है अंदर ही अंदर; प्रतिभाशाली, मेहनती और यह चमकते परिवारों के मध्य।  यह प्रयास होने चाहिए कि सभी को समान अवसर मिले और उसकी न्यूनतम अहर्ताएँ होनी चाहिए। वह जिनमें हो, उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच मिले। 

पर जब तक यह नहीं होता तो यही सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारक है जो भेदभाव, नेपोटिस्म और असंतोष को जन्म देता है। हालाँकि इसे सभी जगह शिक्षा, राजनीति, व्यवसाय, फ़िल्म, कला, संगीत, खेलकूद, साहित्य में चलाने की कोशिश भरपूर होती है। परन्तु कुछ जगह चल नहीं पाता। यथा कला, साहित्य, खेल आदि । क्योंकि वहाँ लगातार आपको बेहतर से बेहतर होना पड़ता है। और घटिया चीज़ को बढ़िया नहीं सिद्ध किया जा सकता। सब सामने होता है। 

उधर इसके पक्षधर हैं जो कहते हैं कि यदि हमारे पिता या ख़ानदान में कोई अपने क्षेत्र का दिग्गज है तो क्या उन्हें अपनी संतानों को उसी क्षेत्र में लाने का अधिकार नहीं?  सवाल वाजिब है। इस देश में जहाँ प्राचीनकाल से, द्वापर, त्रेता में राजतंत्र रहा। अनेक राजवंश हुए तो चन्द्रगुप्त चाणक्य भी हुए। वहाँ यह समझना मुश्किल नहीं कि पीड़ा कहाँ है और उसकी जड़ें कितनी गहरी हैं। 

प्रतिभा की क़ब्रगाह नेपोटिस्म

यह "वसुदेव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे भवन्तु निरामयाः" कहने वालों का राष्ट्र है। यहीं हुए आपको उस बालक, बुधिया (नई सदी की दस्तक के वक़्त की बात है) की याद है जिसे कोच लगभग 1200 मीटर के गोल मैदान में चक्कर लगाने की कहकर काम से चला गया। जब वह घण्टों बाद लौटा तो दस साल का बालक तब भी बिना थके मैदान के चक्कर लगा रहा था। कोच, विरंचि दास को आश्चर्य हुआ, समझे कि उन्हें आया देखकर बालक ने फिर दौड़ना प्रारम्भ किया। पूछा स्टाफ़ से तो पता लगा सुबह से ही ऐसे दौड़ रहा है बिना थके, रुके। कोच हैरान, अनगिनत चक्कर वह भी एक किमी से अधिक के मैदान के। अनेक बार परीक्षा हुई, आज़माया और ग़रीब मज़दूर के बालक बुधिया में यह जन्मजात प्रतिभा पाई गई। अब जहाँ कहो वह माने नहीं और ज़िला, राज्य सब जगह अलग-अलग लोग उसकी परीक्षा लेते और बुधिया हर बार अच्छे से दिखाता पास होकर। फिर उसे राष्ट्रीय धावक बनने के लिए ट्रेनिंग प्रारम्भ हुई। पुराने कोच को हटाया गया; जबकि बुधिया और उसके ग़रीब माता-पिता का उस पर ही भरोसा था। पर वह हटा बुधिया के उज्ज्वल भविष्य के लिए। लेकिन जो होता है वह हुआ, कड़े बिला वजह के अनुशासन, ट्रेनिंग और ऊपर से सवालों से धीरे-धीरे बुधिया निराश हुआ। फिर जिनके लिए वह ख़तरा बन सकता था, वह सब भी उसके ख़िलाफ़ हो गए। इन सबके मध्य वह अभ्यास करता रहा और राज्यस्तर पर अंडर 15 में फ़र्स्ट आया। नंगे पाँव दौड़ने वाले बुधिया को कभी स्पोर्ट्स शू आरामदायक नहीं लगे। फिर उसकी प्रतिभा को पहचान उसका श्रेय लेने की अग्रिम होड़, राजनीति चली। अंत हुआ बुधिया की दुर्घटना में मौत से। कुछ समय बाद उसकी मौत का रहस्य जानने वाले कोच विरंचि दास की भी हत्या हो गई। 

इन्हीं कटु यथार्थ के मध्य हम आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन यह बड़ा वर्ग अब जग चुका है और अथाह मेहनत, प्रतिभा से वह आगे बढ़ रहा है। राष्ट्रकवि दिनकर की यह पंक्तियाँ इसे अधिक स्पष्ट करती हैं, "सर्दियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी/ मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है /दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो/ सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" (समर शेष है, महत्व दिनकर, 2012, प्रांजल धर, अमिय बिंदु) यह बताती है कि अब नेपोटिस्म हटे और प्रतिभा सामने आए। लेकिन कैसे?  और यह कौन निर्धारित करेगा कि आपमें प्रतिभा है?  

(अ)कला क्षेत्र: 

कला, राजनीति और सेवा क्षेत्र में विश्लेषण करते इस लेख में सबसे पहले हम आते हैं आदिकाल की इस मनोवृति पर कि अपनी संतान, परिवार को संरक्षण मुझे ही देना है। चाहे उसके लिए जोड़तोड़ (कैकयी, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य एकलव्य, स्वयं भगवान वामन रूप में आदि), छल कपट, रिश्वत, भाई-भतीजावाद (आप अमुक विद्वान, प्राचार्य, कुलपति के पुत्र पुत्री हैं)। 

फ़िल्मों में आप देखें कि सुशांत सिंह राजपूत जैसे होनहार सितारे को कंचन, कामिनी और गांजा की लत लगाकर बिगाड़ दिया। फिर उसकी हिट फ़िल्मों को कुछ पत्रकारों से सांठगांठ कर फ़्लॉप बता दिया। उसी फ़िल्म छिछोरे ने एक सौ सत्तर करोड़ की बॉक्स ऑफ़िस पर कमाई की। और अभी-अभी मार्च 2021 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।  यह कम था तो चालें चलीं कि एक बड़े फैशनेबल लंदन निर्देशक की फ़िल्म... दूर के की तैयारी का झाँसा देकर दो साल बेकार रखा और फिर वह बड़ी फ़िल्म नेपोटिस्म के संरक्षकों के इशारे पर बन्द हो गई। उधर एक नई फ़िल्म (हाइवे) को लॉक डाउन से पहले बजाय सिनेमागृह में लगाने के ऑनलाइन रिलीज़ करके पिटवा दिया। जिससे इमेज और रिपोर्ट ख़राब। सवाल यह कि कोई इन सब ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ बोला क्यों नहीं?  वजह सत्तर फ़ीसदी ख़ुद दोषी, नेपोटिस्म वाले किस मुहँ से बोलें?  बाक़ी इस डर से चुप की हमारा अंजाम इससे भी ख़राब होगा। काम नहीं मिलेगा। इन पाखण्डियों, अवसरवादियों के मध्य एक लड़की बोली, खुलके बोली और सब बोली। कंगना ने पूरे प्रमाणों के साथ इस नेपोटिस्म (भाई भतीजावाद) का चक्रव्यूह भेदन किया। और फिर आनंद पंडित, मुकेश खन्ना, सोनू निगम, अभिजीत कई आवाज़ें उठीं। जिन पर कई तोहमतें लगीं परन्तु वह डटे रहे । जिन्हें गम्भीरता से लिया गया और सुना गया। कार्यवाही पूरी भले ही नहीं हुई परन्तु शीशमहल में पत्थर तो लग ही गया। जिसकी गूँज आने वाले समय तक सुनाई देगी। हालाँकि फ़िल्म लाइन में सभी ऐसे हो ऐसा नहीं है या यूँ कहें कि उनके पास अभी नेपोटिस्म करने की ज़रूरत या अवसर नहीं है।  सुभाष घई, मनोज कुमार, तिग्मांशु धूलिया, अनुराग कश्यप, नीतीश तिवारी, संजय भंसाली आदि अनेक नाम हैं जो प्रतिभा को पहचान उसे अवसर देते हैं। लेकिन अधिकांश ऐसे नहीं हैं। वरना देखें अभी नेपोटिस्म, सुशांत (आत्म)हत्या पर अक्षय कुमार, तीनों खान से लेकर अमिताभ तक ने मुँह नहीं खोला। 

संगीत, निर्देशन में फिर भी थोड़ी शांति है । क्योंकि सात सुरों और निर्देशन की बारीक़ियाँ सीखे और कड़ी मेहनत किए बिना आप एक या दो तुक्के जड़ दो। परन्तु लम्बी पारी खेलने के लिए नैसर्गिक प्रतिभा, मेहनत, लगन और सतत अभ्यास की ज़रूरत हमेशा रहेगी। 

(आ) शिक्षा और साहित्य: 

यदि आप आदर्श जगत और मूल्यों की बात करते हैं और सोचते हैं कि यह अन्य लोग भी मानते होंगे, तो यह ग़लतफ़हमी आपको ज़िंदगी भर अँधेरे कोनों में धकेल देगी। जितना अंधकार, नेपोटिस्म, घूसखोरी, (जिसकी कोई सीमा नहीं) इन क्षेत्रों में है वह कहीं नहीं। स्थिति गम्भीर और शोचनीय के साथ शर्मनाक भी हो जाती है। क्योंकि जिनके ऊपर भावी पीढ़ी तैयार करने, उन्हें मूल्यों, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, प्रतिबद्धता सिखाने और बताने की ज़िम्मेदारी है, वही यह भ्रष्ट आचरण करते हैं। और सीना ठोक के करते हैं। जिन्हें विभिन्न शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालय, महाविद्यालय में आवेदन और साक्षात्कार का अनुभव है वह जानते और समझते हैं। आज हर गुरु द्रोणाचार्य और हर सामान्य शिष्य एकलव्य है। दो या तीन द्रोणाचार्य मिल गए तो आपका जीवन नरक से बदतर और कहीं समाप्त ही न हो जाए की चिंता बन जाती है।  अभी यह पर्याप्त लगा हो तो रुकें, अभी और भी है। रुपए, संगठनात्मक भेदभाव, अस्मिता माँगना, और सबसे बढ़कर सूची बनाकर रखना कि यहाँ अपना कोई नहीं है, तो यहाँ के मगरमच्छ को उपकृत करो और आगे कहीं अपने व्यक्ति का लाभ इससे लेंगे।  उच्च अध्ययन केंद्रों में यह इतना गहरे तक जड़ें जमा चुका है कि इससे पार पाना नामुमकिन है। ऊपर से गम्भीर, देव स्वरूप शक्ल बनाकर कोई अकडमिक, और ’मेहनत करो’,”अगली बार ज़रूर होगा’ जैसे वाक्यों से बरगलाते हैं। कोई एसीबी, सरकार इस चक्र को नहीं तोड़ पाई। क्योंकि गुरुघण्टालों ने ऐसा किया है कि होता सब कुछ है, पूर्व निर्धारित, परन्तु दिखता नहीं सतह पर कुछ। नया प्रतिभागी, नई जगह पर अपनी मेहनत, लगन से साक्षात्कार देगा या कि आपके गणित, जोड़तोड़ की पड़ताल करता रहेगा?  अंततोगत्वा वह यह कहकर सोचकर रह जाता है कि तैयारी में कोई कमी थी, सब कुछ नहीं पढ़ा, और मेहनत करूँगा या अपने तो भाग्य में ही नहीं। यह कहते करते वह मामूली प्राइवेट स्कूल, ट्यूशन, कोई डीमार्ट स्टोर में छोटी-मोटी नौकरी करके ज़िंदगी बिता देता है। लड़कियाँ शादी करके घुटन भरी आँखों में सपनों को दबाए बैठी रह जाती हैं। जिस योग्य वह थे, वह उन्हें मिल जाता, अयोग्य नहीं लिए जाते तो कितनी ही प्रतिभाएँ समयपूर्व समाप्त नहीं होतीं। और उधर ऐसे अयोग्यों, जो पढ़ाना, पढ़ना कुछ भी नहीं जानते (मुझे विश्वास है आप सभी ने अपने आसपास ऐसे लोग हर जगह, हर शहर में देखे हैं) को पद मिल जाता है तो वह क्या पढ़ाएगा और क्या इस देश की भावी पीढ़ी प्रारम्भ करेगा? और यह सब हुआ उन प्रगतिशील लोगों द्वारा जो समता, बराबरी, निष्पक्षता की बात ही करते रहे पर कभी भी बिना शोषण या गुटबाज़ी के आम व्यक्ति को आगे नहीं आने दिया। 

हद तब हुई जब स्त्रियों ने अपने शोषण के ख़िलाफ़ हिम्मत कर ख़ुद ही आवाज़ उठाई तो यह प्रगतिशील उसी स्त्री के ख़िलाफ़, उसके चरित्र हनन में ही उतर आए। और शोषक के पक्ष में मोर्चा निकालने लगे। तहलका प्रकरण, तेजपाल तरुण, एमजे अकबर तो सामने आए। दिल्ली में कुछ सालों पहले और अभी-अभी भोपाल में स्त्री के बरसों शोषण के बाद भी जब वह संपादक, जो प्रगतिशील, वामी था, जिसकी सभी इस सोच के लेखको से यारी पीना, खाना था, ने उसे कहकर भी हक़ नहीं दिया तो कानून का रास्ता पकड़ा उसने। संपादक घिरे, फँसे लेकिन प्रगतिशील लेखकों, महिलाओं के बढ़ावे की बात कहने वालों ने तय किया कि इतनी हिम्मत एक महिला की?  क्या हो गया जो सब कुछ ले लिया?  यह तो हक़ है इन बुद्धिजीवियों का। अब शिकायत करती फिरती है, चुपचाप क्यों नहीं बैठती?  उसकी भी सहमति थी, वही सब बातें जो रेपिस्ट के पक्ष में वकील कोर्ट में कहता है इन लोगों ने खुले-आम कहीं। और दो तीन इनके हिमायती पत्रकारों, चैनल ने चलाई भी कि वह सम्पादक दोषी नहीं। सहमति थी। दोनों जगह बेहद शर्मनाक पर सच है, प्रगतिशील सोच के लोग, लेखक महिलाओं के ख़िलाफ़ मोर्चा, ज्ञापन पर उतर आए। दिल्ली में तो जंतर मन्तर पर कैंडिल मार्च, भाषण हो गए। पर उस पत्रकार महिला के पक्ष में कुछ महिलाएँ जुड़ीं और उसके लिए आवाज़ उठाई। वैसे जो दबंग महिलाएँ, लेखिकाएँ थीं वह उस संपादक के ही साथ थीं। भोपाल में वह स्ट्रिंगर पत्रकार तो अकेली हो गई और उसे ही लॉकअप में डाल दिया गया। वहाँ के प्रगतिशील बिरादरी ने तय किया कि ऐसे इल्ज़ाम लगाने की ज़ुर्रत एक महिला ने कैसे की?  (मानो उनका तो हक़ है शोषण दर शोषण करने का, और ऊपर से आप आवाज़ भी न उठाओ। भले ही आपसी सहमति हो और कुछ स्त्रियाँ लाभ के लिए करती भी हों परन्तु आप लाभ भी न दो, शोषण भी करो, आवाज़ भी न उठाने दो और बेशर्मों की तरह स्त्री सशक्तिकरण की आवाज़ भी उठाओ? वाह, इतनी अँधेरगर्दी? दीदादिलेरी?) अहा, अहा, अहो भाग्य उस संपादक के ही इन लोगों ने यह तय किया कि लेखकों का संगठन हर राज्य में इस महिला के ख़िलाफ़ मोर्चा और धरना देगा। जयपुर के हमारे परिचित से बात हुई मेरी अचानक तो उन्होंने बताया कि ऐसे, इस रविवार सभी प्रगतिशील लेखक, पत्रकार कैंडिल मार्च और धरना दे रहे हैं संपादक को बेगुनाह फसाया जाने के ख़िलाफ़। मैंने तुरन्त अपने मित्र को आगाह किया, सारी बात बताई और कहा वह दोषी है, निर्दोष नहीं। आप लोग यह बेवकूफ़ी न करें। मित्र हड़बड़ाए, फिर इसके कर्ताधर्ता एक बड़े लेखक (उनके) से मेरी बात कराई। मैंने बातें दोहरायीं परिनंतवः धरना, कम आधे, लोगों का ही हुआ। और उसके दो दिन बाद समाचार आ गया कि सम्पादक ने ख़ुदकुशी कर ली। उधर दिल्ली में भी यही हुआ। 

ऐसा ही हिंदी साहित्य जगत का कुछ वर्षों पूर्व तक का परिदृश्य।  पिछले अनेक दशकों से एक ख़ास विचारधारा के इने-गिने नामों में ही सारे सम्मान, पुरस्कार रेवड़ियों की तरह अनगिनत बार दिए। अब नई सरकार ने रोक लगाई की भैया कब तक? अब हमारे लोगों की बारी है, जिन्हें आपने हाशिए से भी बाहर रखा। कुछ को तो दिल्ली से दूर फेंके रखा। तो अवार्ड वापसी या किसानों, महिलाओं, युवाओं को बिला वजह भड़काना। इस काम में लगकर अपने जीवन को निरर्थक कर रहे हैं। इधर दूसरे पक्ष के वह लोग जो सीखे इन्हीं से कि अब अवार्ड हम देंगे, चुन चुन कर अपने लोगों को देंगे। नतीजा इस होड़ में हिंदी साहित्य, संस्कृति का और पतन हुआ। इतना शर्मनाक हुआ कि आम लोग किताब लिख रहे हैं, और प्रोफ़ेसर उसे सुन रहे हैं, वाह वाह कर रहे हैं। 

ऐसा नहीं कि सभी ऐसे हैं या प्रतिभा की क़द्र नहीं। है क़द्र बराबर है। इसीलिए पूरी सूची, हर अंक, योग्यता साक्षात्कार बोर्ड से पहले बारीक़ी से देख सुन, जानकर फोन पर अपने ही लोगों को बोर्ड में रखवाते हैं। जिससे योग्य व्यक्ति कहीं ग़लती से चयनित न हो जाए।  और दुखद सच है, अब वह कैंडिडेट को अपने साथ ही लाते हैं और चयन करवाकर ही जाते हैं। हर जगह, हर बार यही होता है। फिर धोखा यह कि जो इन लोगों को जानते हैं, स्थानीय हैं वह इन्हें प्रणाम, मान सम्मान देते हैं तो यह उनसे भी कुछ न कुछ फ़ायदा ले लेते हैं पर यह नहीं कहते कि हम पूर्व में ही उस व्यक्ति या महिला को चुने बैठे हैं। इस फ़रेब की कहाँ सुनवाई और क्या सज़ा है?  

(इ) साहित्य जगत: 

उसमे नेपोटिस्म चलाने की बहुत कोशिशें हुईं। हर धुरंदर लेखक (माफ़ करें लगभग सात दशकों तक सब जगह प्रगतिशील गुट, वाम लोगों का ही कब्ज़ा रहा) ने यहाँ भी सबसे पहले अपने बेटी, बेटों को प्राध्यापक बनवाया फिर उन्हें कविताई, आलोचना आदि में आने को ज़ोर दिया। क्यों? क्योंकि औसत बुद्धि के लाखों प्राध्यापकों में लेखक और साहित्य में नाम कमाने वाले विशेष दर्जा रखते हैं। उन्हें सम्मान, पुरस्कार, ऊँचे पद सब मिलता है; जो करोड़ों ख़र्च करके भी नहीं मिलता। तो यहाँ भी बेशर्मी से यह किया गया। पर करने वाले अधिकांश औसत और ख़ुद भी ऐसे ही आए थे तो हिंदी साहित्य जगत में यह नेपोटिस्म चल नहीं सका। क्योंकि अक्षर ब्रह्म, माँ शारदेय की आराधना से ही यह प्रतिभा आती है। और सौभाग्य से यह लोग इसे मानते ही नहीं। परन्तु कोशिश, भरपूर कोशिश इन्होंने की बराबर। कुछ उद्धरण देखें, अनेक सिंह, रावतों, ब्राह्मणों की संतानें बाक़ायदा बढ़ाई गईं। कैसे? कविताओं, लेखों, कहानियों को, जिन्हें अक़्सर विदेशी लेखकों से लिया गया (चुराया शब्द से आजिज़ आकर यह लोग उसे प्रेरित होना कहते हैं) को अपनी इष्ट वामी मित्रों की पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाया गया। नियम से पूरे वर्ष, अलग-अलग पत्रिकाओं में। साथ ही जो महिलाएँ बिना पढ़े, या अध्ययन के बिना शीघ्र साहित्य के ग्लेमर से (जी हाँ, यह बात सच है कि साहित्य, बुद्धिजीवी जगत में बहुत ही ग्लेमर, नाम, सम्मान है।) प्रभावित होकर आगे आना चाहती हैं, उन्हें भी प्रोत्साहित किया। नतीजतन ऐसे लोगों की कुछ वर्षों पूर्व तक बाढ़ आ गई जो अमुक के बेटे, या बेटियाँ थे। परन्तु यह सिलसिला चल नहीं पाया। क्योंकि साहित्य सतत साधना, लोक और आम व्यक्ति और भाषा के प्रति ईमानदारी से ही आता है। आप दो, चार बार लिखा हुआ प्रकाशित करवा देंगे, किताब भी ले आएँगे परन्तु फिर उतनी ही तेज़ी से आप बाहर हो जाएँगे। 

और ऐसे लोगों का ट्रैक रिकॉर्ड बड़ा ही दिलचस्प है। वह नौकरी पाने, या अमुक व्यक्ति के कृपा पात्र, सन्तति होने के बाद ही अचानक से चन्द इनी-गिनी पत्रिकाओं में नज़र आने लगे। उससे पहले कभी कोई रचना, कविता, लेख, लघुकथा न लिखी और न सोची। 
नागार्जुन, रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, भवानी दा, देवताले, सूर्यबाला, महादेवी वर्मा, शैलेश मटियानी, मुक्तिबोध, नरेंद्र कोहली, रामदरश मिश्र, अज्ञये, यशपाल, इस्मत आपा, कृष्ण बलदेव वैद्य, कुसुम खेमानी, प्रेम जनमेजय, ममता कालिया आदि चन्द ऐसे नाम हैं जिन्होंने कभी अपनी संतानों को बढ़ावा नहीं दिया। परन्तु नागार्जुन, नरेंद्र कोहली, ज्ञान चतुर्वेदी की तरह खुलकर व्यवस्था और भाई भतीजावाद का विरोध इनमे से अधिकांश ने नहीं किया। 

आलोचना, जो हिंदी साहित्य की ही नहीं जीवन की भी महत्वपूर्ण विधा है में देखें। सुप्रसिद्ध आलोचक और नैतिक मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध प्रो. रामविलास शर्मा जैसे बिरले ही होते हैं जिन्होंने सरकारी संस्थाओं द्वारा प्रदत्त पुरस्कार नहीं लिए। फिर भी मिला और साथियों ने लेने का अनुरोध किया तो आपने स्वीकार किया परन्तु लाखों की धनराशि साक्षरता अभियान के लिए दान कर दी। जबकि उस वक़्त वह आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। उन्होंने कहा, "लुकाच को छोड़ दीजिए, कॉडवेल को कैसे आप साहित्य में लागू करेंगे? मार्क्स ने अपने ग्रन्थ कैपिटल में कहाँ लिखा है मार्क्सवाद के बारे में? उसमे ऐतिहासिक भौतिकवाद कहाँ है? कैपिटल का यही महत्व है कि उसमे मार्क्स का तरीक़ा 'as such' जो है वह महत्वपूर्ण है। (पेज 54, प्रगतिशील वसुधा, अंक 89, पूरी बातचीत प्रगतिशील मान्यताओं की आलोचना करती, पढ़ी जा सकती है)। आगे वह कहते हैं कि "लोक जागरण में शुक्ल जी ने रहीम का जब उल्लेख किया तो तुलसी को भी बराबर याद किया। रहीम के नीतिपरक दोहे तुलसी के नीतिपरक दोहों से मिलते हैं। जबकि प्रगतिशील तुलसी को इतना महत्व नहीं देते। वह खुलकर कहते है कि "हमारा हिंदी प्रदेश (1997 की बात) निरक्षर अधिक है। जनता जितनी साक्षर होगी उतना ही साहित्य और संस्कृति का आधार मज़बूत होगा।" आगे आपने प्रखर आलोचक नामवर सिंह से ऐतिहासिक बातचीत में यह भी स्थापित किया कि सिंधु सभ्यता के मूल निवासी आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे, उनकी यहीं बस्तियाँ थीं।" इसके बाद कुछ साहित्यिक अखाड़ेबाज़ों ने उन्हें दक्षिणपंथी (यानि राष्ट्रवादी, प्राचीन सोच का कहना प्रारम्भ कर दिया)। अपने ही प्रखर स्तम्भ, विद्वान को नकारना क्योंकि उसने तथ्यसहित प्रगतिशीलों की यह सनातन सोच की भारत के मूल निवासी सुदूर अफ़गानिस्तान या उससे भी कहीं बाहर से आकर यहाँ बसे थे। रामचन्द्र शुक्ल के बाद रामविलास शर्मा दूसरे व्यक्ति रहे जिन्होंने वाम प्रगतिशीलता और नेपोटिस्म की आलोचन की और प्रतिभा को ही आगे बढ़ाया। जो मानते थे कि ख़ूब आलोचनात्मक निगाह से पढ़ना चाहिए। और जो आदमी जिस जगह पर है वह जो राय देता है तो उसका सम्मान होना चाहिए। अफ़सोस इस बात का है इस निष्पक्ष परम्परा को आगे बढ़ाने वाले विद्वान लुप्त हो गए। 
और आज जब लगभग हर दिल्ली, प्रयागराज, मुम्बई, वाराणसी आदि के हर विषय के प्रोफ़ेसर ने अपने घर में हर लड़का, लड़की, बहू, बेटी, भाई भतीजा को पीएच.डी., सेट, नेट, येनकेन करके प्राध्यापक बनवा दिया है। एपीआई स्कोर के खेल को दशकों चलाया। जिससे आप सेमिनार, शोधपत्र प्रस्तुति (जिसे प्रोफ़ेसर ख़ुद लिखते अपनों के लिए, आज भी लिखते हैं। कंचन, कामिनी योग के लिए) से सैंकड़ों अंक लेकर पीएच.डी. नेट के अंकों से भी कई गुना आगे और वही एपीआई स्कोर उन्हें चयनित करवाता। अब ऐसे लोग क्या पढ़ते और क्या पढ़ाएँगे? वह तो अब वर्ष दो हज़ार अठारह से एपीआई का पुराना मानदंड समाप्त करके नए, सख़्त नियम आए जिससे सामान्य युवा को भी मौक़ा मिल सके। हालाँकि उन नियमों की आड़ में नेपोटिस्म भी बराबर चलेगा। क्योंकि ऐसे लोग हर जगह एक पतली गली निकाल ही लेते हैं। 

(ई) राजनीति, उद्योग और खेल जगत:

जिस देश के डीएनए में राजनीति, राजतंत्र, खड़ाऊँ रखकर राज करना हो वहाँ नेपोटिस्म अपनी पराकाष्ठा पर होगा, है और आगे भी रहेगा। तभी भारत मे हर प्रान्त में ऐसे परिवार मिल जाएँगे जिनकी दो से लेकर चार पीढ़ियाँ राजनीति के माध्यम से देश और समाज की सेवा को समर्पित हैं। उनके विरोधी या प्रतिभाशाली लोग दुर्घटना में मारे गए या आजकल बहुत चल रहा बीमार होकर भर्ती हुए तो फिर ऊपर ही निकल गए। मैदान साफ़। आम व्यक्ति आज़ादी के बाद से ही हड़बड़ाया, काम, रोज़गार और धर्म, जाति के नाम पर ऐसे कोल्हू में जुता है कि अब कुछ पलों के लिए साँसें ले पा रहा है। जब उसकी मजूरी, मदद (सब्सडी), पंचायत से लेकर अतिवंचित तबक़े तक अब उसके नाम के खाते में आ रही है। यह अलग बात है कि दबंगों और मालिकों ने उसके बैंक खाते की हर पासबुक अपने पास जमा कर रखी है और उससे हस्ताक्षर ले रखे हैं। नतीजतन वह वहीं का वहीं खड़ा सोचता है एक दिन बोलूँगा, विद्रोह करूँगा, मालिक को मज़ा चखाऊँगा पर वह होता नहीं। क्योंकि ज़बरिया और ज़बर होता जाता है उधर निरीह और निरीह। परिणामतः ग़ुस्सा निकलता है औरतों पर। अपराध की राह पर चल पड़ता है। यह असमानताएँ सदियों से हैं इसका हल समाज विज्ञानियों के ही पास है। उधर एक बड़े औद्योगिक घराने ने सराहनीय पहल की और अपने स्थापित विशाल कारोबार में परिवार के बाहर के सीईओ, रूसी मोदी, सायरस मिस्त्री को नम्बर दो की पोज़ीशन देने लगे। बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में उनकी सुनी और मानी जाती है। तो जैसे हम भारतीयों की आदत है, हम अपने बीच में से किसी को आगे बढ़ता देखते हैं तो उसके हर फ़ैसले, क़दम, व्यवहार का इतना सूक्ष्म विश्लेषण करके कमियाँ निकाल उसे बॉस तक पहुँचाना (चुगलखोरी ज़्यादा बेहतर है) अपना धर्म मानते हैं। नतीजतन सीईओ का पद, लोकतांत्रिक व्यवस्था लाने वाला भी सोच में पड़ अपने ही फ़ैसले पर संदेह करता है। तभी यह विवाद हुए टाटा मिस्त्री विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। यही आम व्यक्ति सायरस मिस्त्री की विजय रही कि उसने उनकी नियुक्ति और हटाने सम्बन्धी कारणों को चुनौती दी। जीत हालाँकि टाटा की हुई। लेकिन बाक़ी घराने चाहे डाबर के बर्मन हो, महेंद्रा के आनंद महेंद्रा, अम्बानी, लक्ष्मी निवास मित्तल, हिंदुजा, बजाज, हीरो मोटोकॉर्प के मुंजाल, ब्रिटानिया, बॉम्बे डाईंग के वाडिया आदि सभी में परिवारवाद का टॉप पोस्ट और बोर्ड में पालन हो रहा है। पर यह नेपोटिस्म बाक़ी जगहों पर लाखों को रोज़गार भी दे रहा है। बोर्ड फ़ैसलों में चाहे बहुमत न सही पर थोड़ी जगह दे रहा है बाहर के लोगों को। सिंघानिया ग्रुप ऑफ़ कंपनीज़ का दिलचस्प उदाहरण है जहाँ सीनियर यदुपति सिंघानिया के करोड़ों दान, चैरिटी करने के कामों पर उनका बेटा सुप्रीम कोर्ट चला गया और वहाँ से उनके इन करोड़ों अरबों लुटाने, भले ही शिक्षा, अनाथालयों, वृद्धाश्रम आदि को देना था, की कार्यवाही पर रोक लगवा लाया। तर्क यह दिए कि दिमाग़ी संतुलन बिगड़ गया है, पिता बोले मेरी बनाई दौलत है जो चाहे करूँ। लायक़ पुत्र बोला कि मैंने भी पूरी जवानी इनका दायाँ हाथ बन इस औद्योगिक घराने को खड़ा किया है, अब यह मुझे दरकिनार करके बेड़ागर्क कर रहे हैं। और यह स्थापना इनकी भी नहीं बल्कि इनके पिताजी यानि मेरे दादाजी की है। बात तर्कपूर्ण थी मानी गई। शुक्र है जो वह दान कर चुके थे वह ग़ुस्सैल बेटे ने वापस संस्थाओं से नहीं लिया। खेल जगत थोड़ा अपवाद है, हालाँकि यहाँ भी नेपोटिस्म चलाने की पुरज़ोर कोशिशें हुईं। लेकिन इतने मैच, राज्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर के होते हैं (और वह भी सबके सामने) उनमें आप प्रतिभाहीन को चाहे चार बार भी चला दो फिर भी वह बिना टेलेंट के कुछ नहीं कर पाएगा। फिर भी ओलिम्पिक, एशियाड आदि बड़ी प्रतियोगिताओं में पिछले अनेक दशकों से भाई-भतीजावाद चला और हम पदक तालिका में निरन्तर गिरे। हमारी सफलता का प्रतिशत महज़ .01 % है। हमारे महानगर की जनसंख़्या वाले छोटे-छोटे देशों का सफलता प्रतिशत हमसे 50 गुना अधिक है। तभी तो चाहकर भी खेल जगत में नेपोटिस्म नहीं चल सका। तभी गावस्कर, तेंदुलकर से लेकर पादुकोण, मेरीकॉम, पीटी उषा, विश्वनाथन आनंद आदि तक के बच्चे आगे आकर अपने माता पिता से लोकप्रियता तो दूर दो क़दम भी नहीं चल सके। यह क्षेत्र पूरी तरह प्रतिभा को ही समर्पित रहा।

नेपोटिस्म: कब और कैसा समाधान:

इसके पक्षधर हमेशा से यह (कु)तर्क देते रहे हैं कि हमने मेहनत और प्रतिभा से सफलता पाई, उद्योग खड़ा किया तो किसके लिए? सरकार और समाज को अपना उत्कृष्ट दिया और आय पर टैक्स भी दिया। तो अब अपने परिवार, आने वाली पीढ़ी को आगे नहीं बढ़ाएँ? उनके लिए न सोचें? बिल्कुल सही तर्क है। इसकी कोई काट नहीं। परन्तु जब यह भी सोचने में आ जाता है कि जो अन्य प्रतिभाएँ है, उन्हें छल, बल, साम, दंड, भेद से गिरा दिया जाए। शोषित कर दिया जाए, उलझा दिया जाए, या छोटे-छोटे प्रलोभन देकर रास्ते से हटा दिया जाए तो यह ग़लत है। यह हमेशा से है कि जितना घना अँधेरा होगा समाधान उतना ही नज़दीक है। लोकतंत्र, न्यायिक तंत्र, मीडिया हाउस, अफ़सरशाही, शिक्षा, कला और फ़िल्म जगत, उद्योग कोई जगह नहीं जहाँ यह सब जमकर और ठोक कर न चलता हो। खेल की दुनिया में ऊपर हमने देखा कुछ मेहनत और प्रतिभा की क़द्र है। वह इसलिए नहीं कि वह क्षेत्र पुण्य भूमि है, बल्कि इसलिए कि बार-बार चाहकर भी खेलों में प्रतिभाहीन अपनी सन्तति को चला नहीं पाए। क्योंकि सब कुछ मैदान पर, आँखों के सामने होना है। पर इसके बदले में इतना और हद से ज़्यादा शोषण किया कि अधिकांश पहलवान, मुक्केबाज़, हॉकी प्लेयर उनके लठैत, बॉडीगार्ड, दादा बनाए गए ज़बरन। पैसे वालों से पैसा और जमकर अन्य लाभ लिए गए। महिलाओं के खेलकूद में आगे आने का माहौल है तो इनका हर जगह, शहर, ज़िले, प्रदेश स्तर सब जगह हर प्रकार का शोषण, जिसके बारे में हम सभी अख़बारों और टीवी में देखते ही हैं। 

वस्तुतः समाधान देना इस आलेख या कैसे भी आलेख का हिस्सा होना चाहिए परन्तु इस घटाटोप अँधेरे रूपी नेपोटिस्म का अंत यही है कि कड़ी मेहनत, अपने बड़ों के आशीर्वाद और ज़ुबान पर मिठास रखकर निरन्तर अपनी प्रतिभा को निखारते रहो, आगे बढ़ते रहो, चरैवेति, चरैवेति। कला जगत में हर कोने, हर स्टेज पर अपने हुनर को सामने लाओ, निखारो। तो शिक्षा और साहित्य जगत में किताबों को निरन्तर पढ़ो ही नहीं गुनो भी। साथ ही उस क्षेत्र के बेहतरीन और अच्छे व्यक्तियों से मार्गदर्शन लेने में पीछे न रहो। प्राध्यापक बनने के इच्छुक पीएच.डी., नेट, सेट के साथ-साथ राष्ट्रीय सेमिनारों में निरन्तर भागीदारी, गुणवत्तापूर्ण शोधपत्र लेखन और विभिन्न स्थापित जर्नल्स में उन्हें प्रकाशित करें। इन सबके अंक जुड़कर आपको मज़बूत बनाएँगे तो वहीं अपने बूते इन सबमें भाग लेने से आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। 

नागार्जुन की पंक्तियों से यह पूर्ण होगा—

"जो छोटी सी नैया लेकर
उतरे करने को नदी पार
मन की मन में ही रही, स्वयं
हो गए उसी में निराकार! उनको प्रणाम!
जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह रह नव-नव उत्साह भरे
पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे! उनको प्रणाम!" 
 

सन्दर्भ:

1.तदभव, 18, संपादक, अखिलेश, लखनऊ, रामविलास शर्मा से नामवर सिंह की बातचीत। 
2.उपनिषद सार, गीता प्रेस गोरखपुर, 
3 दैनिक भास्कर, मार्च 29, 2021, टाटा और सायरस मिस्त्री विवाद। 
4 टाइम्स ऑफ इंडिया, मुम्बई सं., 12 जनवरी 2021, अर्जुन तेंदुलकर 
5.फ़िल्मों में नेपोटिस्म, www.gugle.com, कंगना रनोट, मनोज वाजपेयी, सुशांत सिंह राजपूत, करण जौहर विवाद। 
6प्रगतिशील वसुधा, अंक 89, 2011, रामविलास शर्मा जन्मशती विशेष, संपादक स्वयंप्रकाश, राजेन्द्र शर्मा, भोपाल। 

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