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प्रतिमाएँ

सुकेश साहनी - (प्रेषक -रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’)

 

उनका काफ़िला जैसे ही बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के नज़दीक पहुँचा, भीड़ ने उनको घेर लिया। उन नंग-धड़ंग अस्थिपंजर-से लोगों के चेहरे ग़ुस्से से तमतमा रहे थे। भीड़ का नेतृत्व कर रहा युवक मुट्ठियों को हवा में लहराते हुए चीख रहा था, “मुख्यमंत्री....मुर्दाबाद! रोटी, कपड़ा दे न सके जो, वो सरकार निकम्मी है! प्रधानमंत्री!....हाय!हाय!” मुख्यमंत्री ने जलती हुई नज़रों से वहाँ के ज़िलाधिकारी की ओर देखा। आनन-फानन में प्रधानमंत्री जी के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के हवाई निरीक्षण के लिए हेलीकॉप्टर का प्रबन्ध कर दिया गया। वहाँ की स्थिति सँभालने के लिए मुख्यमंत्री वहीं रुक गए।

हवाई निरीक्षण से लौटने पर प्रधानमंत्री दंग रह गए। अब वहाँ असीम शांति छाई हुई थी। भीड़ का नेतृत्व कर रहे युवक की विशाल प्रतिमा चौराहे के बीचों-बीच लगा दी गई थी। प्रतिमा की आँखें बंद थीं, होंठ भिचे हुए थे और कान असामान्य रूप से छोटे थे। अपनी मूर्ति के नीचे वह लगभग उसी मुद्रा में खड़ा हुआ था। नंग-धड़ंग लोगों की भीड़ उस प्रतिमा के पीछे एक कतार के रूप में इस तरह खड़ी हुई थी मानो अपनी बारी की प्रतीक्षा में हो। उनके रुग्ण चेहरे पर अभी भी असमंजस के भाव थे।

प्रधानमंत्री सोच में पड़ गए थे। जब से उन्होंने इस प्रदेश की धरती पर क़दम रखा था, जगह-जगह स्थानीय नेताओं की आदमक़द प्रतिमाएँ देखकर हैरान थे। सभी प्रतिमाओं की स्थापना एवं अनावरण मुख्यमंत्री के कर कमलों से किए गए होने की बात मोटे-मोटे अक्षरों में शिलालेखों पर खुदी हुई थी। तब वे लाख माथापच्ची के बावजूद इन प्रतिमाओं का रहस्य नहीं समझ पाए थे, पर अब इस घटना के बाद प्रतिमाओं को स्थापित करने के पीछे का मक़सद एकदम स्पष्ट हो गया था। राजधानी लौटते हुए प्रधानमंत्री बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे।

दो घंटे बाद ही मुख्यमंत्री को देश की राजधानी से सूचित किया गया- “आपको जानकर हर्ष होगा कि पार्टी ने देश के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं विशाल प्रदेश की राजधानी में आपकी भव्य, विशालकाय प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया है। प्रतिमा का अनावरण पार्टी-अध्यक्ष एवं देश के प्रधानमंत्री के कर-कमलों से किया जाएगा। बधाई!”

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