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प्रेम (आभा नेगी)

जाने कहाँ से हुआ जन्म प्रेम का!
किस पेड़ पर पनपा है?
चिर है इसकी आयु
चाहे जितना समेट लो
चाहे जितना बाँट लो।
न सीमाओं में बँधा है
न नापों में नपा है।
गरिमा है जीवन की
मूल-मूल में यह बसा है।
कोई क्या दे इसकी परिभाषा
हर भाषा में सजा है
हर साँस में रमा है।
जो न जाने वह भी करे
जो न जाने वह भी करे।
कोई जान के करता
कोई समझ के करता है।
कोई अनजाने में करता
और न चाहे कोई करना
वह भी करता है।
प्रेम हर रूप में बसता है
हर दिल में रहता है॥

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