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प्रेम गीत रचना

तुम प्रणय के गीत रचना
बस प्रणय के गीत रचना
       यह प्रणय इतना मधुर हो
       भूल जाऊँ दुख सारे,
       यह प्रणय इतना सरल हो
       हर विषमता, टूट हारे,
       इस प्रणय की सुगंधि
       दुर्गंध जीवन की मिटाए,
       यह प्रणय इतना प्रबल हो
       छल कपट जड़ तक जलाए
फिर रचें जीवन दोबारा,
तुम प्रणय के गीत रचना।।

गीत, दुख के, शोक के
गा रहा रोता हृदय यह
गीत कब से पीड़ा मनुज की
बतला रही सम्वेदना यह
गीत कब से शांति के मैं,
युद्ध भेरी को सुनाता
गीत गाता निर्धनों के
धनवान को हूँ मैं हिलाता
पर नहीं कुछ भी बदलता,
जग चला जाता उसी पथ,

भूल कर सब शेष रचना।
तुम प्रणय के गीत रचना।।

गीत कितने अब तक रचे
गीत कितने ही सुनाए,
भाव में सब श्रेष्ठ थे
पर रुचे किसको? बताएँ
चाहते सब सत्य से
कुछ देर को दूर जाएँ
सत्य के ही मर्म को
कर सुनहरा कवि दिखाएँ
शब्द - उपमा, छंद - शैली

द्वंद्व से इनके है बचना।
तुम प्रणय के गीत रचना।।

हो प्रणय गहरा, अलिप्त वह,
       हो समाधि सा अडिग वह,
हो प्रभा में चन्द्र सम वह,
        ताप में आदित्य सा वह,
हो हृदय के शूल में
        भी मुस्कुराता फूल सा वह,
हो नयन में औचक उमड़ कर
        थम, रह गए अश्रु सा वह
हो अधर की मंजु स्मिति
         गीत जो कुछ गुनगुनाए
हो मिलन की चाह जैसा
         ले विरह की पीर आए,
हो सरल निश्छल मगन
        माँ के हृदय की प्रीति सा वह
जागती आँखों में उमड़े
       कोई सपन जैसे सलोना
है मगन अपने में कोई
        भूल बैठे जग का होना
यह प्रणय हो शान्त बहती
        पर्वतों के बीच नदिया,
रात पूनों की हो शीतल
        दीप्त मावस में दिया सा
हर हृदय की चाह सा यह
      काँपती सी सुबुक कोमल
भावना की मधुर लहरी
     उठ बाँध ले जो विश्व सारा,
उठ सके जन, जो जहाँ भी
      मानता हो खुद को हारा,

गीत तू ऐसा ही रचना
बस प्रणय का गीत रचना।।

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