अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

पश्चाताप के आँसू 

विनय प्रताप का नया-नया तबादला हुआ था। यह शहर उसके लिए बिल्कुल नया था। दोपहर को चाय पीने के लिए अपने कार्यालय के ठीक सामने वाली रामू टी स्टॉल पर एक कप चाय का आर्डर देने ही वाला था कि उसकी नज़र बस स्टॉप की बैंच पर बैठी जानी-पहचानी सी एक बूढ़ी औरत पर चली गई। पास जाकर देखा तो विनय एकदम से पहचान गया।

"माता जी आप यहाँ कैसे. . . आगरा घूमने आई हैं? आकाश के साथ आई हैं, कहाँ है वो. . . क्या कोई सामान लेने गया है?" एक ही साँस में विनय ने तमाम प्रश्न माताजी से कर डाले। माताजी विनय के सवालों के जवाब देने की बजाय उलटे फूट-फूटकर रो पड़ीं।

किसी तरह विनय ने माताजी को धैर्य बँधाया और उन्हें अपने साथ घर ले गया। घर पर माताजी ने पूरा घटनाक्रम विनय प्रताप को बता दिया। विनय को बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसका लंगोटिया यार आकाश इतना गिरा हुआ काम भी कर सकता है। अगले ही दिन माताजी को साथ लेकर विनय अहमदाबाद चला गया।

केन्द्र सरकार का प्रथम श्रेणी ऑफ़िसर आकाश अपने बड़े से बंगले के गार्डन में विदेशी कुत्ते से खेल रहा था। तभी उसकी नज़र अपनी माँ पर पड़ी। माँ को देखते ही आकाश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तालियाँ बजाता हुआ विनय भी सामने आ गया।

"वाह! आकाश वाह. . . लाखों की पगार पाने वाला इतना बड़ा ऑफ़िसर अपनी बूढ़ी बेबस, लाचार माँ को मरने के लिए सैकड़ों मील एक अनजान शहर में छोड़ आया। क्या माताजी का ख़र्च तुम्हारे इस विदेशी नस्ल के कुत्ते से भी अधिक था, जो तुम उठाने में असमर्थ हो गये?"

आकाश को अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो वह अपने किये पर आँसू बहाने लगा, वो कुछ बोलता इससे पहले विनय जा चुका था। आकाश अपनी माँ के चरणों को पश्चाताप के आँसुओं से धो रहा था. . .।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

पुस्तक चर्चा

लघुकथा

बाल साहित्य कविता

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं