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पुष्प

एक खिलते पुष्प ने मुझसे कहा,
भूल कर सब व्यर्थ बातें मुस्कुरा।
आँधियाँ तूफ़ान तो आते रहेंगे,
हो प्रफुल्लित गाता बढ़ता चल ज़रा॥

 

जन्म से किसको मिला सुख या दुख:,
बात मीठी और सीधी कर ले ज़रा।
सत्य की महिमा कभी घटती नहीं है,
झूठ, पापों से ही सदा बढ़ती जरा॥

 

हो न कुंठित द्वेश औ व्यभिचार से,
कर्मकर अपना सदा सत से ज़रा।
फिर सभी कंटक तेरे रक्षक बनेंगे,
प्रेम का रस राग जब उनमें भरा॥

 

दिव्य ज्योति डालती सब पर नज़र,
गीत गाती लह लहाती यह धरा,
प्रेम से हर बाग़ बृन्दा वन लगे,
श्याम की वन्शी जहाँ गूँजी ज़रा॥

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