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पूर्ण निमीलित नेत्रों के नाम

पद्म पलाश उत्फुल्ल दृगों का निमिलन।
सरसिज का हो ज्यों मधुपालिंगन॥
 
आकाशाचारी उन्मुक्त पथिक को पकड़ लिया है।
दुर्विनीत द्विरेफ जो पंखुरियों में जकड़ लिया है॥
 
कौमुदी मदिर पवन से कहती
है तो बंधन, पर कितना पावन॥
 
अली-कली संसर्ग स्वप्न में, बीत चुके जो क्षण हैं।
प्रेम-समर-सीकर-बिन्दु बन, झलके तुहिन के कण हैं॥
 
अलस-पलक में बंद भ्रमर भी,
आः! नहीं करता अब मुक्ति-जतन॥
 
अंशुमाली ने आँखे खोल, जिस पल जग को हेरा।
रमणी-श्यामा-पद्मा को, आ लाज भाव ने घेरा॥
 
हौले से, अति मंद स्मित करके
तब झटपट खोले हैं कंज नयन॥
 
पद्म पलाश उत्फुल्ल दृगों का निमिलन।
सरसिज का हो ज्यों मधुपालिंगन॥

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